अपना योगदान दें, भागीदारी निभाएँ

अपना योगदान दें, भागीदारी निभाएँ

आत्मकेन्दि्रत जिन्दगी और स्वार्थों की पूर्ति के लिए हर तरफ मारामारी मची हुई है और इसने सामाजिक प्रबन्धन को पूरी तरह गड़बड़ा दिया है।

जो इंसान सामाजिक प्राणी के रूप में जाना जाता रहा है वह अब अपने-पराये के भेद में उलझता जा रहा है। वह अपने समूहों या कुनबों पर ही ध्यान देने के चक्कर में समुदाय और क्षेत्र को भुलाता जा रहा है।

लोगों की जिन्दगी अपने चन्द हिमायती, सहयोगी और अनुचरों के इर्द-गिर्द केन्दि्रत होकर रह गई है। इससे समाज और देश की सभी सामुदायिक परंपराओं और मूल्यों का ह्रास होता जा रहा है।

आदमी छोटे-छोटे समूहों या एकान्तिक जिन्दगी में बंटता जा रहा है। वह तलाश तो सार्वजनीन उत्सवी आनंद की करता रहता है लेकिन उसकी अपनी भूमिका केवल अपने या अपने कहे जाने वाले लोगों तक सिमट कर रह गई है।

चाहे कैसा भी सार्वजनिक आयोजन हो, आकस्मिक अवसर उपस्थित हो जाए अथवा उत्सवी आनंद पाने के पर्व, मेले और त्योहार ही क्यों न हों, अब दो-तीन तरह के लोग खासतौर पर दिखने लगे हैं।

तमाशा पैदा करने और तमाशबीनों की भीड़ का हिस्सा बनकर आनंद पाने वालों को अपनी मौज-मस्ती और चटपटेदार घटनाओं-दुर्घटनाओं से ही सरोकार रह गया है।

इन्हें इस बात से कोई सरोकार नहीं कि समाज और क्षेत्र के लिए क्या अच्छा है और क्या बुरा। इसी तरह क्षेत्र में होने वाले तमाम तरह के सार्वजनिक उत्सवों, धार्मिक, सामाजिक, साहित्यिक एवं सांस्कृतिक आदि प्रकार के आयोजनों में खूब सारी भीड़ ऎसी है जिसका इनके आयोजन या प्रोत्साहन में कोई योगदान नहीं होता।

न ये पैसों का सहयोग करते हैं, न समय या श्रम की भागीदारी निभाते हैं। बावजूद इसके इनके जीवन का एक ही लक्ष्य रहता है कि कोई सा अवसर हो, उनका स्थान मंच या अग्रिम पंक्ति पर हो, हर जगह सम्मान और अभिनंदन होना चाहिए तथा जो भी लाभ प्राप्त होने वाले होते हैं वे उन्हें मिलने ही चाहिएं।

इन दोनों ही इंसानी प्रजातियों से भिन्न बहुत से लोगों की भीड़ ऎसी भी है कि जिसे इन आयोजनों से कोई मतलब नहीं है चाहे वे किसी भी तरह के क्यों न हों। अपने आपको स्थितप्रज्ञ, सर्वज्ञ और परम सन्तुष्ट मान बैठे इन लोगों की स्थिति उदासीनता के घेरे में आ जाती है जहाँ इनसे समाज और देश के लिए किसी भी प्रकार के सेवा कार्य की उम्मीद रखना मूर्खता है।

आज के सभी आयोजनों में इंसान मेहमान या वीआईपी-वीवीआईपी की तरह हिस्सा हो जाता है और इन आयोजनों को अपने हक में भुनाने के सारे के सारे उपायों को अपना लिया करता है।

आयोजनों से श्रेय प्राप्ति सहित समस्त प्रकार के परोक्ष-अपरोक्ष लाभों को हथिया लेने के करतबों में हम सब इतने माहिर हो चले हैं कि हमारा कोई जवाब नहीं। आयोजनों में न पैसे की मदद करना, न परिश्रम करना और न ही प्रोत्साहन देना हमारी आदत हो चुकी है।

