अप-डाउन मुदमंगलकारी

अप-डाउन मुदमंगलकारी

कुल जनसंख्या में खूब सारे लोग हैं जो काम-धन्धों या नौकरी के लिए रोजाना अप-डाउन करते हैं और इनका रोजमर्रा का काफी कुछ समय अप-डाउन करते हुए  सफर में ही व्यतीत होता है।

बहुत से ऎसे भी हैं जिनकी जिन्दगी का अधिकांश समय अप-डाउन में ही गुजर जाता है। सरकारी और निजी सभी प्रकार के काम-धंधों और नौकरियों वालों के लिए अप-डाउन करना जीवन की वह अनिवार्यता है जो अपरिहार्य है और इसका सीधा संबंध उनके जीवन निर्वाह तथा परिवार संचालन से है।

अप-डाउन करने वाले लोग यदि समय के महत्व को जान लें और रोजमर्रा के इस सफर को यदि अपने अनुकूल बना दें तो यह संभव है कि ये लोग जीवन में कोई न कोई ऎसी उपलब्धि पा सकते हैं जिसकी तुलना नहीं की जा सकती।

आवश्यकता है तो इसी बात की कि हम अपने अप-डाउन वाले सफर के समय को अपने हक में कैसे भुनाएं। यह कला भी है और विज्ञान भी। अप-डाउन का सफर लम्बा हो या छोटा, जितना समय मिले उसे व्यर्थ न गँवाते हुए यदि हम ऊर्जा का संरक्षण करने का कौशल सीख जाएं तो हमारे जीवन में बहुत बड़ा और चमत्कारिक परिवर्तन लाया जा सकता है।

बात केवल सफर के समय की ही नहीं है बल्कि जीवन में जहाँ कहीं किसी भी प्रकार की प्रतीक्षा या फुरसत का समय मिलता है उसे अमूल्य मानें और अपने हित में उसके एक-एक क्षण का भरपूर उपयोग करें। यह प्रयोग हमने यदि कर लिया तो जीवन की तमाम समस्याओं से निपटा जा सकता है।

केवल समस्याओं से मुक्ति ही नहीं अपितु अपनी सभी प्रकार की क्षमताओं में आशातीत अभिवृद्धि का यह सहज, सरल और आसान उपाय है। थोड़ा समझ लेने और समय के अनुकूल अपने आपको ढाल लेने भर की जरूरत है। जो समय को अपने हक में भुनाने की कला को सीख जाता है वह निहाल हो जाता है।

आज हमारे जीवन की सारी समस्याओं का मूल कारण यही है कि हम समय को जाया करते रहते हैं, जो समय अमूल्य है, लौट कर वापस कभी नहीं आने वाला है उस अमूल्य समय की बेकद्री करने वाले जिन्दगी भर बेकद्री और दरिद्रता भुगतते रहते हैं।

हम सभी लोग कभी समय को दोष देते हैं और कभी भाग्य को। इनसे भी काम नहीं बने तो हम दूसरे लोगों को दोष देना आरंभ कर देते हैं। हम अपनी कमी, कमजोरी, नादानी, नाममझी और नालायकी को मानने को कभी तैयार नहीं होते बल्कि सारा दोष दूसरों के मत्थे ही मढ़ते रहने को अपनी आदत में ढाल चुके हैं।

दुनिया का परम सत्य यही है कि हमारी विफलताओं, ठहराव और नैराश्य के लिए हम स्वयं ही दोषी हैं, दूसरे कोई नहीं। इंसान का यही सबसे बड़ा दोष है कि वह खुद कैसा है, क्या है, और क्या कर रहा है, इस बारे में कभी नहीं सोचता, बल्कि जिन्दगी का अधिकांश हिस्सा दूसरे लोगों की मुखबिरी, जासूसी और रहस्यों को जानने तथा इनका सार्वजनीन उद्घाटन कर इनका मजा लेने में लगा देता है।

और वह भी उन लोगों के बारे में जानने की जिज्ञासाओं को लेकर बीता देता है जिनका उससे कोई न कोई रिश्ता होता है, न परिचय या किसी भी प्रकार का कोई संबंध।

इस किस्म में अधिकांश लोग मसालची और मशालची की भूमिका में होते हैं जिनका संग इन्हीं की तरह के दूसरे लोगों के लिए भेलपूड़ी का आनंद देने वाला अनुभव होता है। बात समय को पहचानने और इसका भरपूर उपयोग करने की है। हम चाहे जिस किसी सफर में हों, इसमें लगने वाले समय का एक-एक मिनट हम चाहें तो अपने उद्धार और ऊर्जा प्राप्ति के लिए लगा सकते हैं।

