व्यक्तित्व बनाएँ बहुआयामी

व्यक्तित्व बनाएँ बहुआयामी

इंसान के रूप में हम वो हर प्रकार के काम करने में सक्षम है जो नियति ने हमारे लिए तय कर रखे हैं। आज का युग ऎसा नहीं है कि हम केवल चन्द कामों और हुनर में ही रमे रहें और अपने आपको सीमित दायरे में नज़रबन्द रखे रहें।

आज का युग बहुमुखी व्यक्तित्व की पहचान बनाते हुए छाप छोड़ने का है। कोई भी इंसान तभी सफल और प्रतिष्ठित स्थान बना सकता है कि जब वह सभी प्रकार के जरूरी विषयों में पारंगत हो तथा वे सारे काम पूरी दक्षता के साथ अकेला ही करने में सक्षम हो, जो उससे संबंघित हों।

ऎसे व्यक्तियों को न कोई हरा सकता है और न ही विफल कर सकता है चाहे उनके आस-पास के सारे लोग असहयोग का रूख अपना लें या शत्रु होकर सामने आ जाएं। नाकारा और निकम्मे लोगों को सबसे अधिक भय लगता है तो उन लोगों से जो काम में विश्वास रखते हैं और पूरी निष्ठा के साथ काम करते हैं।

हर निकम्मे और जानबूझकर कर्महीन बने इंसान को लगता है कि जो लोग पूरी ईमानदारी एवं मनोयोग से अपने कर्म को पूरा करते हैं वे ही उनके लिए खतरा होते हैं क्योंकि द्रष्टा भाव अपनाये हुए, तटस्थ और मूल्यांकन करने मे सक्षम लोग जब तुलना करते हैं तब निकम्मों को नीचा देखना पड़ता है।

हालांकि जो लोग निकम्मापन ओढ़ लेते हैं वे दुनिया के सबसे बड़े बेशर्म, भूखे-नंगे और लूटेरे किस्म के होते हैं इसलिए उन पर दूसरों की बातों, उलाहना आदि का कोई स्थायी या प्रेरक प्रभाव नहीं रहता। असंख्य लोगों की भीड़ है जो हर काम में माहिर होने के बावजूद वे ही काम करते हैं जिनमें ज्यादा मेहनत नहीं होती और फायदा अधिक होता है या बिना कुछ किए प्राप्ति के सारे रास्ते खुले हों।

जिस रफ्तार से जमाना आगे बढ़ रहा है उसमें अब वे सारे लोग निकम्मे और नाकारा माने जाने लगे हैं जो कुछ नहीं करते अथवा कुछ करना नहीं चाहते। दुनिया को आज ऎसे लोगों की जरूरत है जो वक्त आने पर सारे काम कर सकें और समाज व देश के लिए जब भी किसी सेवा कार्य की जरूरत पड़े, तब सहर्ष आगे आकर काम संभालें और पूरी गुणवत्ता से पूरे करें।

अन्यथा खूब सारे लोग पशुओं की तरह जी रहे हैं। न इनके जागरण का समय निश्चित है, न शयन का। नींद भी आती होगी, इसकी भी कोई गारंटी नहीं। खान-पान के मामले में सब कुछ फ्री स्टाईल। जो मुफत का मिल गया उसे राजी-राजी स्वीकार कर लिया करते हैं और जब तक झूठन पेट में पचती रहती है तब तक गुणगान करते रहेंगे।

सब कुछ पच जाने के बाद भूल ही जाएंगे कि किसकी दया से पेट भरा और चूहों की उछलकूद थम गई। जो खिलाता-पिलता रहता है उसकी जयगान करते रहेंगे और जिस दिन किसी व्यस्तता या कारणवश इन मुर्गों और गुर्गों को दाना-पानी न मिले, उस दिन से उल्टी बाँग।

नाकाराओं की समन्दर सी पसर जाने वाली भीड़ में पशुओं और पिशाचों के सारे स्वभाव देखे जा सकते हैं। सवेरे से देर रात तक तफरी, कभी इस सड़क-चौराहे या सर्कल पर किसी के वहाँ जम गए और गप्पों की महफिल शुरू कर दी, कभी किसी गलियारे, बाड़े में घुस कर धींगामस्ती।

काम-धाम कुछ नहीं। रोजाना सवेरे से ही एक ही लक्ष्य, कैसे दिन निकालें। और दिन निकालने के चक्कर में खुद भी अंधेरे में रहते हैं और जिन संस्थानों, बाड़ों और गलियारों में काम करते हैं उन्हें भी अंधेरे में रखा करते हैं। खुद कुछ नहीं करना, टाईमपास करते रहना। इन लोगों के घरवाले भी रोजाना भगवान से यही प्रार्थना करते हुए खुद को कोसते हैं कि ये जाहिल लोग उन्हीं के कुनबे में कहाँ पैदा हो गए।

दूसरी ओर जो लोग पूरी निष्ठा और ईमानदारी से काम करते हैं  उन लोगों को कोसना, उनकी निन्दा करना तथा उपहास उड़ाते रहना। नाकाराओं की इस भीड़ में बहुत से चेहरे ऎसे हैं जो कि यों तो मरे-अधमरे रहेंगे, दिन भर माथा पकड़ कर बैठे रहेंगे और बीमार होने का बहाना बनाते हुए गंभीर रोगियों की तरह मुँह लटकाए घूमते रहेंगे लेकिन जैसे ही कहीं से अतिरिक्त आमदनी या बजट आने की सूचना मिल जाती है, ये लोग ऎसे चुस्त-दुरस्त हो जाते हैं जैसे कि कुछ हुआ ही नहीं हो।

बजट का राम नाम सत्य कर देने और अतिरिक्त आमदनी चट कर जाने के बाद फिर जैसे थे वैसे। इन लोगों को दुनिया का सारा बजट ठिकाने लगाने को कह दिया जाए तो चन्द घण्टे में यह काम कर डालें।

इस मामले में ये मुद्राराक्षस दुनिया के दूसरे सारे देशा को पीछे छोड़ देने वाले होते हैं। जमाने की मांग यही है कि हम जो भी समय मिला है उसमें अपनी बहुआयामी प्रतिभाओं और हुनर का भरपूर इस्तेमाल करें और दो-चार कामों के प्रति ही सिमटे न रहें बल्कि अपनी इंसानी क्षमताओं को दर्शाते हुए अधिक से अधिक प्रकार के कामों और प्रवृत्तियों में पूरे मन से भागीदारी निभाएं।

ऎसा कर पाएं तभी हम जमाने की रफ्तार को पा सकेंगे अन्यथा आज के युग में हम नाकारा ही माने जाएंगे। बहुआयामी और बहुमुखी व्यक्तित्व पाए बिना हम आधुनिक संसार के नागरिक होने का दावा नहीं कर सकते। उदासीन और नाकारा होते हुए जीना अपने आप में मृत्यु है और ऎसे लोगों को समुदाय मरा हुआ ही मानता है।