खुद को करें बुलन्द

खुद बनाएं अपनी पहचान

‘यथा योग्यं तथा कुरु’ वाला समय अब नहीं रहा। इस मामले में हालात अब उलट-पुलट हो गए हैं। एक तो गुणी और क्षेत्र या हुनर विशेष में दक्ष लोगों की कमी होती जा रही है, दूसरी ओर गुणों की परख करने वालों का अकाल बहुत बड़ी समस्या के रूप में हमारे सामने है।

वो जमाना चला गया जब इंसान की वैयक्तिक खूबियों और सामाजिक उपयोगिता का आकलन-मूल्यांकन और उपयोग करने के लिए समाज आगे आता था और सदाचारी, सत्यवादी, सज्जनों, सेवाभावियों तथा सिद्धान्तवादी समर्पित लोगों को सामाजिक संरक्षण, प्रोत्साहन और हरसंभव मदद प्राप्त होती थी और वह भी पूरी उदारतापूर्वक।

जो जिस योग्य होता था उसे उसी के अनुरूप काम मिलता और उसकी प्रतिभाओं के हिसाब से समाज में प्रतिष्ठा प्राप्त होती थी। वो जमाना सिद्धान्तों, संस्कारों और आदर्शों का हुआ करता था। उस जमाने में लोग अपने लिए नहीं बल्कि औरों के लिए, समाज के लिए तथा देश के लिए जीते थे और इसी लक्ष्य को लेकर पूरी जिन्दगी बिता दिया करते थे।

आज पूंजीवाद और प्रोपेगण्डा का जमाना है, सहस्र पर लगाकर झूठ जमीन से लेकर आसमान तक चक्कर काटता हुआ अपनी धाक जमाने लगा है। सत्य का आश्रय समाप्त होता जा रहा है और लोग झूठ के सहारे चकाचौंध और भौतिकवादी जीवन को अपना चुके हैं। ऎसे में सत्य का आधार समाप्त होता जा रहा है और स्वार्थ एवं ऎषणाओं की अमरबेल जनजीवन पर बुरी कदर छायी हुई है।

भौतिकता की जबर्दस्त चकाचौंध है इसलिए उन लोगों को आदर-सम्मान, मान-प्रतिष्ठा और यश प्राप्त है जिनके पास पैसा है अथवा पॉवर। दोनों के ही रास्ते परिग्रह और भोग-विलासिता के उन्मुक्त लक्ष्यों की ओर हैं जिनका न कोई ओर-छोर है, न मर्यादाएँ। सब कुछ मनमर्जी और स्वेच्छाचारों पर निर्भर है और कोई रोकने-टोकने वाला नहीं है।

समाज-जीवन का क्षेत्र कोई सा हो, कोई सा अँचल हो, वहाँ समाज की नज़र अच्छे, कर्मठ और समाजसेवी व्यक्तित्वों पर बनी रहती थी और उन्हें उनके योग्य कर्म, आदर और सम्मान दिलाने का काम समाज पूरा करता था।

आज वे सारे मूल्य समाप्त होते जा रहे हैं इसलिए श्रेष्ठताओं के सारे मानदण्डों पर दूसरी अत्याधुनिक और भौतिकतावादी कसौटियां हावी होती जा रही हैं। अब प्रतिभा, हुनर या सिद्धान्तों की बजाय जिन तत्वों के आधार पर इंसान का कद तय होने लगा है उसके बारे में सर्वविदित है।

बात सामाजिक प्रतिष्ठा से लेकर अपने आपको स्थापित करने की हो या अपने हुनर विशेष के सार्वजनीन प्रकटीकरण की, हर जगह दूसरों के मुकाबले स्वयं को स्थापित करने के लिए इंसान हर संभव उपायों का सहारा ले रहा है।

इसके लिए अब न कोई वर्जनाएं रह गई हैं, न मानवोचित मर्यादाएं। एक तरह से यह सीधा और खुला संघर्ष है जिसमें हर कोई पाने और कब्जा जमाने के लिए प्रयत्नशील है चाहे वह किसी भी तरह से हथिया क्यों न लिया जाए। छीना-झपटी और लूट-खसौट का यह दौर हाल के वर्षो में पूरी दुनिया में चल निकला है।

