कायरता छोड़ें, दम-खम दिखाएं

विकास के हर संभव आधुनिक सरोकारों, वैश्विक स्तर की आकर्षक चकाचौंध, देह के हर अंग-प्रत्यंग को गुदगुदाकर आनन्द प्रदान करने वाले तरह-तरह के मनमोहक कोमलांग और मोहिनीरूपधारी कोमलांगियों का भरा-पूरा सहज उपलब्ध संसार, चम्पी करने वाले सिद्धहस्त लोग और ब्यूटी से लेकर बॉडी तक निखार देने वाले पार्लरों, अनगिनत किस्मों के संसाधन-उपकरण,  और हर प्रकार की अनुकूलताओं का मजा देने वाले ठिकानों से लेकर परिवेशीय मस्ती लुटाने वाले असंख्य अवसरों के बावजूद आदमी उतना खुश नहीं है जितना पहले तब हुआ करता था जब ये कृत्रिम और अत्याधुनिक संसार नहीं हुआ करता था।

अनाप-शनाप पैसा, हर तरह का वैभव, राजप्रासादों, महलों और किलों जैसे स्थलों का निवास, कई तरह की बत्तियों की टिमटिमाहट, अंगद की कुण्डलिया-पूँछ की तरह के ऊँचे सिंहासन और घुमावदार चेयर्स, एयरकण्डीशण्ड में कूल हुए दिन-रात, बड़े-बड़े पदों का निरन्तर झरता मद, लोकप्रियता के चरम शिखरों का आस्वाद और वो हर तरह का उपलब्ध राजसी वैभव जो बीते युगों में राजा-महाराजाओं और सम्राटों तक को नसीब नहीं हो पाया, अपने आपको भगवान की तरह पूजने वाले मूर्ख भक्तों, अंधविश्वासी अनुयायियों और नासमझ भीड़ आदि सब कुछ हमारे पास या आस-पास है मगर न शांति है, न संतोष और आनंद।

हर तरफ अघोषित तनावों और अजीबोगरीब पीड़ाओं भरा माहौल है। मानवता भीतर ही भीतर कराह रही है। सबको पता है कि सबके साथ कहीं तो कुछ ऎसा हो ही रहा है कि कोई भी न अपने आप से खुश है, न औरों से खुश होने की कोई उम्मीद।

कोई खुद से परेशान है तो बहुत बड़ी संख्या में लोग ऎसे हैं जो औरों को बेवजह हैरान-परेशान करने का ठेका पा लिए हैं और जब तक उनका ठेका समाप्त नहीं हो जाता, तब तक इन नराधमों और असुरों को भुगतना ही है।

चाहे प्रेम से सब कुछ भुगतो या दुःखी होकर। सब तरफ उन्हीं का कुनबा पसरा हुआ है। भोगने वाले भी खूब हैं और भौंकने वाले भी। जब तक हराम या मुफत का भोगने मिलता है, मनचाहा भोग-संभोग और योग-संयोग मिलता रहता है, तब तक सारे के सारे चुपके से दुबके हुए मजे मारते रहेंगे। किसी को न भनक पड़ने देंगे, न अपने पास फटकने देंगे।

चोर-उचक्के और डाकू जिस तरह चोरी-डकैती और लूट के माल का बँटवारा करते हैं, ठीक उसी तरह सारे के सारे किसी सुनसान और सुरक्षित जगह बैठकर बँटवारा करते हैं और फिर अपनी राह चलते चले जाते हैं।

इस मामले में सारे एक हैं, इन्हें दुनिया की कोई ताकत जुदा नहीं  कर सकती। असुरों का हर युग में यही हाल देखा जाता है। सत-असत और सुर-असुर का संघर्ष हर हर युग का अपना धर्म है जो पद्धतियां और चेहरे बदल-बदल कर आता है।

दोनों पक्ष एक-दूसरे को सर्वोपरि मानने की गरज से हमेशा संघर्षशील रहते हैं और हर समय संघर्ष का माहौल खड़ा किये रहते हैं। जो निष्काम, सेवाव्रती और मातृभूमि के हित चिन्तक हैं वे समझौतों और समीकरणों की बनिस्पत सिद्धान्तों और आदर्शों को तवज्जो देते हैं।

और जिन्हें स्वार्थ और अपने कामों की पड़ी होती है वे लोग आसुरी माया को ही सब कुछ समझते हुए उस भीड़ का हिस्सा हो जाते हैं जिसका अपना कोई चरित्र नहीं होता।

