श्री मणि बावरा की परम्परा ने रचा इतिहास

साहित्य उत्सव ने बनाया कीर्तिमान

सौभाग्य से नेताजी सुभाषचन्द्र बोस की जयन्ती का दिन ही स्व. मणि बावरा का जन्म दिन रहा। इस दिन की बांसवाड़ा के साहित्य जगत और प्रबुद्धजनों को हमेशा प्रतीक्षा रहती। कारण यह था कि हर साल 23 जनवरी की साँझ उनके होली चोक, पृथ्वीगंज स्थित आवास पर साहित्यिक साँझ के रूप में खूब जमती। इसमें शिक्षा, संस्कृति और साहित्य से जुड़े प्रबुद्धजनों का जमावड़ा रहता ही रहता। 

सभी को यह पता रहता कि 23 जनवरी का मतलब शाम को बावराजी के यहाँ सालाना आयोजन। साल भर से सभी को उत्सुकता के साथ रहा करती थी 23 जनवरी की प्रतीक्षा। उनके द्वारा डाली गई परंपरा ने बांसवाड़ा ने साहित्य संसार को समृद्ध करने में कोई कमी नहीं रखी।  पुराने और नवीन रचनाकारों के मध्य सम्पर्क और स्नेह सेतु स्थापित हुआ तथा प्रतिभाओं को प्रोत्साहन के भरपूर अवसरों ने आगे बढ़ाया। आज के कई रचनाकार श्री मणि भाई के योगदान की देन हैं।

हर बार 23 जनवरी को देर रात तक काव्यगोष्ठी और मुशायरा रंग जमाते। बांसवाड़ा के साहित्यिक इतिहास में 23 जनवरी का दिन मणि बावरा जी की वजह से ऎतिहासिक यादगार दिवस के रूप में समाहित है।

अमिट स्मृति में वाग्वरी सम्मान

साहित्यकाश के कर्मयोगी स्व. मणि बावरा की स्मृति को चिरस्थायी बनाने रखने के लिए उनके परिवार तथा दीप शिखा साहित्य  संगम द्वारा वाग्वरी सम्मान की परम्परा कई वर्षों तक जारी रही। इसके अन्तर्गत हर साल स्व. बावराजी एवं सुभाषचन्द्र बोस की जयन्ती 23 जनवरी के दिन साहित्य के क्षेत्र में सेवारत एक हस्ताक्षर को वाग्वरी सम्मान प्रदान किए जाने की परंपरा रही।

 अब तक वाग्वरी सम्मान से जिन साहित्यकारों को नवाज़ा जा चुका है उनमें छगनलाल नागर, भरतचन्द्र शर्मा, भूपेन्द्र उपाध्याय तनिक, श्याम अश्याम, धनपतराय झा, डॉ. वीरबाला भावसार, प्रकाश पण्ड्या, कमलेश कमल आदि शामिल हैं।

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