शोर्ट कट अपनाने वाले, अपने को ऊँचा बनाने के लिए किसी भी हद तक नीचे गिर जाने वाले और किसी के भी आगे नाक रगड़ कर आगे बढ़ जाने वालों की भरमार है, पाँव पखारने वाले भी खूब हैं और पाँव दबाने लेकर चरणस्पर्श करने वाले भी कम नहीं। बहुत सारे लोग जिधर देखो उधर किसी न किसी पाँव धोक लगाते हुए दिखने लगे हैं। कई तो पूरे पसर ही जाते रहे हैं।

अक्सर ऎसे लोगों के बारे में कहा जाता है कि इनमें कुछ अपवादों को छोड़ दिया जाए तो दुनिया में ऎसे अधिकांश लोग जिनके सामने झुक-झुक कर सलाम करते हैं, हाथ जोड़कर आदर भाव दर्शाते हैं, वे ही लोग बाद में अपने काम निकल जाने पर अंगुली दिखाते हैं। इसी प्रकार पाँवों में गिरकर चरणस्पर्श करने वाले लोगों में से ही खूब सारे टाँग खिंचने लगते हैं।

आदमी का अब कोई भरोसा ही नहीं रहा। वह किस समय क्या कर गुजरे। किसे अच्छा और बुरा बता दे, यह सब उसके स्वार्थ पूरे होने पर निर्भर करता है। असल में हम जिन लोगों को आदमी कहकर गर्व किया करते हैं वे सारे के सारे रिमोट से संचालित रोबोट या कठपुतलियां हैं या फिर जानबूझकर बेजान बने हुए बिजूके।

दुनिया में जो भी अच्छे लोग हैं उनकी सबसे बड़ी कमजोरी या कमी यही होती है कि वे अपनी प्रतिभाओं के सार्वजनिक तौर पर प्रकटीकरण से हिचक रखते हैं। यह स्वाभाविक भी है क्योंकि प्रतिभाएं अपना काम करने में विश्वास रखती हैं आडम्बरों में नहीं।

दूसरी ओर प्रतिभाशून्य लोगों के लिए आडम्बरों और पाखण्डाेंं के सिवा और कुछ भी होता नहीं, इसलिए उन्हें आए दिन किसी न किसी से समझौते करने की विवशता होती ही है। ये लोग खुद नहीं जीते बल्कि दूसरों के सहारे जिन्दा रहने को मजबूर होते हैंं।

आज का जमाना कुछ विचित्र है। दुनिया में जहाँ जो लोग अच्छे काम कर रहे हैं, सेवा और परोपकार में रमे हुए हैं, रचनात्मक कर्म अंगीकार किए हुए हैं अथवा उनके पास किसी भी प्रकार का हुनर है, इन सभी को चाहिए कि वे औरों के भरोसे न रहें, न चुपचाप और स्वान्तः सुखाय बने रहें, बल्कि अपने आपको स्थापित करने और अपनी अच्छाइयों से जमाने भर को अवगत कराने के लिए प्रयास करें।

इन प्रयासों में यह जरूरी नहीं कि किन्हीं प्रकार के गोरखधंधों, षड़यंत्रों अथवा बुरे लोगों का साथ लिया जाए। अपने दायरों और मर्यादाओं में रहकर अपनी बात जमाने तक पहुंचाएं। यह किए जाने पर ही अच्छाइयों का वजूद और अधिक मजबूत होकर प्रसार पाएगा अन्यथा बुरे और स्टंटबाज लोग संगठित होकर अपने हीन और क्षुद्र, कुटिल और कपटी धंधों से अच्छे लोगों को हाशिये पर लाने के लिए दिन-रात लगे हुए हैं।

अपने आपको स्थापित करने के लिए खुद आगे आएं। यह हमारे अपने लिए नहीं बल्कि समाज और देश के लिए जरूरी है। हम जो कुछ कर रहे हैं उसका लाभ समाज को प्राप्त होना चाहिए। हमारे कर्म का अनुकरण करने का संदेश सभी तक पहुंचना चाहिए।

आज समय की मांग यही है कि हम कंदराओं में बैठकर काम करने वाली कार्यशैली छोड़ें, अपने व्यक्तित्व और जीवनशैली में थोड़ा सुधार लाएं और अपने आपको प्रतिष्ठित करें। समाज सेवा का यह भी एक बहुत बड़ा आयाम है जिसके माध्यम से अच्छाइयों की बेहतर ढंग से मार्केटिंग कर समाज और देश के लिए हम अपने आपको उपयोगी बना सकते हैं।

