कुपुत्रों का मोह त्यागें

कुपुत्रों का मोह त्यागें

मोक्ष या गति-मुक्ति पाने के लिए यह जरूरी है कि जब ऊपर जाएँ तब हमारा मन किसी में अटका न हो, न संतति और न ही सम्पत्ति, संसाधनों या जमीन-जायदाद में।

अक्सर हम कृपणता का आलिंगन करते हुए जिन्दगी भर भिखारियों और दरिद्रियों की तरह बने रहते हैं और जो समय मिलता है उसमें जमा ही जमा करते चले जाते हैं।

खुद के लिए न खान-पान की गुणवत्ता रख पाते हैं और न ही औरों के लिए कुछ कर पाते हैं। हमारे कपड़े-लत्तों को देखकर भी लोग इस बात के लिए चिढ़ते हैं कि इतनी सारी दौलत किस काम की, जबकि भीखमंगों और दरिद्रियों की तरह ही जीना है।

दुनिया में दो तरह के लोग होते हैं। एक किस्म उनकी है जो अपने स्वयं के लिए कुछ नहीं कर पाते। जिन्दगी भर जमा ही जमा करते रहते हैं। स्वयं आत्म कृपणता ओढ़ कर तंगहाली में जीते हैं और खूब सारा माल, जमीन-जायदाद आदि छोड़ कर एक दिन अचानक ऊपर चले जाते हैं।

दुनिया में शायद ही कोई इंसान ऎसा होगा जो सहर्ष मौत का आलिंगन करने को बेताब रहता होगा। बहुत सारे लोग सब जगह होते हैं जो कि यह कहते सुने जाते हैं कि अब तो मौत आ जाए तो ठीक है।

दूसरी ओर ढेरों लोग ऎसे होते हैं जिनके लिए दूसरे लोग यह कामना करते रहते हैं कि भगवान इनको संसार से उठा ले तो खूब सारे लोगों की समस्याओं का खात्मा हो जाए, लोग सुखी हो जाएं। लेकिन दोनों ही अवस्थाओं में मौत नहीं आती। वह तभी आती है जब उसे आना होता है।

भाग्यशालियों के लिए भूत कमाते हैं, यह कहावत सौ फीसदी सच बैठती है। हम अक्सर देखते हैं कि लोग दिन-रात का चैन गँवा कर कोल्हू के बैल की तरह इधर-उधर भागते रहते हैं और इधर-उधर भी करते रहते हैं।

कई लोग निन्यानवे के फेर में रमे रहते हैं और बहुत से ऎसे भी हैं जो चार सौ बीसी की धुन में लगे रहते हैं। इंसान तरह-तरह के जायज-नाजायज कामों के लिए ऎसे-ऎसे समझौते करता रहता है जो उसकी आत्मा को भी स्वीकार नहीं होते।

ऎसे-ऎसे असुरों से सम्पर्क बिठाता है कि जिन्हें देख कर लगता है कि आदमी कितना नीचे गिरता जा रहा है। उन लोगों की चरण चम्पी करता रहता है जिन्हें कुत्ते भी सूंघना पसंद नहीं करते।

अपने आपको नीचे गिरा कर ऊपर उठ जाना आज के युग के आदमी का सर्वमान्य मानक हो गया है। हर जगह उन लोगों की संख्या बढ़ती जा रही है जो अपने आपको नीचे गिराकर उठाईगिरों की तरह कहीं किसी की गोद में जा धमकते हैं, कभी किसी गुदगुदी और मखमली घास के मैदान में जाकर मटरगश्ती करने लगते हैं और कभी किसी न किसी के पाँव दबाते हुए अपने आपको धन्य मानते-मनवाते रहे हैं।

आजकल लोग अपने स्वार्थ और दूसरों का नीचा दिखाने के लिए कुछ भी कर सकते हैं और कर रहे हैं। खूब सारे लोगों का मानना है कि वे चाहे कितना कुछ जमा कर रहे हों, जमीन-जायदाद से लेकर सब तरह का प्रभुत्व बनाने के लिए दिन-रात मेहनत करते हैं, षड़यंत्रों और कुटिलताओं को भरपूर उपयोग करते हुए  अपने वजूद को बनाए रखने के लिए नापाक हथकण्डों के ताने-बाने बुनते रहते हैं लेकिन उनकी संतति संस्कारहीन होती जा रही है, मेहनत करना नहीं चाहती, ऎय्याशी में पैसे उड़ा रही है, व्यभिचारी मानसिकता का खुले आम नंगा और भौण्डा प्रदर्शन कर रही है, नाम बदनाम कर रही है और इज्जत मिट्टी में मिला रही है।

न आज्ञाकारी रही है, न मर्यादित। ऎसी संतति का क्या करें। बहुत से लोग हैं जो अपने कुपुत्रों से परेशान हैं। कहीं यह सुनने में नहीं आता कि कुपुत्रियां हैं कहीं। सब जगह बिगड़ैल औलाद की बात आती है तब कुपुत्रों की की चर्चा होती है।

हमारा दुर्भाग्य यह है कि जब धर्म, सत्य, न्याय, नीति और संस्कारों की बात आती है तब हम सभी लोगों को अपनी संतति के दोष नहीं दिखाई देते। आज बहुत से युवा गुटखे, बीड़ी-सिगरेट, तम्बाकू, दारू, ड्रग्स, अफीम, गांजा, चरस, भंग और तमाम तरह के नशों की गिरफ्त में हैं, व्यभिचारी मनोवृत्ति को अपना चुके हैं, इन्हें अपनी माँ के हाथ का बना खाना नहीं भाता, इसलिए दोस्तों के संग होटलों में मुँह मारने के आदी होते जा रहे हैं।

हमने इतिहास से भी सब नहीं लिया है। गांधारी और धृतराष्ट्र बने हुए हम उन लोगों को बर्दाश्त कर रहे हैं जो कौरवी मानसिकता वाले हैं। जहां जो लोग कुपुत्रों के मोह से ग्रस्त हैं उन सभी के लिए जीवन का सर्वाधिक काला पृष्ठ यही है कि उन्होंने जैसी संतति की कामना की थी, वैसी नहीं है।

खूब सारे पिताओं  और माताओं को अपने बेटों को देखकर दुःख होता है। यह पछतावा भी होता है कि आखिर इन्हें जन्म ही क्यों दिया होगा।

खराब से खराब व्यवहार और उपेक्षा के बावजूद जो माता-पिता अपने कुपुत्रों को सुधार नहीं पाते हैं, उनकी स्वेच्छाचारी प्रवृत्तियों पर लगाम नहीं लगा पाते हैं उन सभी लोगों का बुढ़ापा बिगड़ता है।

और जिनका अंतिम समय बिगड़ जाता है उनके अगले जनम भी खराब ही होते हैं।  इसलिए जरूरी हो चला है कि कुपुत्रों के प्रति मोह का सम्पूर्ण त्याग ताकि इनके कारण से न हमारा बुढ़ापा बिगड़े और न आने वाले जन्म। नालायक संतति से मोह भंग करते हुए बचा-खुचा शेष जीवन अनासक्त भाव से जीना ही वार्धक्यावस्था का धर्म है।