अतिथियों की तरह आकर अवसरों का भरपूर फायदा उठाने का तिलस्म आजकल खूब सारे लोग आजमाने लगे हैं। काम कुछ करना नहीं, और श्रेय सारा का सारा लूट लेने के लिए हम वे सारे रास्ते अपना लिया करते हैं जिन्हें वर्जनाओं से घेरा हुआ है।

अवसर कोई सा हो, किसी भी तरह का सामाजिक, धार्मिक, साँस्कृतिक, साहित्यिक, आंचलिक आयोजन क्यों न हो, कोई से मेले, पर्व और उत्सव क्यों न हों, इनका पूरा का पूरा आनंद जरूर लें, वांछित लाभों और श्रेय को पाने की कोशिश करते रहें लेकिन इन आयोजनों में अपनी ओर से यथोचित योगदान जरूर दें।

सहयोग के बगैर किसी भी तरह का श्रेय, लाभ और सुकून पाना चोरी और डकैती से कम नहीं। जो लोग पैसे वाले हैं उन्हें चाहिए कि वे धन सहयोग दें।

जिनके पास अतिरिक्त पैसा नहीं है वे लोग समय दें, अपनी ओर से किसी न किसी व्यवस्था में श्रम दान करें। यह भी नहीं कर सकें तो कम से कम अच्छे आयोजनों के लिए आयोजकों को प्रोत्साहन देने में कोई कमी न रखें।

यह भी नहीं कर सकें तो निन्दा से बचें। न बुरा सुनें न बुरा कहें। बुराई की चर्चाओं को बीच में ही समाप्त करें। आजकल कामचोरों और नुगरों का ऎसा एक बहुत बड़ा वर्ग हमारे सामने सर उठाने लगा है जो केवल और केवल निन्दा ही करता रहता है।

कोई सा रचनात्मक कार्य किसी भी क्षेत्र में हो रहा हो, कोई सा इंसान कितना ही अच्छा कार्य समाज और देश के लिए कर रहा हो, लेकिन इन मूर्खों और नासमझों की नाकारा भीड़ नकारात्मक विचारों और निन्दाओं के साथ इनके पीछे पड़ जाया करती है।

किसी न किसी पैमाने में इनके बीज प्रदूषित होने, पारिवारिक संस्कारहीनता, अपराधबोध या कि पूर्ण वर्णसंकरता की वजह से इन्हें यह भान नहीं रहता कि कौन सा कार्य अच्छा है और कौनसा बुरा। इसलिए ये लोग श्रेष्ठ और रचनात्मक कार्यों और रचनाधर्मी व्यक्तियों के पीछे हाथ धोकर पड़ जाते हैं जैसे कि इनसे किसी पूर्व जन्म की दुश्मनी निकालने के लिए ही पैदा हुए हों।

हकीकत में देखा जाए तो उन लोगों को किसी की भी आलोचना या निन्दा का कोई अधिकार नहीं है जिनकी किसी न किसी रूप में भागीदारी न हो। जो लोग किसी भी सृजनात्मक गतिविधि से जुड़े हुए नहीं हैं उन्हें इन गतिविधियों के बारे में कुछ भी कहने का अधिकार नहीं है। यह अपने आप में अनधिकृत चेष्टा और धूर्तता है।

जहाँ जो कुछ अच्छा हो रहा है उसमें मददगार बनें, अपनी औकात और खोल से बाहर न निकलें तथा निन्दाओं से बचें। समाज, क्षेत्र और देश के लिए कल्याणकारी मार्ग यही है कि रचनात्मक कार्यों में यथाशक्ति और यथाश्रद्धा अपनी भागीदारी निभाएं, अपना योगदान दें। इसके बाद ही आयोजनों से आनंद प्राप्ति का विचार करें।  पराये पैसों, औरों की मेहनत तथा समय का अनादर कर श्रेय लूटने और आनंद पाने का इरादा व्यभिचारी जीवन का प्रतीक है।