2 thoughts on “खुद को करें बुलन्द

  1. अपने आपको निखारें, अपनी पहचान खुद बनाएँ …
    किसी के भरोसे नहीं रहें। अब न कोई गॉड फादर होने लायक रहा है, न गॉड मदर लायक। न कोई किसी को आगे लाता है, न सम्बल, मदद और प्रोत्साहन देने में विश्वास रखता है। लोग केवल तमाशा देखने और अपने स्वार्थों की पूर्ति के लिए जीते हैं और जिन्दगी भर तमाशेदार व तमाशबीन बने रहकर सस्ते मनोरंजन में रमे रहते हैं। वो पीढ़ी चली गई जिसके भरोसे अच्छे, सच्चे और हुनरमन्द लोगों को तलाश कर आदर-सम्मान और उनके लायक प्रतिष्ठा परोसी जाती थी।
    अब जो कुछ करना है खुद के बूते करें और किसी की परवाह बिना करें। आलोचना-निन्दा और पीछे पड़ने का स्वभाव तो असुरों, हरामखोरों और पुरुषार्थहीन नुगरों के लिए जन्मजात रहा है। ये मरे नहीं बदलने वाले। इन विघ्नसंतोषियों का तो जन्म ही प्रदूषण फैलाने के लिए हुआ है।
    निष्ठा और समर्पण के साथ लगे रहें, एक न एक दिन हमारे हुनर और श्रेष्ठ व्यक्तित्व की गंध जमीन से लेकर आसमान तक ही नहीं बल्कि भू लोक से लेकर सत्यम् लोक तक गूंजने लगेगी। फिर मरणधर्मा अल्पायु इन्सान ही क्या, देवता भी हम पर फिदा होने लगेंगे।

  2. एकला चालो, आसमान गुंजाओ और सुनहरे शिखरों का वरण करते रहो …

    औरों के पालतु श्वान, मुर्गे-गुर्गे, गधे-घोड़े और जानवर के रूप में उनके बाड़ों में रहकर उछलकूद और धींगामस्ती करने, मुफ्त की झूठन और पराये संसाधनों पर मौज उड़ाने, औरों के आदमी या गुलाम, पालतु दास कहे जाने से बेहतर है खुद को पहचानें और अपनी शक्ति के बूते जीवन और जगत में कुछ नया और उल्लेखनीय ऎसा करके दिखाएं, जिसे की आने वाली पीढ़ियाँ आदर-सम्मान के साथ याद करें और प्रसन्नतापूर्वक अनुकरण भी करें।
    भगवान ने इसलिए पैदा नहीं किया है कि ईश्वर प्रदत्त गुणधर्म, अपनी शक्ति और भीतरी ऊर्जा को भुलाकर मुफत की माल-मलाई, खुरचन और झूठन चाटने, हराम के पैसे जमा करने और अपना वजूद साबित करने के लिए औरों के पीछे-पीछे घूमते रहें, नालायकों और नुगरों का जयगान करते रहें और उन्हें बेवजह प्रतिष्ठित करते रहें, जिनमें कोई कुव्वत नहीं है।
    जो इंसान होने के लायक तक नहीं हैं, उन्हें हम देवराज और दरबारी, प्रबुद्धजन और महान व्यक्तित्व के रूप में पूजने के पाप में जुटे हुए हैं। यह हमारी कुल परंपरा, अपने पूर्वजों, देवी-देवताओं का अपमान है।
    खुद को बुलन्द करें, इसी में है जीवन की सार्थकता। अन्यथा श्वान परंपरा में जीते रहे तो आने वाला जन्म श्वान का ही होगा, फिर जन्म-जन्मान्तरों तक श्वान, गधे, कैंकड़ा जूओं, गिद्धों और साँप-बिच्छुओं की योनियों में सड़ते रहने का मलाल बना रहेगा। कभी नहीं हो पाएगी मुक्ति, और न ही पूर्वजन्मों के कुकर्मों के कारण फिर से मनुष्य योनि मिल पाएगी।
    ‘अप्प दीपो भव’ को अपनाएं या फिर अंधेरों के आवाहन में लगे रहें। ऎसे मकड़जाली लोगों का भला भगवान भी नहीं कर सकता जो इंसान होने के गौरव को भुलाकर पालतु जानवरों की तरह रहने के आदी हो गए हैं। कब तक मरे-अधमरे, आत्महीन और अपराधबोधी जीवों की तरह पड़े रहोगे। उठो, अपने आपको जानों और जीवन की दशा को सुधारते हुए सुनहरी दिशाओं की ओर प्रयाण करो।

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