गुरु अमर रहें, चेला-चेली जिन्दाबाद

Gurupoornima Special

भगवान श्री वेदव्यास को समर्पित यह वार्षिक पर्व गुरु पूर्णिमा उन महामनाओं के श्रद्धापूर्वक स्मरण, आराधना और पूजा का अवसर है जो वास्तव में गुरुत्व को धारण करते हैं, गुरु होने के समस्त लक्षण जिनमें विद्यमान है और जो अपने शिष्यों को भवसागर से तार देने की सभी प्रकार की क्षमताओं से युक्त हैं।

गुरु न तो कोई भौंपा-भल्ला या तांत्रिक-मांत्रिक होता है जो लोगों के छोटे-छोटे कामों को करता हुआ अपने क्षेत्र में पूजा जाए। गुरु कोई मध्यस्थ भी नहीं होता जो कि देवी-देवताओं और लोभी या जिज्ञासु इंसानों के बीच का सेतु बनकर काम निकलवाने वाला हो।

गुरु वह है कि जो ऋषि-मुनियों की प्राचीन परंपरा, सरलता, सहजता और सादगी के लिए अपना जीवन भगवान को समर्पित कर चुका हो, जिसका काम सांसारिक लोभ-लालच, एयरकण्डीशण्ड वाहनों और आश्रमों तथा पुत्रेषणा, वित्तेषणा और लोकेषणा को पूरी तरह त्याग चुका हो, संग्रह की वृत्ति से परे रहकर उदारतापूर्वक समाज और देश के लिए आगे आने वाला हो।

हमने गुरु शब्द की महिमा और विराट स्वरूप से बेखबर होकर उन लोगों को भी गुरु का दर्जा दे डाला है जो सांसारिकता और ऎषणाओं के व्यामोह से घिरे हुए हैं, गण्डे-ताबीजों और डोरे-धागों में उलझे हैं, जिन्हें प्रचार की जबर्दस्त भूख-प्यास है, जिन्हें सम्पत्ति और चेले-चपाटियों की लम्बी-चौड़ी फौज चाहिए और अपना प्रभुत्व दर्शाने के राज्य अतिथि बनने की लालसा हो, तमाम ताम-झामों को पाने के लिए हमेशा किसी न किसी बड़ी हस्ती या सर्वोपरि सांसारिक के समक्ष लाईन में लगने या उनकी कृपा पाने की इच्छा हमेशा बनी रहती है।

ईश्वर से सीधा संबंध रखने वाला असली गुरु अपने आप में अकेला समर्थ होता है, उसे न भीड़ चाहिए, न बुलेट प्रूफ या लाल बत्ती,  न सम्पन्न और प्रभावशाली शिष्यों की भीड़।

जिनके पास बड़े लोगों की भीड़ बनी रहती है, जिन लोगों को हमेशा वीआईपी और वीवीआईपी की अपने यहां आवाजाही और सान्निध्य की दरकार बनी रहती है, वे किसी भी तरह गुरु नहीं हो सकते। इनसे तो वे सांसारिक लोग अच्छे हैं जिनका कोई गुरु नहीं होता, संतोषपूर्वक जीवन व्यतीत कर लिया करते हैं, रूखी-सूखी खाकर भी मस्त रहते हैं। जिन्हें किसी प्रकार की कोई अतिरिक्त कामना या आकांक्षा नहीं होती।

पुराने जमाने से कहते आये हैं – पानी पीजे छानकर, गुरु कीजे जानकर। हम पानी तो बिसलरी बोतलों का पीने लगे हैं लेकिन गुरुओं के मामले में धोखा खा जाते हैं। असल में जिसे हम गुरु बनाने की सोचते हैं उन लोगों को हम अपनी नज़र से नहीं देखते बल्कि भीड़ और श्रेष्ठीजनों की कतारों से गुरु का कद आँकते हैं और भेड़चाल अपनाते हुए पहुंच जाते हैं इधर-उधर।

देश में गुरुओं और चेले-चेलियों की गिनती की जाए तो यह आंकड़ा करोड़ों है। इतनी बड़ी संख्या में हमारे देश में दिव्य लोग और सिद्ध गुरु होने के बावजूद आखिर क्यों हमारा महान धार्मिक, आध्यात्मिक और धर्मभीरू देश पिछड़ा हुआ है, आतंकवाद, अन्याय, अपराध और भ्रष्टाचार हावी क्यों है, लोग गरीबी और दरिद्रता के मारे परेशान क्यों हैं, कश्मीर में अलगाववादी ताकतें सर क्यों उठा रही हैं, आए दिन अकाल मौत और कहीं न कहीं प्राकृतिक आपदाएं क्यों हो रही हैं, इतनी बड़ी संख्या में धर्म के ठेकेदारों, अनुयायियों और सिद्ध गुरुओं के होते हुए आखिर परेशानियां क्यों हैं, गौ हत्या पर लगाम क्यों नहीं लग पा रही है।

