ज्यादा दिन नहीं चलने वाला ये झूठ-फरेब …

जीवन की सफलता अपने आप को बड़ा दिखाने या वैभवशाली बनाने में नहीं है बल्कि अपने आप को उस स्थिति में पहुंचाने में हैं जहां हर कोई हृदय से हमें स्वीकार करे, चाहे हमारा उनसे किसी भी प्रकार का संबंध या परिचय हो या न हो।

जिनसे हमारा संपर्क रहा है उन लोगों की बजाय वे लोग ज्यादा नीर-क्षीर विवेक भरा निर्णय रखते हैं जो हमसे किसी न किसी अपेक्षा या उपेक्षा से बंधे या शिकार नहीं हैं।

अपने परिचितों की बजाय एक आम आदमी हमारे जीवन और व्यवहार का फैसला ज्यादा ठीक ढंग से कर सकता है क्योंकि उसे हमसे कोई काम नहीं पड़ता।

बहुसंख्य लोग फैशनी संसार और पूंजीवादियों के अनुरूप अपने आपको ढालने और दिखाने की कोशिश करते हैं और इस चक्कर में उन सभी रास्तों का सहारा लेते हैं जहाँ से पैसों और प्रतिष्ठा की आवक बनी रहती है।

धन-सम्पत्ति, भोग-विलास और उन्मुक्त आनंद की चाह में लोग सारी मर्यादाओं को भुला डालते हैं और उन रास्तों पर चल पड़ते हैं जहाँ से लौटने पर सिवाय पश्चाताप और लुट जाने के अहसास के और कुछ नहीं होता।

और यह वह स्थिति होती है कि जिसमें ज्ञान शून्यता और विवेकहीनता का मलाल हमेशा बना रहता है। भौतिक संपदाओं से परिपूर्ण वैभव और भोग-विलासिता पाने के लिए आजकल लोग क्या कुछ नहीं कर रहे हैं, यह किसी को समझाने की जरूरत नहीं है क्योंकि हमारे आस-पास खूब सारे लोग हैं जिनका उदाहरण के तौर पर बेफिक्र होकर इस्तेमाल किया जा सकता है।

ये लोग झूठ की प्रतिमूर्ति या झूठ सम्प्रदाय के मठाधीश कहे जा सकते हैं क्याेंकि इनके लिए झूठ बोलना न कोई पाप है, न गलत बल्कि झूठ इन लोगों के जीवन व्यवहार का वह अहम हिस्सा है जो दिन ब दिन और अधिक प्रगाढ़ होता हुआ इनकी जिन्दगी में प्रतिष्ठित हो चुका है।

आरंभ में एक गलती या अपराध को छिपाने के लिए आदमी झूठ बोलता है लेकिन बाद में एक सच को छिपाने के लिए हमेशा झूठ का सहारा लेना मजबूरी हो जाता है। अनचाहे भी झूठ का आश्रय ग्रहण करना ही पड़ता है।

जो लोग कुछेक बार झूठ का सहारा ले लिया करते हैं उनके लिए फिर हर बार झूठ का दामन थामना अपरिहार्य जरूरत ही हो जाती है। इन लोगों के लिए सत्य, धर्म और न्याय का कोई वजूद नहीं होता बल्कि अपने काम निकालना और स्वार्थ पूरे करना, अपने भोग-विलास के साधन तलाशना और मौज-मस्ती में रमे रहकर आनंद पाना ही जीवन का सर्वोच्च लक्ष्य होकर रह जाता है।

अति भोगवादी और भौतिक चकाचौंध में खोकर व अपने आपको डुबो कर आनंद पाने के इच्छुक लोगों के लिए झूठ अपने आपमें वह ब्रह्मास्त्र है जिसका सहारा पाकर वे समय, श्रम और धन आदि किसी पर भी डाका डाल सकते हैं।

झूठ के बूते प्राप्त धन, संसाधन और भोग के आनंद कुछ समय तक उन्मुक्त भोग और मौज-शौक देकर मदमस्त होने का आभास करा सकते हैं लेकिन इनका इससे अधिक कोई भविष्य नहीं होता।

