चलते रहें अपनी डगर

अपने वंश-परंपरागत आनुवंशिक संस्कारों, स्वभाव और चरित्र के अनुसार हर मनुष्य अपनी राह तलाश कर उस पर चलता रहता है।

हर इंसान का यह मौलिक गुण होता है कि वह वही करता है जो उसकी कल्पनाओं में होता है। कल्पनाओं यह का संसार उसके पूर्वजन्म के संचित ज्ञान और अनुभवों का भी हो सकता है, आनुवंशिक भी हो सकता है और जन्म लेने के उपरान्त मिले माहौल, दुर्जनों, खल, कुटिल और कामी

लोगों के कुसंग, हराम के खान-पान और रहन-सहन का असर भी हो सकता है।

मौलिकता के साथ जीवनयापन वह है जिसमें हर इंसान अपनी बुद्धि, मन और कल्पनाओं के अनुरूप बढ़ता रहे और जो सोचा हुआ लक्ष्य है उसे पूरा करता हुआ आयु पूर्ण कर ले और लौट जाए।

जीवन जीने के रास्तों में तीन ही मुख्य होते हैं – सत, रज और तम। इसी के अनुरूप मनुष्यों की श्रेणियां बन जाती हैं जिन्हें तरह-तरह के नामों से जानते हैं।

लेकिन सार यही है कि इंसान के लिए पुरुषार्थ चतुष्टय अर्थात धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष ही प्रधान हैं जिनका आनुपातिक संतुलन कायम रखते हुए इंसान अपनी सम्पूर्ण जीवन यात्रा को तय करता है।

यह अनुपात काल सापेक्ष होता है। यदि उस काल का व्यतिक्रम कर इसे आगे-पीछे या इसके घनत्व को न्यूनाधिक करता रहे, तो उस इंसान को जीवन में कभी सुख प्राप्त नहीं हो सकता।

भोग, विलास और दैहिक सुख प्राप्त करना सभी के लिए संभव हो सकता है किन्तु इनसे या अन्य कारकों से उत्पन्न आनंद की प्राप्ति करना मुश्किल हो जाता है।

 

इससे भी ऊपर उठकर आत्म आनंद की प्राप्ति करना तो और भी कठिन है। कई लोग नकारात्मक मार्गों  और अंधेरे कर्मों का सहारा लेकर आगे बढ़ते हैं और कुछ लोग शुभ्र कर्मों के सहारे सकारात्मक जिन्दगी को अपनाते हुए जीवन को सफल बनाते हैं।

इन्हीं के आधार पर इंसान की जिन्दगी का समग्र मूल्यांकन होता है। एक प्रजाति के लोग हमेशा दैहिक सुखों, भोग-विलास, लूट-खसोट और भ्रष्टाचार से धन-सम्पदा अर्जित करने, सारी मर्यादाओं और अनुशासन को छोड़कर अपने ही अपने लिए जीते हैं, पूरी जिन्दगी दुनिया का सारा वैभव

 

और संसाधनों का लाभ पाने के लिए छीनाझपटी के प्रयास करते रहते हैं।

ये लोग अपने छोटे से तुच्छ लाभ के लिए औरों का कितना ही बड़ा नुकसान करने में लगे रहते हैं, अहंकारों में फूल कर कुप्पा होते हुए फर्जी शिकायतों और निन्दा में रमे रहते हैं, मैली विद्याओं का सहारा लेकर लोगों को तंग करने की कोशिशों में लगे रहते हैं।

अपनी ही तरह के आसुरी भावों वाले लोगों के समूह बनाकर छापामार योद्धा या जासूस की तरह छिद्रान्वेषण और जासूसी में जिन्दगी खपा देते हैं, दलाली और चापलुसी को अपनाकर औरों के नाम और सहारों के आधार पर धींगामस्ती करते रहते हैं, सारा स्वाभिमान और सम्मान किसी न किसी के चरणों में रखकर पूर्ण समर्पण भाव से सब कुछ खोल खुला कर पूरी पारदर्शिता से पसर जाने की आदत पाल लेते हैं,  धौंस जमाकर भय का माहौल पैदा करते रहते हैं और अपनी खोटे सिक्कों को धडल्ले से चलाने की कला में माहिर रहते हैं।

ऎसे लोगों के द्वारा न किसी का भला हो सकता है, न किसी को आनन्द प्राप्त हो सकता है। यों कहें कि दुनिया में ये लोग सीधे-सादे, निर्बल और श्रेष्ठ सज्जनों को दुःख व तनाव देने के लिए ही पैदा हुए हैं, तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी।

