सरलता न आए तो जीना है बेकार

मनुष्य का पूरा जीवन मनुष्यत्व से दैवत्व के सोपान तय करने के लिए बना होता है लेकिन समझदारी आते ही जीवात्मा मायावी संसार की भुलभुलैया में ऎसा फँस जाता है कि अपने अवतरण के सभी लक्ष्यों और मागोर्ंं को छोड़-छाड़ कर लगातार सफर करने लगता है।

कभी ऎषणाओं के सागर में गोते लगाने लगता है कभी सत्संग में तालियाँ बजाते हुए ईश्वर के समीप होने का भ्रम पाल लेता है और कभी बाहरी चकाचौंध से भर कर पेण्डुलम की तरह इधर से उधर भागदौड़ करने लगता है और इन्हीं जानी-अनजानी यात्राओं से होकर जब परिपक्वता का बीज अंकुरित होने लगता है तब बीत चला बहुत कुछ समय बेकार गुजर जाने का आत्मबोध होने लगता है।

जिन्हें बोध हो जाता है वे संभल जाते हैं और अधिसंख्य लोग संभलने के विचार करते-करते ही वापस उस जगह पहुँच जाते हैं जहाँ से उन्हें भेजा गया होता है। बहुत बड़ी तादाद में ऎसे भी हैं जिन्हें अंत तक भान नहीं हो पाता और जैसे-तैसे बिना कुछ किये धरे लौट जाते हैं। इनके बारे में न आने का पता लग पाता है न जाने का । ये कब आए और कब गए, यह सब स्वप्न की तरह आभासित होता है।

कर्मयोग और कर्मफल का प्रवाह कई पहलुओं पर निर्भर करता है। हर कर्म का फल निश्चय ही प्राप्त होता है।  फल की प्राप्ति कर्म में समाहित भावना के अनुरूप अच्छी-बुरी होती है। मनुष्य के प्रत्येक कर्म में भावना की सर्वोपरि प्रधानता है। शुद्ध और पवित्र भावना से किए जाने वाले हर कर्म का अच्छा, स्थायी और मधुर फल ही मिलता है जबकि खराब भावना से किए जाने वाले कर्म बुरे फल प्रदान करते हैं।

हर व्यक्ति का सपना होता है कि उसे प्रतिष्ठित जीवन, यश, पैसा और पद तथा परिवेश ऎसा प्राप्त हो, जिनसे जीवन भर आनंद का अहसास होता रहे और आने वाली पीढ़ियों के लिए कत्र्तव्य कर्म पूरा होता रहे। इसके लिए आदमी कई प्रकार के मार्ग चुनता है और बढ़ चलता है उधर। कभी आँखें खुली रखकर, तो कभी आँखें मींच कर, कभी श्रद्धा और आदर के साथ तो कभी पूरी तरह अंधविश्वासी और अनुचर होकर। यह सारे मार्ग तीन कसौटियों पर आधारित होते हैं। ये मार्ग हैं- सात्विक, राजसी और तामसिक। इन्हीं के आधारों पर जीवनयात्रा का निर्वाह होता है।

कोई भी मार्ग चुनें यदि भावना श्रेष्ठ है तो इसका फायदा हमें मिलता ही है।  सर्वोत्तम मार्ग है सात्विक। इस पर चलते हुए किसी भी प्रकार का कोई खतरा नहीं होता। पूर्वजन्मों के अच्छे संस्कारों से युक्त और दैव मार्ग को अपनाने वाले लोग इस मार्ग को अपनाते हैं। राजसी और तामसिक मार्ग अपनाने वालों का प्रतिशत ज्यादा हुआ करता है।

कई लोग पद और प्रतिष्ठा तथा पैसे के मोह में इतने डूब जाते हैं कि इनकी चाहना संसार भर को अपनी मुट्ठी में कैद कर लेना ही हो जाती है। कई लोग दूसरों की देखादेखी वे सारे काम करने लग जाते हैं जो आदमी को शोभा नहीं देते।

अर्ध श्रद्धा और अनास्थावादी बहुसंख्य लोग सब कुछ अपने हक में बटोरने के इतने आदी हो जाते हैं कि इनके लिए दिन-रात की सोच का विषय ही यही हो जाता है कि कहाँ से क्या और कैसे प्राप्त कर लें? हथिया लें। इसके लिए वे जागते और सोते हुए भी तिकडम भिड़ाने लगते हैं और ऎसे-ऎसे हथकण्डों का सहारा लेने लगते हैं जिन्हें सार्वजनिक करना मानवता का अपमान होगा।

