ये मणिधारी भुजंग !

रविवारीय सोच-विचार

सच में बड़ा ही मुश्किल हो गया है कामचोरों से काम लेना। ये सारे निकम्मे चाहते हैं कि बैठे-बैठे खान-पान, पैसा-टका, भोग-विलास और सब कुछ मिलता रहे, कोई पुरुषार्थ नहीं करना पड़े और रोजाना टाईमपास होता रहे।  संस्थानों, समाज, क्षेत्र और देश के लिए सबसे बड़े नासूर हैं ये कामचोर। फिर अब तो इनकी देखादेखी दूसरे लोग भी ऎसे ही होते जा रहे हैं।  जब लगता है कि बिना कुछ किए टाईमपास करने से ही सब अपने आप हासिल हो ही जाता है, तब काम करने की आफत कौन मोल ले। इन्हीं कामचोरों की करतूतों पर केन्दि्रत है मेरा यह आलेख।(सभी परंपरागत कामचोरों से क्षमायाचना सहित)


किसी बड़े युद्ध को जीतना जितना अधिक आसान है उससे कहीं अधिक मुश्किल है कामचोरों, नालायकों, नुगरों और निकम्मों से निपटना।युद्ध में तो साफ-साफ पता रहता है कि आमने-सामने कौन हैं, किस किस्म के हैं और उनसे निपटने के लिए किस तरह के अस्त्र-शस्त्र प्रयोग में लाने हैं। उन्नीस-बीस का फर्क भले ही हो सकता है लेकिन इससे अधिक नहीं।

किन्तु सांसारिक परिवेश में कहीं कुछ अनुमान नहीं लगाया जा सकता कि कौन कैसा है। पहले तो शक्लें देखकर भी अंदाज लगा लिया जाता था पर आनुवंशिक संक्रमण के मौजूदा दौर में अब वह पैमाना भी ध्वस्त हो चला है।बोलचाल से भी पता चल जाता था पर अब हर आदमी मीठा बोलने और दूसरों को भ्रमित करने के लिए माधुर्य पूरी उदारतापूर्वक बाँटने का आदी हो चला है। कपड़े-लत्ते और घर-बार से भी अनुमान लग जाया करता था पर अब वह कसौटी भी विफल हो गई है।अब तो आदमी इतना अधिक अभिनयवादी और बहुरूपिया हो गया है कि उसके बारे में किसी भी प्रकार का अंदाज लगा पाना या उसकी थाह पा लेना बड़ा ही मुश्किल हो गया है।

इसका कारण यह है कि अब इंसान के भीतर इंसानियत की बजाय स्वाँगिया गुण आ गए हैं। वह हर तरह के अभिनय में माहिर हो चला है, हर तरह की भाषा, बोलचाल और व्यवहार सीख गया है।अधिकांश लोगों के जीवन का एकमात्र अर्थ यही रह गया है कि अपनी बुराइयों, गलतियों और दोहरे-तिहरे चरित्र को जितना अधिक छिपा सको, छिपाओ और जमाने के सामने आओ तब अपने आपको ऎसे पेश करो जैसे कि इंसानियत की कोई खूबसूरत मूरत ही आ गई हो।

यही कारण है कि आजकल हर तरफ सजे-धजे और फबे हुए लोगों की जमातें ही नज़र आती हैं, असली चेहरों के दर्शन दुर्लभ होने लगे हैं। जो लोग सच्चे इंसान की तरह सामने आते हैं उनकी वेशभूषा, सरलता और सादगी को देखकर ही लगता है कि जैसे पुरानी सदी के बचे-खुचे अवशेष सामने आ गए हों।पाश्चात्य और परिवेशीय चकाचौंध भरे बहुरूपिया समुदाय के बीच इन लोगों की स्थिति रावणी लंका में रहने वाले सात्विक लोगों की तरह दृष्टिगोचर होती है। बहुसंख्यों के आगे इन बेचारों की बिसात।