असुरों से इनके एक-एक स्वभाव, व्यवहार और गुणावगुणों की तुलना की जाए तो ये लोग असुरों से भी सौ गुना आगे निकलेंगे क्योंकि इनके पास वो सब है जो असुरों के पास भी नहीं था।

दूसरी ओर भोले-भाले ईश्वरपरायण सज्जनों की प्रजाति है जो अपनी मर्यादाओं, अनुशासन और दायरों में रहकर सामाजिक प्राणी के रूप में जीवन निर्वाह करती है।

जो मिलता है उसी में संतोष करती है, भ्रष्टाचार, दलाली, चापलुसी, रिश्वतखोरी, हराम के खान-पान, पराये संसाधनों के उपयोग और परिग्रह से दूर रहती है और कानून-कायदों में रहकर चलती है, ईश्वर में अगाध आस्था और विश्वास रखती है और इनके कारण से कोई भी सच्चा और अच्छा इंसान दुःखी नहीं होता बल्कि जो इनसे मिलता है वह सुकून ही पाता है और बार-बार मिलने की आतुरतापूर्वक प्रतीक्षा करता रहता है।

इन दो प्रकार की इंसानी प्रजातियों में आपस में कहीं कोई प्रतिस्पर्धा नहीं होनी चाहिए लेकिन देखा यह गया है कि असुरों की तरह जीने वाले लोग हमेशा सज्जनों और सत्यगामी लोगों से बेवजह प्रतिस्पर्धा पालकर अपने को प्रतिस्पर्धी और तीव्र शत्रु मान बैठते हैं।

जबकि इन दोनों धाराओं के बीच कोई दूर-दूर तक का रिश्ता नहीं है। सज्जनों के खेमे में कभी इन आसुरी लोगों की चर्चा नहीं होती, सज्जन इनके खिलाफ कुछ बोलने या करने से दूर रहते हैं, इनके बारे में सोचते तक नहीं हैं।

फिर भी आसुरी जीवन जीने वाले इन कलियुगी राक्षसों, राक्षसियों और नरपिशाचों को लगता है कि दुनिया में उनके यदि कोई सबसे बड़े शत्रु हैं तो वह वे लोग हैं जो सज्जन हैं और अपने काम से मतलब रखते हैं। देवों और सज्जनों से असुरों की यह जाती दुश्मनी हर युग में रही है और यों ही रहेगी क्योंकि अब कलियुग में यही बहुसंख्यक होते जा रहे हैं और सज्जन अल्पसंख्यक। दुनिया में जाति और धर्म की बजाय दुष्टता और सज्जनता के आधार पर जनसंख्या का निर्धारण किया जाए तो असुर बहुसंख्यक ही निकलेंगे, सज्जनों की संख्या अत्यल्प ही रहेगी।

सज्जनों के मुकाबले ये असुर लोग इसलिए भारी पड़ते हैं क्योंकि कलियुग में नालायकों, नुगरों और कमीनों के समूह बिना किसी प्रयास के बन जाते हैं जो एक-दूसरे को संरक्षित करने और सहयोग देने से कभी पीछे नहीं हटते।

‘संघे शक्ति कलौयुगे’ का सबसे अधिक नाजायज फायदा किसी ने उठाया है वे यही लोग हैं जो दिखते तो इंसान हैं, खोल भी इंसान का है, लेकिन इनके रग-रग में ईष्र्या, द्वेष, मक्कारी, धूर्तता, संवेदनहीनता, क्रूरता और कटुता भरी हुई है।

जो लोग आसुरी मार्ग को श्रेयस्कर मानते हैं वे अपने मार्ग पर चलते रहें, कोई उन्हें रोकने-टोकने वाला नहीं है क्योंकि बहुत सारी भीड़ आजकल यही कर रही है लेकिन इन कलियुगी राक्षसों को चाहिए कि वे सज्जनों से प्रतिस्पर्धा न करें क्योंकि इसका कोई लाभ उन्हें नहीं है।

सज्जनों और दुर्जनों दोनों के मार्ग अलग-अलग हैं। जिसने एक बार दुर्जनता को अपना लिया हो, वह जिन्दगी भर वैसा ही रहता है। इन असुरों को सुधारने या इन्हें कुछ कहने का कोई अर्थ नहीं है क्योंकि इनके लिए जिन्दगी के अर्थ और पैमाने कुछ और हुआ करते हैं। सज्जनों के लिए यही श्रेयस्कर है कि धर्म,सत्य और ईमानदारी की डगर पर चलते रहें, यही उनके लिए कवच भी है और जीवन भर आनंद प्रवाह बनाए रखने का रास्ता भी।