आत्म तत्व को जानें, भीतर की यात्रा करें

आत्म तत्व को जानें, भीतर की यात्रा करें

हम सभी लोग आत्म आनंद, शांति और सभी प्रकार की तृप्ति की तलाश में जिन्दगी भर कभी इधर और कभी उधर भटकते रहते हैं पर उसे प्राप्त नहीं कर पा रहे हैं जिसकी तीव्र चाहत है।

मूल कारण यह है कि जो हमारे भीतर है उसे हम बाहर तलाश रहे हैं और जो बाहर है उसे पाने के लिए बरसों तक भटकते रहते हैं। चाहे कितने ही बरस हम बाहर की दुनिया में से कुछ भी तलाशते रहें, कुछ हासिल होने वाला नहीं है। सृष्टि का सम्पूर्ण केन्द्र हमारे भीतर है और इसे ही हम विस्मृत कर बैठे हैं। पाश्यात्य लोमड़-लोमड़ियों की पूँछ पकड़ कर हम आनंद को पाना चाहते हैं जिस आनन्द को पाने के लिए ये पाश्चात्य लोग भारत के ज्ञान-विज्ञान और अध्यात्म पर निर्भर रहते आए हैं।

कितनी अजीब बात है कि भोग भूमि वाले सारे उन्मुक्त भोग और स्वच्छन्द विलास को पा लेने के बाद कर्म भूमि भारत की ओर टकटकी लगाए बैठे रहते हैं और हम कर्मभूमि वाले लोग खुद को भुला कर भोग भूमि वालों के पिछलग्गू बनकर अंधानुकरण कर रहे हैं।

आज का पूरा का पूरा समय हमारे लिए अन्धानुकरण का है और हम सभी लोग अपने आप को भुला बैठे हैं, अपनी संस्कृति, संस्कारों और परंपराओं को तिलान्जलि देकर उन लोगों के पीछे भाग रहे हैं जिनके लिए न कोई कुटुम्ब है,  न संस्कृति और सभ्यता। जो कुछ है खाओ-पिओ और मौज करो के सिद्धान्त को आकार देने वाला है। मतलब यह है कि जो पशु कर रहे हैं वही हम लोग कर रहे हैं, फिर कौनसा अन्तर रह गया है हममें और चौपायों में।

असल में हमारी स्थिति भेड़ों की रेवड़ जैसी ही है जिन्हें यह तक पता नहीं रहता कि हमें कौन कहाँ ले जा रहा है, क्यों जा रहे हैं। बस आगे वाले जा रहे हैं इसलिये हम भी पीछे पीछे हो लिए हैं।

यह जीवन एक प्रयोगशाला है जिसका जितना अधिक शोधन, दोहन और अनुसंधान किया जाए उतना सार तत्व प्रकट होता है, उतनी जी जिज्ञासाओं, शंकाओं और प्रश्नों का समाधान करता है।

हम में से अधिकांश लोग हमेशा सशंकित जीवन जीते हैं और किसी ठोस निर्णय के करीब पहुंचने से पहले ही भ्रमित होकर अपने रास्ते बदल डालते हैं। हम थोड़ा सा कुछ कर डालते ही बड़ा सा फल पाने की उम्मीद में इतने अधिक आतुर रहते हैं कि हम हर बार थोड़े-थोड़े प्रयास ही करके छोड़ते रहते हैं और इसका खामियाजा यह होता है कि हमें अपने पर भी अश्रद्धा होती हैं और अपने कर्म पर भी।

हम हर बार 2 या 4 फीट के खड्डे खोदकर जमीन से सरसता पाने की उम्मीद रखते हैं और  बार-बार हताश-निराश ही होते हैं। इसकी बजाय हमने यदि परिश्रम करते हुए एकाग्रता और निष्ठा से एक ही लक्ष्य को पकड़ा होता तो आज निहाल हो जाते। पर मानव का स्वभाव ही ऎसा है कि उसे अश्रद्धा, अविश्वास और शंकाएं हमेशा घेरे रहती हैं और वह इनसे कभी उबर नहीं पाता।

इसे हमारा दुर्भाग्य ही कहा जाना चाहिए कि हमारे पास मार्ग निर्देशकों का अभाव है या उनमें सच्चाई की बजाय झूठ फरेब ज्यादा घुस आया है। इसलिए हमें या तो आधा-अधूरा सच बताया गया है अथवा पूरा ही झूठ।  हमें धर्म, सत्य, सदाचार,  ईश्वर,  लोक व्यवहार,  जीवन लक्ष्य, आत्मा परमात्मा के संबंध आदि सभी के बारे में पूरा का पूरा नग्न सत्य नहीं बताया गया है।

हमने भी औरों के कहने-सुनने के मुताबिक जीवन को ढाल लिया है।  जबकि हम जिसे जानना चाहते हैं वो सब कुछ हमारे पिण्ड में उपलब्ध है। केवल जानने भर की जरूरत है। पिंड और ब्रह्माण्ड का सनातन और शाश्वत संबंध है। जो पिण्ड को जान लेता है वो ब्रह्माण्ड को जान लेने की अपार क्षमताएं प्राप्त कर लेता है।

जिंदगी भर जो बाहर ही बाहर की दुनिया में से अपने लिए कुछ भी तलाशते रहते हैं वे कई जन्मों तक भी अपनी इच्छित मनः कामना या जीवन को समझ पाने में विफल रहते हैं। इन्हें तनिक भी अहसास नहीं हो पाता।

अपने पिंड के महत्व को जानने-समझने की कोशिश करने मात्र से अपने ही भीतर वो सब कुछ अनुभव होने लगता है जो हम देखना, पाना और इनसे आनंद लेना चाहते हैं।

अपने आपको जानना कला है और अपने भीतर को अनुभव करना विज्ञान है। यह राह कोई कठिन नहीं है, केवल एक बार सच्चे मन से उस दिशा में डगर बढ़ाने की जरूरत है। एक बार दृढ़ निश्चय कर लो और भीतर डुबकी लगा लो, फिर देख लो।

इस पिण्ड में वो सब कुछ है जो बाहर है, न केवल दुनिया बल्कि समूचे ब्रह्माण्ड में है। जो दिखाई दे रहा है वह भी इस पिण्ड में है और जो अदृश्य अगोचर है वह भी इसी में समाहित है। जो पिण्ड को जान लेता है, साध लेता है वो सब कुछ जान लेता है, उसे फिर कुछ भी प्राप्त करने की आवश्यकता नहीं रहती। पिण्ड और ब्रह्माण्ड के संबंधों का सच जो जान लेता है वह फिर कभी शंकित नहीं रहता।