शुभ्र बनाएँ आभामण्डल

हर इंसान के साथ अपना एक आभामण्डल होता है जिसका सीधा संबंध ब्रह्माण्ड की ऊर्जाओं से रहता है। हमारा आभामण्डल जितना अधिक स्वच्छ, पवित्र और शुचितापूर्ण होता है उतना ही ब्रह्माण्ड की सभी ऊर्जाओं का हमारे भीतर आवागमन चलता रहता है।

इससे हमारे लायक शक्तियों और ऊर्जाओं का पुनर्भरण अपने आप होता रहता है। जिन तत्वों और शक्तियों की हमारे भीतर कोई कमी हो जाती है  वह ब्रह्माण्ड के स्वाभाविक एवं सहज प्रवाह में रहने के कारण स्वतः परिपूर्ण होती रहती हैं।

अपना ओरा या कि आभामण्डल जितना अधिक स्वच्छ और पवित्र होगा, उतना ईश्वरीय शक्तियों का पूरा का पूरा प्रभाव हमारे तन-मन और मस्तिष्क पर बना रहेगा। यह पवित्रता इस बात पर निर्भर है कि हमारा दिल और दिमाग कितना साफ है, हमारा शरीर कितना स्वच्छ है।

तन-मन और मस्तिष्क जितना अधिक विशुद्ध होगा, उतना ही हमारा ओरा या आभामण्डल शुभ्र और चमकदार बना रहेगा। इसमें ज्यों-ज्यों सांसारिक प्रपंचों का समावेश होगा, प्रदूषित और अभक्ष्य खान-पान होगा, राग-द्वेष, हिंसक व क्रूर भाव और वैचारिक गंदगी होगी, शरीर में अनुपयोगी एवं अनावश्यक विजातीय द्रव्यों का समावेश होगा, उतना अधिक शरीर दूषित होगा।

जितना अधिक दिल-दिमाग और शरीर अपवित्र होता चला जाएगा, उतना हमारा ओरा दूषित हो जाता है और इसकी शुभ्रता खण्डित होती जाती है, श्वेत आभामण्डल के भीतर कालिख के धब्बे होते जाते हैं और धीरे-धीरे पूरा आभामण्डल ही स्याह हो जाता है।

आभामण्डल की शुभ्रता समाप्त होकर जैसे-जैसे चमक खत्म होती जाती है, कालापन आने लगता है उतना व्यक्तित्व खोखला होता जाता है। जितना ओरा काला पड़ता जाता है उसी अनुपात में दिमाग में द्वन्द्व, खुराफात और असन्तोष पनपता जाता है, शरीर बीमारियों का घर बनता जाता है, असाध्य रोग जड़ें जमाने लगते हैं, दिल मलीन हो उठता है और इस वजह से मन-मस्तिष्क और शरीर की चंचलता बढ़ती चली जाती है।

इस अवस्था को पा जाने वाले अपने आपको शक्तिशाली, ऊर्जावान और सर्वश्रेष्ठ समझने का मिथ्या भ्रम पा लिया करते हैं और अहंकार का ग्राफ निरन्तर इतना अधिक बढ़ता चला जाता है कि ये अपने आपे में ही नहीं रहते।

ऎसे लोगों के क्रमिक एवं उत्तरोत्तर भीतरी क्षरण तथा खोखले होते जाने का दौर आरंभ हो जाता है और ईश्वरीय तथा दिव्य शक्तियों से इनका तारतम्य खत्म हो जाता है।

अपना आभामण्डल अपने  व्यक्तित्व विकास और जीवन लक्ष्यों में आशातीत सफलता पाने का मूलाधार होता है और यह जितना अधिक मजबूत, दिव्य एवं शुभ्र होगा, उतना ही जीवन तेजस्वी, प्रखर और दिव्य ओज से परिपूर्ण होगा।

