नुगरों से सीखें, खुद को सँवारें

समझदारी की आयु पा जाने के साथ ही हम इस बात को अच्छी तरह जानने लगते हैं कि हमारे लिए क्या अच्छा और क्या बुरा है, हमें किससे लाभ है, और किससे हानि। क्या कुछ करना चाहिए, और क्या नहीं।

यह अलग बात है कि हम अपने क्षुद्र स्वार्थों, लालची स्वभाव और परिग्रही जीवन लक्ष्य के कारण अपने आपको भुला बैठते हैं  कि हमें क्या करना चाहिए और क्या नहीं। अविद्या का मोटा और कुचालक आवरण हमारी बुद्धि, ज्ञान और विवेक पर इस कदर छा जाता है कि हमें होश ही नहीं रहता कि हम जो कर रहे हैं वह कितना न्यायसंगत और उचित है।

हम सभी को पता है कि एक इंसान के रूप में हमारी क्या मर्यादाएं हैं और किस तरह का अनुशासन हमें पालना चाहिए लेकिन हमारे तुच्छ स्वार्थ इतने अधिक हावी हो जाते हैं कि हम सुध-बुध खो बैठते हैं और भेड़चाल को अपना लिया करते हैं।

एक सामान्य इंसान की अपेक्षा बड़े कहे और माने जाने वाले लोगों की स्थिति तो और अधिक खराब होती है। इन्हें जितना अधिक पॉवर मिलता जाता है, उतने अधिक मुफ्तखोर और बिगड़ैल होते चले जाते हैं।

यही कारण है कि बड़े-बड़े, पूज्य, माननीय, सम्माननीय, आदरणीय और श्रद्धेय कहे जाने वाले लोगों में नंगों-भूखों और लूटेरों की मनोवृत्ति अधिक पायी जाती है। आदर-सम्मान और श्रद्धा के मामले में अब दोहरे मानदण्ड अपनाए जाने लगे हैं।

जब से यह मान लिया गया है कि बड़े लोग झूठी प्रशंसा और मिथ्या जय-जयकार से प्रसन्न होते हैं और इन लोगों को खुश करने का सीधा रास्ता खुशामद की गलियों से होकर जाता है और भोग-विलास देने लायक दैहिक आनंद और परितृप्ति के बाड़ों से जुड़ा रहता है, तभी से कार्यसंस्कृति की बजाय चापलुसों, सैटरों और चरण चूमने वालों या लाज-शर्म सब कुछ छोड़कर पूर्ण समर्पण के साथ सामने पसर जाने वालों का जमावड़ा बढ़ता जा रहा है।

बात चाहे बाबाओं की हो या महान कहे जाने वालों की, शुचिता और पवित्रता का प्रभुत्व समाप्त होता जा रहा है। परिवेश में हर तरफ विषमताओं, समस्याओं, अभावों, पिछड़ेपन, असन्तोष और अशान्ति देखी जा रही है।

यह स्थिति किसी दूसरे लोक से आए लोगों ने पैदा नहीं की है बल्कि उन लोगों का किया धरा है जो लोग इंसानी खोल पाकर शैतानी काम करने लगे हैं और मानवता के शत्रु के रूप में मुखर होकर व्यवहार करने को ही जिन्दगी मान बैठे हैं।

बाड़ा कोई सा हो, हर तरफ असामाजिक हो चुके सामाजिक प्राणियों के कारण लोग हैरान-परेशान हैं।  समाज की दुविधा यह है कि हम सभी लोग जानते हैं कि ये लोग जो कुछ कर रहे हैं वह बुराई और आत्मघाती है लेकिन कोई इन भटके  हुए लोगों का कुछ कह पाने या रोकने-टोकने की स्थिति में नहीं है बल्कि सारे के सारे तमाशबीनों के रूप में मजे ले रहे है। कोई गर्दन हिला-हिला कर तालियां बजा रहा है, कोई दोनों हाथ ऊँचे कर सहमति जता रहा है और कोई जयगान तथा परिक्रमाओं में व्यस्त है।

सृष्टि से असुरों और देवताओं का संघर्ष हमेशा रूप और पद्धतियां बदल-बदल कर चलता रहा है। कलियुग होने के कारण आसुरी प्रभाव कुछ ज्यादा ही दिखने में आ रहा है। इसका यह अर्थ नहीं कि सत्य और सज्जनता हाशिये पर आ गए हों। आज भी धर्म, नीति, न्याय और सत्य का प्रभाव मुखर और तेजस्वी है।

सच्चे और ईमानदारों की संख्या कम होने के बावजूद इनका अग्निधर्मा प्रभुत्व इतना अधिक है कि इसकी ऊष्मा के आगे राक्षसी मानसिकता पाले बैठे लोग जलने लगते हैं और इसी कारण से दुष्ट-बदमाश और धूर्त-मक्कार लोग ईमानदारों से सायास दूरी बनाए रखते हैं।

ये लोग गुण्डे-बदमाशों और अपने नालायक व स्वार्थी संगी-साथियों या साथिनों से उतना भय नहीं खाते, जितना कि सच्चे और सज्जनों से। सज्जनों के लिए ये नुगरे और निकम्मे लोग सीख व सबक देने के लिए बहुत बड़ी शक्ति के रूप में काम करते हैं।

हर तरफ दारूड़िये या शराबखोर, हिंसक व क्रूर, मुफ्तखोर, भ्रष्ट, कामचोर, रिश्वतखोर, परिग्रही, शोषक, अत्याचारी, अहंकारी, औरों के दम पर कुत्तों, बंदरों एवं भालुओं की तरह उछलकूद करने वाले, आकाओं के लिए हर तरह के काम करने वाले, मूर्ख और भौन्दू विद्यमान हैं और इनके प्रति समाज और क्षेत्र में जिस तरह की धारणाएं हैं, उन्हें सुन कर हमें सतर्क रहना चाहिए।

इन लोगाें में जो बुराइयां हैं उनके बारे में पूरा जग जानता है और सभी दबे मन से स्वीकार जरूर करते हैं कि ये अहंकारी और मुफ्तखोर मक्कार लोग जो कुछ कर रहे हैं, वह अमानवीय, अत्याचार, अन्याय, शोषण और संवेदनहीनता की श्रेणी में आता है और इनके जीवन का इंसानियत से कोई सरोकार नहीं है।

इसलिए जो बुराइयां और दुर्गुण इनमें हैं, उनसे बचे रहकर हम आदर्शों, सिद्धान्तों और इंसानियत के मूलभूत तत्वों को जीवन में पूर्णतया अंगीकार कर अपनी शुभ्र एवं श्रेष्ठ छवि का निर्माण कर सकते हैं।

हमारे आस-पास रहने और साथ काम करने वाले निकम्मों, नुगरों और हरामखोरों से भी सीखने का प्रयास करने की जरूरत है। इस मामले मेंं हम अपने से ऊपर वालों से भी सीख ले सकते हैं।   और इसके लिए अपने आत्मसुधार के लिए निरन्तर आत्मचिन्तन की दिशा को स्वीकार करने का मार्ग अपनाना चाहिए।

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