आजकल सफर में लोग मोबाइल पर अंगुलियां चलाते हुए चैटिंग करने, ईयर फोन लगाकर गाने या सुनने, फिल्में, क्लिप्स और असंख्य तरह की वीडियो देखने, आपस में बेवजह बतियाने, दिन-रात व्हाट्सअप और फेसबुक पर संदेशों के आयात-निर्यात, जोर-जोर से चिल्लाते हुए घर-गृहस्थी से लेकर दुनिया जहान तक की बातें करने,  हर तरह की चर्चाओं और फालते के संवादों में समय गँवाते रहते हैं जबकि इस समय का भरपूर उपयोग हम अपने लिए स्थायी ऊर्जा संग्रहण में कर सकते हैं जिस प्रकार सूर्य की रोशनी से सौर ऊर्जा का संग्रहण होता है।

हम बोलना, सुनना, देखना आदि कम करते चले जाएं, फालतू का न देखें, न सुनें और न बोलें तो इससे कई प्रकार की ऊर्जा का क्षरण रुकेगा और इससे ऊर्जा की बचत होगी।

जहाँ देखने लायक कुछ न हो,  बार-बार एक ही एक दृश्य देखकर उकता गए हों, वहाँ सफर के दौरान आँखें बन्द कर आज्ञा चक्र में अन्तः त्राटक करते हुए ध्यान का अभ्यास करें। फालतू की चर्चाओं और बकवास में समय नहीं गँवाकर भगवान के किसी भी छोटे से मंत्र के निरन्तर जप का अभ्यास करें, यह अपने आप में सहज और सरल साधना है जिसमें समय का भरपूर उपयोग दैवीय ऊर्जाओं के संरक्षण का सशक्त माध्यम बन सकता है।

यह भी न कर सकें तो खुली आँखों से हरियाली को निहारते चलें। इससे चश्मों का नंबर कम होगा और जिनके चश्मे नहीं हैं उन्हें चश्मे पहनने की जरूरत नहीं पड़ेगी।

पर हमारी आदतें इतनी खराब हो गई हैं कि हम प्रकृति के खूबसूरत नज़ारों और हरियाली का दर्शन करने की बजाय औंधे मुँह मोबाइल की स्क्रीन पर धँसे रहेंगे और चश्मों के नम्बर बढ़ाते रहेंगे।

सफर में अखबार या पुस्तक पढ़ने का अभ्यास करने वाले लोगों की आँखें जल्दी खराब होती हैं और आँखों के घातक रोग भी हो सकते हैं।

इस बुराई को त्यागना जरूरी है। साधना और स्मरण के लिए सफर श्रेष्ठतम मार्ग है जिसमें हम थोड़ी सी समझदारी दिखाएं तो दिन में हजारों जप कर विराट मंत्र ऊर्जा का संग्रहण अपने लिए कर सकते हैंं।

बहुत से लोग हैं जो सफर में न बात करते हैं न फालतू के काम, केवल और केवल मंत्र जप करते हुए अक्षर ब्रह्म की सिद्धि प्राप्त कर लेते हैं जो जीवन भर उनके साथ बनी रहकर उनका सर्वविध कल्याण करने में सहभागी बनी रहती है।

कलियुग तीव्र प्रतिस्पर्धा और आपाधापी का युग है। इसमें मनुष्य को ध्यान, जप, पूजा आदि का समय नहीं मिल पाता। ऎसे में हमें जो समय मिलता है उसी का दुरुपयोग त्याग कर पूर्ण सदुपयोग करने की कला को सीख लेना चाहिए।

एक बार अक्षर ब्रह्म की सिद्धि का मार्ग प्राप्त हो जाने के बाद हमारी सभी प्रकार की उन्नति स्वतः स्वाभाविक रूप से दैवीय कृपा से होने लगती है।

समस्याओं का खात्मा होने लगता है और मानसिक व शारीरिक स्वास्थ्य उत्तम बना रहता है। इससे जीवन को उच्चतर स्तर की प्राप्ति होने लगती है और हमारा आने वाला हर समय हमारे लिए कल्याणकारी सिद्ध होता है। इसलिए समय के मोल को पहचानें और इसका भरपूर सदुपयोग करें। एक बार इस प्रयोग को अपना लें और जीवन में चमत्कारों का अनुभव करें।

2 comments

  1. Great Sir

  2. सुषमा भाणावत मेहता

    आदरणीय बहुत ही सही कहा गपशप से तो मंत्र जप ही कर ले।