दुर्भाग्य से आज का युग घोर कलिकाल है और इसलिए वे दुष्ट और दुष्प्रवृत्तियां हावी हैं जो अज्ञानता, अंधविश्वास और अंधेरों को अपना संगी-साथी मानकर आसुरी वृत्तियों के पिछलग्गू बने हुए हैं।

अंधेरों को पसन्द करने वाले लोगों के लिए माया और पदार्थ सुख देने वाला यह संसार ही सब कुछ है लेकिन अन्तर-बाह्य रोशनी को सर्वस्व मानने वाले लोग आज भी बहुत बड़ी संख्या में हैं किन्तु असंगठित होने के कारण बिखरे हुए हैं इसलिए दुःखी और प्रभावहीन हैं।

सभी समझदार, सज्जन, कर्मयोगी और देशभक्त लोग यह महसूस करते हैं कि बहुत कुछ ऎसा हो रहा है जो न सज्जनों के हित में है, न देश के। इनमें अन्याय, अत्याचार, शोषण से लेकर दमन और वह सब कुछ शामिल है जो एक इंसान को कमजोर करने से लेकर अस्तित्वहीन कर देने के लिए काफी है।

सब स्वीकारते हैं, मन ही मन कुढ़ते रहते हैं, बर्दाश्त करते रहकर सहनशीलता की पराकाष्ठा भी दर्शाते रहते हैं, और आत्मदुःखी होते हुए अन्ततः यह स्वीकार कर लेते हैं कि जमाना ही खराब है, कलियुग का प्रभाव है, जो हो रहा है उसे चुपचाप देखना और भुगतना तो है ही।

समाज और देश में जब सत्यवादी, धर्मनिष्ठ और सज्जनों के मन में परिवेश और सम-सामयिक धाराओं-उपधाराओं को लेकर दुःखजनित वैराग्य उपजने लगे, कुण्ठा का माहौल बनने लगे और विवशता का दामन थाम लेने की मजबूरी आ पड़े, तो समझ लेना चाहिए कि उस समाज और देश का भगवान भी मालिक नहीं होता।

हमारी सदियों की गुलामी और संत्रासों भरे जीवन का कारण ही यह है कि हमने सत्य का साथ नहीं दिया, कुकर्म का प्रतिकार नहीं किया और नालायकों की हाँ में हाँ मिलाते गए, भेड़ों की तरह भेड़ियों के पीछे-पीछे चलते चले गए।

हम सभी चाहते हैं कि सामाजिक और परिवेशीय व्यवस्थाओं में परिवर्तन आए लेकिन यह परिवर्तन लाने के लिए कोई दूसरा आगे आए, खुद आरामगाह में बैठे-बैठे चुपचाप नजारा देखते रहें।

और जब फल पाने का मौका आए तब एकदम से छलांग लगाकर मुख्य धारा में आ जाएं और पूरा का पूरा स्वाद ले उड़ने के लिए तमाम प्रकार के षड़यंत्रों का इस्तेमाल कर सारा का सारा श्रेय लूट लें।

इसी मानसिकता ने देश को कई पीड़ाएं दी हैं। यही सब चलता रहा  तो आने वाला समय अच्छा नहीं कहा जा सकता। अधिकांश लोग तनावों और संत्रासों में जी रहे हैं।

इनके पीछे कोई ठोस कारण नहीं होकर किसी का अहंकार उछालें मार रहा है, किसी के स्वार्थ सध नहीं रहे हैं और बाकी सारे एक-दूसरे को पछाड़ कर आगे ही आगे रहने को उतावले हैं।

इन तमाम हालातों का एक ही उपाय है और वह यह है कि हम  अन्याय, शोषण और अत्याचार को सहना छोड़ें, जी जान से प्रतिकार करें, और यह दिखा दें कि हमारे भीतर दम-खम की कोई कमी नहीं है।

ऎसा नहीं किया गया तो हमारी असामयिक मौत निश्चित है। चाहे वह दमन से हो, अन्याय से उपजे तनावों के कारण मन, मस्तिष्क और शरीर की क्षमताओं के विध्वंस होने से हो अथवा अभावों का वरण करते हुए।

बुराइयों को मारने के लिए हथियार उठाएं और मानवता की रक्षा में समर्पित हों।  घुट-घुट कर जीने और अन्याय सहने से अच्छा है रणक्षेत्र में आकर उन लोगों का मुकाबला करें जो कहर बरपा रहे हैं।

धर्म, सत्य और मानवता की रक्षा के इस पुनीत यज्ञ में कुछ खोना भी पड़े, बलिदान हो गए तो पुरखे और विधाता भी प्रसन्न होंगे अन्यथा बेमौत मर गए तो आने वाली पीढ़ियां भी कायरता के लिए कोसेंगी।