गाँधी-शास्त्री को समझें, जीवन में उतारें

गाँधी-शास्त्री को समझें, जीवन में उतारें

महात्मा गांधी और लालबहादुर शास्त्री दोनों भारतवर्ष के वे रत्न थे जिनके जीवन को सीखने, समझने और आत्मसात करने की आवश्यकता है। भारत को स्वाधीनता दिलाने से लेकर विकास की बुनियाद रचने में दोनों ही महापुरुषों के योगदान को भुलाया नहीं जा सकता। किसी एक को अधिक और दूसरे को कम नहीं आंका जा सकता।  न ही दोनों में भेददृष्टि रखी जानी चाहिए। जहाँ महात्मा गांधी की बात होती है वहाँ उसी समानता और शिद्दत के साथ लालबहादुर शास्त्री की बात होनी चाहिए।  दोनों की बहुत सी बातें ऎसी हैं जिन्हें जीवन में उतारकर हम अपने व्यक्तित्व को समाजोन्मुखी और उपयोगी दशा और दिशा दे सकते हैं।

महापुरुषों की जयन्तियां और पुण्यतिथियां केवल औपचारिकता का निर्वाह करने ही नहीं आती बल्कि ऎसे हर अवसर हम देशवासियों के लिए प्रेरणा और सम्बल का अहसास कराने वाले होने चाहिएं।

कुछ विलक्षणताएं दोनों के जीवन में थीं जिन्हें यदि हम अपना लें तो अपना भी जीवन धन्य हो जाए और देश का नवनिर्माण भी हो जाए। दुर्भाग्य से हमने भोग और विलासिता के साथ स्वार्थों को अपनी जिन्दगी में इतनी अधिक तरजीह दे रखी है कि सादगी, उदारता, ईमानदारी और सिद्धान्तों का पलायन हो चुका है और इनका स्थान ले लिया है वैयक्तिक ऎषणाओं की पूर्ति और स्वार्थ ने।

हम सारे लोग अपने आप में इतने अधिक बनावटी हो गए हैं कि हमारी मौलिक पहचान गायब हो चुकी है। रहन-सहन, खान-पान, व्यवहार और जीवन के हर कर्म में हम कृत्रित और आडम्बरयुक्त जिन्दगी जी रहे हैं। हम खुद भी किसी दिन अपनी आत्मा से पूछ लें तो वह हमारी शर्मनाक, दुर्भाग्यपूर्ण और मूर्खता भरी हरकतों और सोच पर हँस देगी और हमें अपना ही सर लज्जा से नीचे झुकाने को विवश होना पड़ेगा।

हम जैसे हैं वैसे दिखना नहीं चाहते क्योंकि ऎसे में हमें यह खतरा बना रहता है कि लोग क्या कहेंगे, दूसरों के मुकाबले हमारी स्थिति की किरकिरी होगी और लोग अपेक्षाकृत कमतर आँकने लग जाएंगे।  बात चेहरे-मोहरे, कद-काठी, घर-परिवार और सामान्य लोक व्यवहार की हो या किसी भी तरह के सामाजिक एवं परिवेशीय व्यवहार की। हर मामले में हम डुप्लीकेट हो गए हैं।

सादगी को हम गरीबी का पर्याय मानकर छोड़ चले हैं। स्वेदशी की बजाय अपनी सोच और व्यवहार से लेकर तमाम प्रकार के पदार्थों में विदेशी चलन इतना अधिक बढ़ गया है कि हमारा कोई काम या व्यवहार विदेशियों के बिना चल नहीं सकता।

ये विदेशी सोच और पदार्थ न हों तो हम मर ही जाएं। इतने अधिक आश्रित हो गए हैं। यहाँ तक कि हम अपनी गुणवत्ता और सेवाओं के मामले में भी विदेशों के प्रमाण पत्रों पर निर्भर रहने लगे हैं। हम लाख गुना अच्छे और उत्तम गुणवत्ता के माल का उत्पादन क्यों न कर डालें, हमारी सेवाओं की गुणवत्ता चाहे कितनी उम्दा हो, लेकिन कोई इसे मानने को तब तक तैयार नहीं होता जब तक कि विदेशी आईएसओ  या आईएसआई मार्का न लगा हो।

जिस देश के लोग स्वदेशी विचारों और वस्तुओं के प्रति आत्महीनता बरतने की मूर्खता करते हैं वह देश ज्यादा समय तक आत्मनिर्भर नहीं रह सकता, उस देश का पतन अपने ही देशवासियों की मूर्खतापूर्ण सोच से हो जाता है। गांधी-शास्त्री के नाम पर हम अपनी दुकानदारी चलाते रहे हैं मगर कभी हमने उनके स्वदेशी विचार और सादगी को ग्रहण नहीं किया। हमारी स्थिति अपने लाभ तक ही सीमित रहने लगी है और चकाचौंध के प्रभाव में आकर हम अपने आपको भी भुलाते जा रहे हैं।

हम सभी लोग सत्यमेव जयते और ईमानदारी का उद्घोष करते रहे हैं मगर हम अपने मन, वचन और कर्म के प्रति कितने ईमानदार हैं इसे हमसे बढ़कर कौन जा सकता है। सब तरफ बेईमानी, भ्रष्टाचार, अनाचार, अशांति और चोरवाड़े की बातें सुनने को मिलती हैं। बड़े-बड़े लोग जो कुछ कर रहे हैं, करवा रहे हैं यह अपने आप में देशद्रोह से कम नहीं है। बावजूद इसके झूठे, झांसेबाज और चतुर लोग हर जगह अपने कारनामों के साथ शिखरों का आरोहण करने में पीछे नहीं हैं। कितनी शर्मनाक बात है कि जो लोग रिश्वत खाने में मस्त हैं, भ्रष्टाचार करने वाले हैं, अन्याय, अत्याचार और शोषण ढाने वाले हैं वे लोग महात्मा गांधी और लालबहादुर शास्त्री की जयन्ती और पुण्यतिथि में जयकारे लगाते हैं और अपने आपको गांधी भक्त या शास्त्री भक्त जतलाते हैं।

इन लोगों को कोई अधिकार नहीं है ऎसे महापुरुषों के कार्यक्रमों में भागीदारी की नौटंकियां करने और उनके नाम के जयकारे लगाने का। ऎसे लोग जब जयकारे लगाते हैं तब लगता है कि दुनिया में इससे बड़ा और कोई अभिनय हो ही नहीं सकता। अच्छा हो कि हम औपचारिकताओं के अभिनय से बाहर निकलें और गांधी एवं शास्त्री के नाम पर जयकारे लगाने की परंपरागत धूर्तताओं से मुक्त होकर जीवन में सादगी, ईमानदारी, पारदर्शिता और देशप्रेम लाएं और सच्चे अर्थों में राष्ट्रीय चरित्र की आराधना करें।

सत्यनिष्ठ, ईमानदार और नैष्ठिक कर्मयोगियों को गांधी एवं शास्त्री जयन्ती पर हार्दिक शुभकामनाएं…।

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