इन सभी प्रश्नों का उत्तर न इन आलीशान आश्रमों और मठों मेंं पूजे जा रहे गुरुओं के पास है, न इनके अंधभक्त और श्रद्धा में डूबे हुए चेले-चपाटियों के पास। कितने गुरु हैं जिनके आश्रमों और मठों में गाए पल रही हैं? कितने हैं जो गौवंश बचाने के लिए आगे आ रहे हैं? सबके पास बड़े-बड़े ओहदे वाले लोग हैं, पूंजीपतियों की भरमार है, क्यों नहीं ये उन लोगों से गौवंश बचाने और पालन के लिए कह पाते। कहें तब जबकि ये असली गुरु हों।

मामूली संख्या में सच्चे, सिद्ध और वास्तविक गुरुओं को छोड़ दिया जाए तो कई जगह गुरुओं की भारी भरकम भीड़ में कोई चेहरा ऎसा नज़र नहीं आता जो सदाचार, पुरुषार्थ, गौवंश, धर्म, सत्य और न्याय की बात करे। सभी को अपनी-अपनी पड़ी है। भक्तों के चढ़ावों से लेकर भोग-विलास, आरामतलबी के साधनों-संसाधनों और सभी प्रकार के विलासितापूर्ण वैभव की चाह ने गुरु पद की सारी की सारी गरिमा को तहस-नहस करके रख दिया है।

असली गुरु सच्चा, सादगीपूर्ण, सरल, निष्कपट, अपरिग्रही, न्यायी, गरीब और अमीर सभी के साथ समान व्यवहार करने वाला, धर्मवान और दिव्य जीवन जीने वाला होता है। धर्म शास्त्रों में गुरु के बारे में स्पष्ट कहा गया है कि गुरु वह है कि जो शिष्य के भीतर-बाहर से अज्ञान मिटाने वाला, आँखे खोल देने वाला, ज्ञानवान, तत्वज्ञ, चैतन्य, शाश्वत, त्रिगुणातीत, सभी प्रकार के द्वन्द्वों और संशयों से रहित, किसी स्थान, व्यक्ति या मोह से बंधा नहीं रहने वाला, भुक्ति-मुक्तिप्रदाता, कर्मबंध का दहन करने वाला, आत्मज्ञान प्रदाता, भवसागर से तारने वाला और शिष्य को परमात्मा की राह देने वाला हो।

हम जिन लोगों के पीछे पागल होकर गुरु-गुरु करते रहते हैं, यदि उनमें यह विशेषताएं हैं तो वाकई वे असली गुरु हैं और उन्हें गुरु मानना चाहिए। लेकिन जो लोग इन सभी लक्षणों मेंं शून्य हैं उन्हें गुरु मानकर हम गुरु जैसे विराट शब्द का अपमान ही करते हैं।

गुरु कितना ही अच्छा-सच्चा और सिद्ध हो तब भी क्या करें, आजकल शिष्यों की फौज ही ऎसी आ रही है कि उसे न तो मानवता से मतलब है, न भगवान, समाज और देश से। इन शिष्यों में से अधिकांश को अपनी मनोकामनाओं की पूर्ति, वशीकरण, मोहन, उच्चाटन, स्तंभन, एक-दूसरे पर प्रभुत्व जमाने, मनचाहे स्थान पर तबादला कराने, शत्रुओं पर विजय पाने, जमीन-जायदाद हड़पने में आ रही बाधाओं को दूर करने, फाईनेन्सरी तिलस्म, रोगों से मुक्ति पाने, पैसा बनाने, गाड़ी-बंगला और संतान चाहने से लेकर तुच्छ सांसारिक कामनाओं की पूर्ति से ही मतलब रहा है, चाहे इसके लिए हर बार गुरु बदलना ही क्यों न पड़ जाए।

इन सबके बावजूद हमें गर्व होना चाहिए कि गुरु-शिष्य की एक मात्र यही परंपरा है जो सदियों से पूरे यौवन पर चल रही है। आत्मज्ञान को पाए बिना कोई गुरु भला नहीं कर सकता। बरसों से लोग गुरु बना रहे हैं, बदलते रहे हैं मगर वहीं के वहीं ठहरे हुए हैं।

हम जैसे असंख्य लोग भी हैं जो गुरु नहीं बना पाए, फिर भी मस्ती और आनंद के साथ स्वाभिमानी जीवन जी रहे हैं। चाहे जो हो गुरु आखिर गुरु है, परमात्मा से भी ऊँचा दर्जा है गुरु का।  कोई भी बिना गुरु का क्यों रहे, गुरु करो, आगे बढ़ो। कैसे बढ़ना है यह शिष्यों की भीड़ से सीख लो।  गुरुपूर्णिमा पर समस्त प्रजातियों के गुरुओं और उनके शिष्यों की फौज के श्रीचरणों में राम-राम। श्रीकृष्णंवन्देजगद्गुरौ।