कई जन्मों तक रहते हैं प्रारब्ध, ज्ञान और अनुभव

यह विषय उन लोगों के लिए नहीं है जो पूर्वजन्म या पुनर्जन्म में विश्वास नहीं रखते। यह केवल उन्हीं के लिए है जो सनातन परंपरा के अनुपालक, संवाहक एवं संरक्षक हैं और जिनका पूर्वजन्म व पुनर्जन्म के सिद्धान्त में विश्वास है।

आमतौर पर हम सभी लोग अपनी तुच्छ और संकीर्ण बुद्धि से सोचते हैं और यह मानते हैं कि मनुष्य के रूप में हमारा यह जन्म मृत्यु तक ही है उसके बाद शरीर के समाप्त होते ही सब कुछ नष्ट हो जाने वाला है, कुछ भी बाकी नहीं रहने वाला।

यह कोरा भ्रम ही है। हमें आत्मा के तत्व पर जाकर सोचने की आवश्यकता है कि आत्मा अमर है, शरीर का क्षय होना और नवीन शरीर का प्राप्त होना केवल उसी तरह है जैसे कपड़े बदलना।

इस परम सत्य और यथार्थपरक तथ्य को गीता में अच्छी तरह स्पष्ट किया गया है इसलिए जो लोग गीता का अध्ययन, चिन्तन और मनन करते हैं वे इस आशय को भली प्रकार समझते भी हैं और पूरी तरह मानते भी हैं।

हमारे जीवन की हर घटना-दुर्घटना, ज्ञान, हुनर, अनुभव और सभी प्रकार की हलचलों का संबंध पूर्वजन्म से है और पूर्व जन्म में हम जिन-जिन योनियों में होते हैं उन सभी का न्यूनाधिक अंश वर्तमान जन्म में समाहित होता है।

यही कारण है कि सभी लोगों के विचार, स्वभाव, आकार-प्रकार, गुणावगुण और व्यवहार में अन्तर पाया जाता है। कई लोगों के चरित्र, चाल, स्वभाव और जीवन व्यवहार से हम अच्छी तरह भाँप सकते हैं कि कौन इससे पहले कौन-कौन सी योनियों में शरीर धारण कर चुका होगा।

इसके लिए थोड़ा गहरा और निरपेक्ष भाव से अध्ययन करने की आवश्यकता है। यही सबसे बड़ा कारण है कि हम किसी इंसान को देखकर यह कह डालते हैं कि देवता आदमी है, राजा है या भला आदमी है। और बहुत से लोगों के चाल-चलन और चेहरे को देखकर कह डालते हैं कि दुष्ट, राक्षस, रावण या असुर है।

कई बार हम उल्लू, कुत्ते, सूअर, गधे, सांप-बिच्छू, गिद्ध, कौअे, लोमड़ आदि खूंखार और हिंसक जानवरों का नाम लेते हुए इनकी तुलना करते हैं। कई बार भीखमंगा स्वभाव वाले लोगों के लिए भिखारी, लूटेरे, चोर-डकैत, तस्कर आदि की उपमा दे डालते हैं।

कई बार यह कह डालते हैं कि पहले जन्म का दरिद्री, भीखमंगा, कामचोर और आलसी ही लगता है या कोई पशु रहा होगा।  इसी तरह की सैकड़ों बातें कही जाती हैं। इनका सीधा सा अर्थ यही है कि लोक परंपरा में भी इस शास्त्रीय तत्व को गहरे तक स्वीकार किया गया है कि पूर्वजन्म के लक्षणों का कम-ज्यादा असर वर्तमान जन्म में भी रहता है।

यही वजह है कि दुनिया में वे लोग अधिक सफल और यशस्वी रहे हैं जिन्होंने अपनी मौलिकता और सहज-स्वाभाविक नैसर्गिक रुचियों के अनुरूप कर्म को अपनाया और निरन्तर तरक्की करते चले गए।

यह स्वाभाविक और विलक्षण गुणधर्म मौलिकता के नाम से जाना जाता है और यह मौलिकता और कुछ नहीं, पूर्वजन्म के कार्यों, रुचियों और पसंदीदा विषयों का सम्मिश्रण ही है। इंसान जो कुछ अपने पूर्व जन्म मेंं कर चुका है उसी को यदि वर्तमान जन्म में भी अंगीकार कर ले तो उसी दिशा में वह पूर्वजन्म में अधूरी छोड़ दी गई आशाओं, आकांक्षाओं और कर्मों के आगे बढ़ता है। साधना में भी यही है। जो साधना पूर्व जन्म की है, जहां तक चक्र खुल चुके हैं, वे खुले ही रहते हैं और वर्तमान जन्म में इंसान उससे आगे की यात्रा करता है। उसका पिछला सब कुछ संचित ही रहता है।