आदमी हर दिन कुछ न कुछ पाने के फेर में कुटिलताओं और चालाकियों का सहारा लेने लगता है, झूठ-फरेब और लफ्फाजी जैसे विशेष गुण इनके साथ अपने आप जुड़ ही जाते हैं। फिर फरेबी आदमियों को अपनी प्रतिष्ठा बचाए रखने के लिए भी दिन-रात कोशिश करनी पड़ती है। इसके लिए वे सारे जतन करते हैं जो उनकी धूत्र्तता और पाखण्ड को ढका रख सकें। कोई धर्म-अध्यात्म का सहारा लेता है, कोई साहित्य और संस्कृति का तो कोई समाज सेवा का।

ऎसे लोगों का पूरा जीवन दो भागों में विभक्त रहता है। इनकी कुटिलताएं और चालाकियाँ जमाने पर इतनी हावी होती हैं कि इनकी अन्दरूनी हकीकत से लोग बेखबर बने रहते हैं। इन दोनों ही किरदारों के बीच जीते हुए इन लोगों की आत्मा भी मर चुकी होती है।

इन लोगों का हर क्षण समझौतों और समन्वय के साथ ही पाखण्ड और आडम्बर का ताना-बाना बुनने में लगा रहता है। खुद किसी सुरक्षित माँद में रहकर ये लोग कुछ न कुछ चूसने का आनंद लेते हैं और दूसरों को बेवजह विवादों में घेर कर किसी न किसी कँधों पर चढ़कर कुटिल मुस्कान बिखरने के आदी हो जाते हैं।

लगातार कुटिलताओं, चालाकियों और षड्यंत्रों भरी यात्रा से गुजरते हुए ये लोग आखिर में ऎसे मुकाम पर पहुुंच जाते हैं जहाँ इन्हेें अपना पूरा जिस्म मकड़ी जैसा दिखता है जिसके चारों ओर बुने होते हैं जालें, सारे नापाक हथकण्डों और उखाड़-पछाड़ तथा स्टंटों से हथियायी गई शौहरत के।

इन लोगों को श्मशान के करीब पहुंच कर ही यह अहसास हो पाता है कि जीवन भर जाल बुनने में जितना समय लगाया, उससे दस फीसदी भी समय अच्छे कामों में लगाया होता और स्वाभिमान के साथ जिन्दगी जी होती तो जो आज है उससे सौ गुना ज्यादा पा सकते थे। कुटिल और दोहरे-तिहरे (कु) चरित्र वाले ऎसे लोगों को आत्मा की आवाज आनी बंद हो जाती है तभी तो दूसरों की आवाज पर जिन्दा रहने के आदी हो जाते हैं।

यह निश्चय मानना चाहिए कि हम बिना किसी लाग-लपेट के वास्तविक और मौलिक जीवन जीयें उसका अपना अलग ही आनंद है। व्यक्ति भीतर से जितना शुद्ध चित्त और निर्मल होता है उतनी ही ज्यादा ईश्वरीय शक्तियां उसके पास होती हैं और उसके सारे काम स्वतः होने लगते हैं।

जीवन में निर्मलता, सरलता और सहजता के मौलिक गुण जिसके पास हैं, निर्भयता और प्रसन्नता उसका अपने आप अनुगमन करने लग जाती है। ऎसे लोगों को फिर अपने छोटे-छोटे कामों और इच्छाओं की पूर्ति  के लिए दूसरों के भरोसे नहीं रहना पड़ता, और न ही होती है हर दिन किसी न किसी के साथ वैध-अवैध समझौते करने की मजबूरी।

जिसके मन में कपट नहीं होता उसका कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता क्याेंकि निष्कपट और सरल-सहज व्यक्तित्व वाले लोगों पर ईश्वर मेहरबान हुआ करता है। इन लोगों को उनके किए कर्मयोग से जो कुछ फल प्राप्त होता है उसमें आनंद और संतोष का घनत्व हजार गुना अधिक होता है।

इसलिए जीवन में छोटी-मोटी सांसारिक ऎषणाओं को पाने के लिए कपट, छल-फरेब और रोजाना पैशाचिक वृत्तियों वाले लोगों से समझौते करने की विवशता को छोड़ें और चित्त को जितना अधिक निर्मल रख सकें रखें। जीवन की सफलता के लिए भीतर का आनंद निर्णायक होता है और इसी से छलकने लगती है सादगी, सरलता और सहजता की त्रिवेणी।

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