बच के रहियो इन सड़ियल मनहूसों से

कुछ किस्म के लोगों की एक अजीब सी प्रजाति है जो इंसान होने के बावजूद मरियल, मुर्दाल और सड़े हुए जानवरों की तरह रहा करते हैं, इनका जिस्म और कपड़े इतनी सडान्ध मारते हैं कि पास से गुजरना भी हर किसी के लिए दुःखदायी होता है।

भरपूर पानी और स्वच्छता के लिए जरूरी संसाधनों व उपकरणों के रहते हुए ये लोग रोजाना नहाने और शरीर को साफ रखने से कतराते हैं। ऎसे लोग सड़े हुए कुत्तों और गंदगी से भरे हुए सूअरों की तरह इस तरह रहते हैं कि जैसे किसी कच्ची बस्ती के गन्दे और बदबूदार जानवर ही हों।

जो लोग शरीर को साफ नहीं रख सकते, उन लोगाें के दिल और दिमाग के साफ-सुथरे रहने की उम्मीद नहीं की जा सकती। सर्फ, साबुन और समय सब होते हुए ऎसे लोग अन्तःवस्त्रों से लेकर बाहरी वस्त्रों तक को धोने से कतराते रहते हैं और इसी वजह से इन लोगों के कपड़े भी बदबूदार रहते हुए सड़ान्ध फैलाते हैं।

इन मलीनों की दुर्बुद्धि और पशुता तो  अपने आप में स्वयंसिद्ध है लेकिन ऎसे मलीन और गन्दे लोगों के साथ रहने और खाने-पीने वालों की भी कोई कमी नहीं है। ऎसे लोग भी इन गन्दे और मैले मन व मलीन तन वाले लोगों को पसंद करते हैं।

इसका सीधा सा निहिताथ यही है कि जिन इंसानों के दिमाग में खुराफात भरी हो, दिल मैला हो और पूरा का पूरा जिस्म पराये या हराम के पैसों के ,खान-पान से बना और पला हो, उन लोगों के लिए सडान्ध और बदबूदार जिस्म या मलीन लोगों को साथ रखने में कोई हर्ज नहीं। अपने स्वार्थ पूरे हो रहे हों तो ये ऎसे गन्दे लोगों का भी साथ निभाते रहें।

स्वच्छता का सीधा संबंध मन और मस्तिष्क से होता है। बाहर से देखने पर किसी भी इंसान को परखा नहीं जा सकता क्योंकि इंसान जब संसार के सामने आता है तब बन-ठन के आता है और उसका एकमेव उद्देश्य यही होता है कि जमाने भर में उसके हुलिये की तारीफ हो, लोग पसंद करें। इसके लिए  वह सम सामयिक फैशन, इत्र-फुलैल और दूसरे सारे सौन्दर्य-हथियारों को अपनाने के बाद ही बाहर की दुनिया में आता है।

यह इंसान का वह चेहरा है जिसे मुखौटा कहा जा सकता है। इसके आधार पर उसके व्यक्तित्व का पूर्ण एवं सटीक मूल्यांकन नहीं किया जा सकता। पर इतना जरूर है कि इंसान की वाणी, व्यवहार और कर्म को देखकर उसकी थाह अच्छी तरह पायी जा सकती है।

इंसान और स्वच्छता के संबंधों पर ही चर्चा करें तो हम पाते हैं कि हर इंसान की स्वच्छता विषयक गतिविधियों को लेकर उसके दिल और दिमाग तथा शरीर के स्वास्थ्य एवं व्यवहार तथा इनके भूत, भविष्य एवं वर्तमान को टटोला जा सकता है।

जैसा आदमी का मन होता है वैसा ही उसका स्वभाव होता है। जैसा दिमाग होता है उसी के अनुरूप व्यवहार करता है। इस मामले में पारिवारिक और वंशानुगत संस्कारों का सर्वाधिक प्रभाव पड़ता है। 

जो इंसान बाहर से गंदा और गंदगी पसंद होता है वह भीतर से भी उतना ही गंदगी भरा होता है। इस किस्म के लोगों का मन-मस्तिष्क और शरीर सब कुछ मैला और मलीन होता है। और जिसका दिल और दिमाग गंदा है वह इंसान बाहरी साफ-सफाई को भी पसंद नहीं करता।

 बहुत सारे लोग हमारे संपर्क में आते हैं जिनकी हरकतों को देख कर साफ-साफ कहा जा सकता है कि ये लोग गंदे हैं और इन्हें अधिकांश लोग नापसंद करते हैं। किसी मजबूरी में साथ रहना, साथ काम करना और सम्पर्क रखना अलग बात है लेकिन ऎसे लोगों को कोई भी स्वेच्छा या प्रसन्नता के साथ कभी स्वीकार नहीं करता।

इस मामले में अपने घर के बाथरूम और शौचालयों की स्थिति आरंभिक पैमाना या संकेतक है। जिनके घरों या कार्यस्थलों के शौचालय और स्नानघर बदबूदार रहते हैं, जो लोग लघुशंका या दीर्घशंका के बाद पर्याप्त पानी प्रवाहित नहीं करते, हाथ-पाँव नहीं धोते, जिनकी वजह से बाद में इनका सुविधालयों का उपयोग करने वालों को घृणा होती है, वे सारे के सारे लोग अपने मन और मस्तिष्क से भी गंदे होते हैं।

खूब सारे लोग हैं जो न तो फ्लश करते हैं, न अपने सुविधालयों में साफ-सफाई के प्रति गंभीर रहते हैं। हम सभी के संपर्क में ऎसे छोटे-बड़े कद, पद और मद वाले खूब लोग आते हैं जिनके बारे में कहा जाता है कि इन्हें सुविधालयों का ठीक से उपयोग करना तक नहीं आता, साफ-सफाई के प्रति लापरवाह हैं और खुद भी गंदे रहते हैं।

इसी प्रकार बहुत सारे लोग हमारे संपर्क में आते हैं जो चाहे जहाँ पान-गुटके की पीक कर दिया करते हैं, थूंकते रहने की आदत से लाचार हैं और गंदगी फैलाने में इनका कोई जवाब नहीं। जो लोग ऎसा करते हैं वे सारे के सारे खुराफाती होते हैं।

इनके दिमाग में हमेशा षड़यंत्र और गंदगी पसरी रहती है। इनके मन काले और मैले होते हैं। यकीन न हो तो इन लोगों के स्वभाव और व्यवहार, रोजमर्रा के काम-काज और चरित्र को देख लीजिये। बहुत से लोग हैं जिन्हें हम बड़ा, प्रभावशाली और अनुकरणीय मानते हैं लेकिन ये लोग भी साफ-सफाई के मामले में उपेक्षा ही बरतते हैं।

इन लोगों को कुछ कहना भी बेकार है क्योंकि ये कभी सुधरने वाले नहीं। इनके साथ रहने, काम करने और घर-परिवार वाले कितने सहिष्णु और सहनशील हैं जो ऎसे-ऎसे मलीन लोगाें को बर्दाश्त करने की विवशता या स्वार्थ पाले हुए हैं। लेकिन यह भी सच है कि ऎसे लोगों को वे ही बदौश्त कर पाते हैं जो कि इन्हीं की तरह सड़ियल और धूर्त-मक्कारी मानसिकता से ग्रस्त हों।

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