काम के मामले में सबसे ज्यादा चिल्लाने और गला फाड़-फाड़ कर मुँह निकालने वालों में अधिकांश वे होते हैं जो केवल काम की अधिकता और भार का जिक्र ही करते रहते हैं, असल में कोई काम नहीं करते या काम के नाम पर टाईमपास ही करते रहते हैं।जो लोग काम ही काम होने की चर्चा और चिन्ता करते रहते हैं वे लोग केवल अपना वजूद सिद्ध करने के लिए ही जोराेंं से चिल्लाते रहते हैं ताकि औरों की नज़रों में आ सकें और अपनी जीवन्तता का सबूत दे सकें।

अपने आपको कर्मयोगी सिद्ध करने वालों में अधिकांश लोग वे होते हैं जो एक ही एक जगह बरसों तक बैठे रहकर चंद फीट के दायरों को ही संसार मान बैठे हैं और सालों से मामूली से कामों में घण्टों गुजार देने की महारत हासिल किए हुए हैं।आने वाले जन्मों के ये भावी भुजंगावतार एक ही जगह पर बरसों से काम करते हुए ऎसे कुण्डली जमाये रहते हैं जैसे कि अमर फल खाकर आए हों और जन्म-जन्मान्तरों तक इन्हें इन्हीं बाड़ों और गलियारों में रहकर खाक छाननी हो।

कुछ अपवादों को छोड़ दिया जाए तो यह स्वयंसिद्ध है कि एक ही एक स्थान पर बरसों तक कुण्डली मारे बैठे लोगों की स्थिति मणिधारी सर्प की तरह हो जाती है जो वर्षों तक एक ही एक खोल में पड़ा रहकर इतना अधिक आलसी हो जाता है कि उसे खाने-पीने के लिए भी सब कुछ अपने आस-पास चाहिए।हमेशा उसकी यही तमन्ना रहती है कि भोजन-पानी पाकर जिन्दा रहने के लिए भी इन्हें कहीं दूर नहीं जाना पड़े, सब कुछ अपने करीब ही मिल जाया करे।

मणिधारी भुजंगों में तो मणि होती है जो उनके लिए आहार को अपने करीब खींच लाती है और वो भी अंधेरे में। पर इन भुजंगों के लिए न मणि की जरूरत होती है, न रात के अंधेरे की। दिन के उजाले में भी ये निकम्मेपन, आलस्य और दरिद्रता का डंका बजाते रहते हैं कागज के चंद टुकड़ों की बदौलत मिल गए परवाने को थाम कर।इनसे निपटना बड़ा ही टेढ़ा है, थोड़ा कुछ सरसराहट कर लो तो इन्हीं की किस्म के सारे सपोले और सर्प पूरे के पूरे  कुनबे के साथ आ भिड़ते हैं अपने बचाव में और पूरा माहौल हो जाता है जहरीला।

इनकी फुफकार में भी जहर भरा होता है और तीखे दाँतों में भी। निगाहों में भी जहर है और साँसों में भी। स्वभाव, व्यवहार, कर्म और लक्ष्य सब कुछ सर्प-सर्पिणियों सा ही बना रहता है। सज्जनों और सामाजिक परिवर्तन के झण्डाबरदारों के लिए यही लोग हैं जो हमेशा अवरोध बनकर अड़ जाने की फितरत का नंगा और खुला प्रदर्शन करते हुए तरक्की के सारे आम रास्तों पर अधमरे लेटे या नीम बेहोशी में बैठे रहा करते हैं।

इन चुनौतियों से निपटना अब आसान नहीं रहा। कारण यह कि निकम्मों और नालायकों का कुनबा अब कम नहीं रहा, संख्या बल के साथ ही बाहुबल और धनबल सभी मामलों में इनका वर्चस्व बढ़ता जा रहा है।इन्हीं के कारण से फुलवारियों में जमीन पर बाँबियां उगने लगी हैं और भीतर दीमकों का डेरा। भगवान मेरे वतन की हिफाजत करे।