यह आभामण्डल जितना अधिक शुभ्र होता है उतना ही अधिक इसका दायरा भी प्रसार पाता रहता है। ज्यों-ज्यों दैवीय गुण और भाव आते हैं, त्यों-त्यों इसकी परिधि विस्तार पाती जाती है। यही कारण है कि शुद्ध-बुद्ध और मेधावी लोगों के आभामण्डल के दायरे में आने वाले लोग इनसे प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकते। इन लोगों का जीवन ही अनुकरणीय हो उठता है।

आभामण्डलहीन या कालिख भरे आभामण्डल वाले लोग चाहे कितने भाषण और उपदेश झाड़ते रहें, अपनी महानता के चर्चे बखानते हुए खुद को लोकप्रिय और सर्वोपरि मानते रहें, इनका कोई शब्द प्रभाव नहीं छोड़ पाता, क्योंकि उसमें ऊर्जा का अभाव रहता है। शुभ्र आभामण्डल उत्तलता लिए हुए शुभ्रता का संचार कराने वाला होता है जबकि कालिख भरा आभामण्डल अवतलीय होकर अंधकार के आवाहन का प्रतीक बना रहता है।

जो लोग अपने आभामण्डल को शुद्ध एवं पवित्र रखने में कामयाब रहते हैं, उन लोगों के लिए जीवन निर्वाह आसान रहता है तथा उन्हें सांसारिक प्रपंचों या मरणधर्मा लोगों के सामने याचना करने, उनसे डरने या उनसे सम्पर्क करने की कभी कोई आवश्यकता नहीं पड़ती, ये लोग अकेले ही सब कुछ करने में समर्थ होते हैं।

दुनिया को जीतना चाहेंं तो और कुछ न करें, अपने आपमें दैवीय गुणों का समावेश करें, दिव्यता लाएं और लोक तथा जगत मंगल के रचनात्मक कर्मों में निरन्तर लगे रहें। लेकिन एक बात यह ध्यान रखनी जरूरी है कि कोई भी ऎसा काम न करें कि जो हमारे आभामण्डल की चमक-दमक और शुभ्र तेज का क्षरण करने वाला हो।

इसके लिए आहार-व्यवहार, वाणी व्यवहार और सम्पर्क में शुचिता का ध्यान रखें। कई बार हम चाहे कितने अधिक पवित्र बने रहने की कोशिश क्यों न करते रहें, हमारे आस-पास या सम्पर्कितों के कारण भी हमारा आभामण्डल दूषित हो जाता है और इसके दुष्परिणाम हमें ही भुगतने पड़ते हैं।

इसके लिए जरूरी है कि खान-पान में दूषित, मिथ्याभाषी, झूठे, झूठन चाटने वाले, हराम का खान-पान और पैसा पाने वाले, भ्रूण हत्यारे, शोषक, अन्यायी, व्यसनी, व्यभिचारी, वर्णसंकर, चोर-बेईमान-डकैत, रिश्वतखोर, भ्रष्ट, अपराधी, कमीशनखोर, औरों को बेवजह तनाव देने वाले लोगों से दूर रहें, उनसे न हाथ मिलाएं, न उनके चरण स्पर्श करें, न करने दें। इन पुरुषार्थहीन लोगों के वहां या इनके पैसों का खान-पान न करें, न इसके साथ रहें, न इनका साथ दें।

बहुत से अच्छे और सच्चे तथा सज्जन लोग अपने आप में तो दिव्य होते हैं किन्तु इनकी दिव्यता दुष्टों के संसर्ग में आने के कारण खत्म हो जाती है और इसका कुफल इन सज्जनों को भुगतना पड़ता है।

इसलिए अपने आभामण्डल को दूषित होने से बचाने और इसके दायरे में निरन्तर विस्तार के लिए हर क्षण प्रयास करने की जरूरत है।  इसी से आत्म जागरण और सिद्धि प्राप्त हो सकती है तथा जीवन को कल्याणकारी दिशा और उन्नतिकारी दशा मिल सकती है।

जीवन में आशातीत सफलता, आरोग्य और सुख-समृद्धि का यह मूलाधार है। जो इस परम सत्य को स्वीकार कर लेता है, उसका जीवन धन्य हो उठता है तथा उसके यश की कीर्तिपताका कालजयी स्वरूप प्राप्त कर लेती है।

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