झूठ की नींव पर जिसका जीवन निर्माण होता है वह निर्माण न होकर विध्वंस की भूमिका कही जा सकती है क्योंकि झूठ की बुनियाद पर टिका कोई महल कभी स्थायी नहीं हो सकता है, उसे कभी न कभी तो खण्डहर होना ही है और जब दीवारें गिरने लगती हैं तब  सब कुछ पराया हो जाता है, न भोग-विलास के संसाधन अपने साथ होते हैं न वे व्यक्ति जो हमारा उपयोग करते रहे हैं या हम जिनका उपयोग करते रहे हैं।

झूठ की नींव पर आज तक न कोई टिका है, न टिकने वाला है। बावजूद इसके अंधकार और आसुरी आनंद पाने की तीव्र इच्छाओं के वशीभूत होकर हम सारे के सारे लोग उस दिशा में भाग रहे हैं जिधर किसी न किसी मोड़ पर जाकर भुलभुलैया में भटक कर औंधे मुँह गिरना ही है या फिर पत्थरों से टकरा कर अपनी कपाल रेखाओं को मिटाना ही।

झूठ का जब पर्दाफाश होता है तब अच्छे-अच्छे मजबूत संबंधों की नींव डगमगा जाती है, दिल के दरवाजे खुल जाते हैं ओर तब जो सच सामने आता है वह हमें भी लज्जित कर देने वाला होता है और जमाने भर को भी। झूठ के सहारे कुछ वर्ष जीने का आनंद पा सकते हैं लेकिन कलई खुल जाने के बाद सब कुछ कई गुना विपरीत होने लगता है और जितना आनंद झूठ बोल बोलकर प्राप्त किया होता है। 

जीवन में अंतिम क्षण तक आनंद में रहना चाहें तो झूठ का परित्याग करें। जिन लोगों ने झूठ की बादत ही डाल ली है वे भी प्रायश्चित कर लें और आगे से झूठ और झूठे कर्मों का परित्याग कर दें तो उनका भी समय ताजिन्दगी सुनहरा बना रह सकता है वरना झूठ के सहारे जीने वाले सभी लोगों के रास्ते अंधेरी गलियों और भटकाव की मंजिल तक ही पहुंचते हैं।

ज्यादा दिन नहीं चलने वाला ये झूठ-फरेब …

झूठ-फरेब और भ्रम अल्पायु ही होते हैं। इनका अस्तित्व लम्बे समय तक बरकरार नहीं रह सकता। एक  न एक दिन कलई खुल ही जाती है। चाहे जितना छिपाकर रखा जाए, झूठ कुलबुलाता हुआ अपने आप बाहर निकल कर सत्य का उद्घाटन कर ही देता है।

जिस तरह कोई सा बीज धरती पर कभी भी गिरा हो, किसी के द्वारा भी गिराया गया हो, यह किसी न किसी समय अनुकूलता पाकर धरती का वक्षःस्थल चीर कर बाहर निकल ही आता है। उसी तरह झूठ कभी दब नहीं सकता। वह हमेशा बाहर आने की कोशिश में लगा रहता है। और लोग हैं कि इसे दबाए रखने के लिए दिन-रात नाजायज और घृणित परिश्रम करते रहते हैं और जीवन की सम्पूर्ण ऊर्जा इसी में ही खर्च कर देते हैं।

दिमाग चाहे कितना ही इसे छिपा कर रखे, आत्मा उसे धिक्कारते हुए हमेशा बाहर धकेलने के प्रयास करती ही रहती है और अन्ततोगत्वा वह सफल हो ही जाती है। जीते जी नहीं तो मरने के बाद भी झूठ पीछा नहीं छोड़ता, यह आत्मा के साथ रहकर भूत-पलीत बना देगा, नरकगामी कर देगा या फिर ऎसी योनि दे डालेगा कि जहाँ से मुक्ति के लिए सौ जन्मों तक कोई द्वार खुलने की संभावना ही नहीं रहेगी।

यह उन सभी लोगों को जान लेने की आवश्यकता है जो इसी शरीर को अंतिम और भोगप्रधान मानकर नीच भिखारियों, गिद्धों, कुत्तों और लूटेरों की तरह दोनों हाथों से लूट रहे हैं, लपकते हुए झपट रहे हैं और वह भी झूठ और धोखाधड़ी को अपनाते हुए।