साफ शब्दों में कहा जाए तो इस तथ्य को स्वीकार करना होगा कि मौलिकता और रुचियों का मतलब यही है कि जिन कामों और व्यवहार के बारे में हमारा रुझान और ज्ञान है वह पूर्व जन्म का है और उसी दिशा को प्राप्त कर लेने के बाद व्यक्ति शेष यात्रा आरंभ कर देता है।

पूर्वजन्म का सारा ज्ञान, हुनर और अनुभव आत्मा के साथ संचित रहता है और जैसे ही नया शरीर प्राप्त करता है वे उसमें समाहित हो जाते हैं। यदि इंसान के रूप मेंं पैदा हुए तो इसे मौलिक ज्ञान के रूप में प्रतिष्ठा मानी जाती है।

और यदि हमारा अगला जन्म मनुष्य की बजाय किसी जानवर के रूप में हुआ, तब भी इस जन्म के ज्ञान, हुनर और अनुभवों का जखीरा हमारे साथ ही रहता है और वह उस जानवर के व्यवहार में भी अच्छी तरह देखा जा सकता है।

इस सत्य से अनभिज्ञ और छोटी एवं मोटी बुद्धि के लोग वर्तमान देह को ही अपना जीवन मानते हैं और आत्म तत्व को भूलकर दैहिक सुखों और शारीरिक आनंद को भी प्रधानता देते हुए भोग-विलासों में इतने अधिक रम जाते हैं कि वे मौलिकता और रुचियों को भूल कर मार्ग भटक जाते हैं।

इसके बाद इनके जीवन में उतार ही उतार आने लगता है। इस प्रजाति के लोग केवल दैहिक आनंद, अपनी मौज-मस्ती और भोेगों को ही लक्ष्य मानकर अपने स्व कर्म, समुदाय एवं देश के प्रति फर्ज आदि को भुलाकर टाईमपास जिन्दगी जीने के आदि हो जाते हैं और यही प्रयास करते रहते हैं कि जब तक जीना है तब तक ऎसे ही कामों को आज, कल और परसों पर टालते रहो, और आगे बढ़ते रहो।

यह स्थिति इन लोगों के लिए जीवन के उस ठहराव को इंगित करती है जब वे अपनी पूर्वजन्म से संचित मेधा-प्रज्ञा, अनुभवों और मौलिकताओं को पूरी तरह भुला बैठते हैं और इस विस्मृति के उपरान्त उस नए दौर में प्रवेश कर लिया करते हैं जहां उनके पास अपना मौलिक कहने को न कोई ज्ञान होता है, न हुनर या कोई अनुभव।

जो मौलिकता भुला देता है उसका संचित ज्ञान, हुनर और अनुभव अपने आप समाप्त हो जाता है।  इस स्थिति में इंसान उस शून्य में आ जाता है जहां उसके लिए कामचोरी, हरामखोरी, नालायकी, पुरुषार्थहीनता, टाईमपास और दैहिक आनंद या चंद लोगों की परिक्रमा, सेवा और चाकरी के सिवा कुछ नहीं होता।

जैसे-तैसे उसका जीवन समाप्त हो जाता है और आत्मा जब देह से बाहर निकलती है तब ज्ञान, हुनर, अनुभव और पुण्य की बजाय दरिद्रता, प्रमाद, आलस्य, पशुता और आसुरी भावों की तरंगें ही साथ जाती हैंं।

जो लोग कर्म, समाज और देश के प्रति फर्ज से जी चुराते हैं, बिना कुछ किए-धराए प्राप्ति ही प्राप्ति और अपने संकीर्ण सुखों के लिए दिन-रात लगे रहते हैं उनका वर्तमान जन्म तो बिगड़ता है ही, आने वाले कई जन्मों तक वे यों ही भटकते रहते हैं क्योंकि उनके पास अपने जीवन को यशस्वी, प्रतिष्ठित और श्रेष्ठ बनाने के लिए जरूरी मौलिकता की कोई बुनियाद नहीं होती।

जो निरन्तर कर्म करते हैं, फर्ज की ईमानदारी से अदायगी करते हैं उनका ज्ञान, अनुभव और मौलिकताओं का भण्डार हर जन्म में उत्तरोत्तर अभिवृद्धि पाता जाता है और आने वाले जन्म मेंं भगवान भी इनको मनुष्य बनाना पसंद करता है।  किसी न किसी जन्म में ये लोग सम्राट या साम्राज्ञी के रूप में वैश्विक सेवाओं का अवसर पा लेते हैं।