बेगार लेने और धींगामस्ती करे वाले बड़े-बड़े सम्राट नहीं रहे, धन-वैभव वाले नगर सेठ और दुनिया के नामी समुद्धिशाली नहीं रहे, अपने जमाने में परमपूज्य और लोकप्रिय कहे जाने वाले नेता नहीं रहे, राज के धन में सेंध मारने वाले, सरकारी सेवाओं, सुविधाओं और संसाधनों का अपने हक में बेजा इस्तेमाल कर खुश होने वाले, लूट-खसोट और डकैती कर अपार दौलत जमा करने वाले लूटेरे-डकैत नहीं रहे, छोटी-छोटी बातों में रिश्वत लेने वाले भ्रष्टाचारी नहीं रहे, मुफतिया झूठ और परायी खुरचन का स्वाद लेते हुए किसी न किसी के आदमी कहे जाने वाले श्वान ब्राण्ड पालतु नहीं रहे, जिन्होंने जिन्दगी भर झूठ-फरेब, धोखाधड़ी, दलाली, लम्पटी और सर्वस्व दैहिक समर्पण भोग को अपनाया और खुद को बुलन्द करते हुए जमाने भर पर रौब झाड़ा।

फिर हमारी क्या औकात है, जो झूठ और झूठन के सहारे लौकिक और पारलौकिक लक्ष्य और जीवन की सफलता को प्राप्त कर लेंगे। जो झूठा है वह किसी का सगा या साथी नहीं हो सकता। उसके लिए परायों की सेवा-चाकरी और मुफतिया खुरचन चाटना ही जिन्दगी है।

इसलिए झूठ-फरेब के हथकण्डों और झूठे-मक्कार-धूर्त और भ्रष्टाचार से दूर रहने और इनमें लिप्त लोगों से दूरी बनाए रखने में ही काया का कल्याण है। जो माया प्राप्त होनी है वह तो भगवान की कृपा और भाग्य से मिलनी ही है। झूठ-फरेब और धोखाधड़ी से लोकप्रियता और दौलत पाने वालों को यमदूत भी आसानी से नहीं ले जाते बल्कि इन्हें भयंकर दारुण पीड़ाओं के साथ ही जाना पड़ता है। कुछ पीड़ाएं यहां अधूरी रह जाती हैं, उन्हें ऊपर ले जाकर यमराज पूरी करवाता है।

1 thought on “ज्यादा दिन नहीं चलने वाला ये झूठ-फरेब …

  1. कब तक करते रहोगे ये लूट-खसोट और भ्रष्टाचार…

    हर बुरे कर्म की बुनियाद झूठ ही होती है।
    एक बार झूठ का शिलान्यास हो जाने पर इस पर फरेब, असत्य, व्यभिचार, रिश्वतखोरी, दलाली, कमीशनबाजी, लूट-खसोट, शोषण, हिंसक और नरभक्षी जानवरों जैसी क्रूरता, लम्पटगिरी, पक्षपात, अपने-पराये की दुर्भावना, संग्रह प्रवृत्ति और सारी कुटिलताओं का महल खड़ा होना शुरू हो जाता है।
    लेकिन यह कब ढह जाएगा, इसकी गारंटी कोई नहीं ले सकता। न ये पालतु श्वान, और न ही आस-पास के संगी-साथी और इनके प्रशंसक।
    हमारे दुर्भाग्य से आजकल ऎसे खूब सारे लोग हर जगह मूँछ मरोड़ते और पूँछ हिलाते धींगामस्ती करते हुए नज़र आ ही जाते हैं। इनके साथ ही पिल्लों और सूअरों की अंधानुचरी कतारें भी रौब झाड़ती दिखती रहती हैं।
    हममें से ही बहुत से लोभी-लालची, लम्पट और मुफ्तिया विलास पाने के कामी लोग इन्हें परमपूज्य मानकर किसी न किसी लोभ-लालच या अपराधों के संरक्षण व अभयदान की कामना में इनका जयगान और परिक्रमा करते हुए गर्व के मारे फूले नहीं समा रहे।

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