दवाओं से बचना हो तो दुआएं पाते रहें

हर बीमारी के पीछे सिर्फ शारीरिक समस्याएं ही नहीं होती बल्कि इनमें मानसिक विकारों और तनावों का योगदान अधिक रहता है। या यों कहें कि तकरीबन सारी बीमारियों की जड़ मानसिक ही है तो कोई गलत नहीं होगा।

       दुनिया में कुछ बिरले लोग ही होने संभव हैं जो बिना किसी मानसिक या शारीरिक व्याधियों के जिन्दा हों। अन्यथा सभी लोग किसी न किसी बीमारी या उन्माद से ग्रस्त हैं। अधिकांश लोग किसी न किसी रूप में बीमार हैं ही। कोई मानसिक है तो कोई शारीरिक। और बहुत से ऎसे भी मिल जाएंगे जो दोनों प्रकार के रोगी हैं।

आजकल हालात बड़े अजीब हो चले हैं। इन हालातों में हम न केवल मानसिक और शारीरिक बीमार हैं बल्कि इनके साथ ही हममें से अधिकांश लोग विकलांग भी हैं। हम सभी को दिव्यांगों की तरह अंग उपकरणों, बैसाखियों और मददगार संसाधनों की आवश्यकता होती ही है। इनके बगैर हम सारे बीमार ही हैं या फिर आधे-अधूरे और नाकारा।

कोई चश्मे के बिना पास और दूर के दृष्टि दौर्बल्य से पीड़ित है, कोई कुर्सी के बिना बैठ नहीं सकता, लकड़ी के बिना चल नहीं सकता, श्रवण यंत्रों के बिना सुन नहीं सकता और ऎसी ही ढेर सारी समस्याओं के कारण रुग्णता भोग रहा है।

बहुत से हैं जो शौच जाने के लिए भी परंपरागत ढंग से पुराने लोगों की तरह बैठ नहीं सकते। ये सारी स्थितियाँ इसी बात को इंगित करती हैं कि हम सारे बीमारी से ग्रसित ही हैं। पूर्ण स्वस्थ तो बहुत कम लोग ही हो सकते हैं।

       आरंभिक तौर पर बीमारियों का जन्म मानसिक धरातल पर होता है और इनके बीज मन के धरातल पर अंकुरित होते हैं और इसके बाद दिमागी खाद से परिपुष्ट होकर पल्लवित होने लगते हैं तथा समय पाकर शरीर में प्रस्फुटित हो जाते हैं।

       इसलिए यह कहा जाए कि हर बीमारी का मूल कारण मन की उपज है, जो गलत नहीं होगा। यदि मन और मस्तिष्क के स्तर पर ही किसी भी प्रकार के तनाव, विषाद और अवसाद के बीजों का खात्मा कर दिया जाए तो शरीर कई प्रकार की बीमारियों से मुक्त रह सकता है।

       लेकिन ऎसा कर पाना सामान्य लोगों के बस में कभी नहीं होता। इसके लिए चरम आत्मविश्वास और ईश्वर के प्रति अगाध आस्था का भाव होना चाहिए।     जिन लोगों को अपने आप पर विश्वास होता है वे लोग संसार में अपने अकेले के बल पर परिवर्तन लाने में समर्थ होते हैं जबकि अपने आप पर भरोसा नहीं रखने वाले लोग हमेशा पराजय और हताशा का सामना करते हैं।

       इसी प्रकार स्वास्थ्य का पाया भी सुदृढ़ आत्मविश्वास और रोग प्रतिरोधक क्षमताओं के साथ ही सेवा और परोपकार पर निर्भर है। सेवा और परोपकार भी वही कर सकता है जिसका मन उदार हो, मस्तिष्क खुला हो और वृत्तियां लोक मंगलकारी हों, क्योंकि इसी प्रकार के लोग समाज के लिए जीते हैं।

       इनके पास अपना कहने के लिए कुछ नहीं होता, जो कुछ होता है वह समाज का होता है इसलिए इसकी रखवाली और अभिवृद्धि के लिए किसी भी प्रकार की चिन्ता नहीं होती। यही कारण है कि सांसारिक ऎषणाओं से मुक्त होकर जीने वाले ये लोग सांसारिक मानसिक विकारों और प्रदूषित वृत्तियों से दूर रहते हैं और इनका मन-मस्तिष्क हमेशा ताजा होता है।

       जो लोग वैचारिक दृष्टि से हमेशा उदारवादी, सेवाभावी और परोपकारी होते हैं उन लोगों को अवसाद या तनाव छू भी नहीं पाते क्योंकि तनाव, अवसाद, शोक, पीड़ा और दुःख उन्हीं लोगों को होते हैं जो लोग अपने स्वार्थ के लिए पैशाचिक धंधों में रमे रहते हैं, षड़यंत्रों को पेट और घर भरने के साधन बनाते हैं, हर क्षण किसी न किसी प्रकार की सैटिंग में अस्त-व्यस्त रहते हैं, जायज और नाजायज समझौतों को अपनाते रहते हैं।

       यह जरूरी नहीं है कि हमारी हर खुराफात और षड़यंत्र हर अवसर पर सफल हो ही जाएं, बहुधा हमें असफलता हाथ लगती है और यही हमारे दुःखों और पीड़ाओं का कारण बन जाती है जो हर क्षण तनाव, उन्माद और उद्विग्नता के साथ मानसिक और शारीरिक आवेगों की गति को आकस्मिक रूप से न्यूनाधिक कर देती है।

       यहीं से हमारी सेहत की बरबादी का आत्मघाती दौर आरंभ होता है। जब-जब भी ऎसी अनचाही स्थितियां सामने आती रहती हैं हमारी सेहत के लिए चुनौतियां खड़ी होती रहती हैं।

       यह क्रम बारम्बार सामने आ जाने की स्थिति में शरीर का कोई न कोई अंग दुष्प्रभावित  हो ही जाता है जिससे उसकी कार्यक्षमता या तो मंद हो जाती है अथवा बंद।

       अधिकांश लोगों की मानसिक और शारीरिक सेहत खराब रहने तथा साध्य-असाध्य बीमारियों का असर दिखने का मूल कारण उनकी जीवनशैली, कार्य संस्कृति और व्यवहार है।

       यह सब अच्छे होने की स्थिति में इंसान को दुआएं ही दुआएं मिलती हैं और यही दुआओं की ताकत उन्हें दवाओं से दूर रखती है।

       जिन लोगों को दीर्घायु व यश चाहिए उनको चाहिए कि वे दुआओं को पाने के लिए निरन्तर तत्पर रहें, सेवा और परोपकार के काम करें और अपने जीवन को कारोबारी की बजाय सेवाभावी बनाएंं।      ये परोपकारी कर्म हमें दुआएं देते हैं और दुआओं के भण्डार को इतना अधिक समृद्ध कर देते हैं कि हमें दवाओं की जरूरत नहीं पड़ती।

       सेवाभावी और परोपकारी स्वभाव की बजाय स्वार्थी और कारोबारी व्यक्तित्व पैदा हो जाने पर इंसान अपने संपर्क में आने वाले हर इंसान और कर्म को किसी धंधे से कम नहीं समझता जहाँ मुनाफा कमाना ही जीवन का परम उद्देश्य रहता है, सेवा-परोपकार तथा मानवीय मूल्य और संवेदनाएँ गौण।

       यह स्थिति बददुआओं की हम तक पहुँच की गति और घनत्व को तीव्रतर कर देती है और यही बददुआएं हमारे आभामण्डल को इतना अधिक छेद डालती हैं कि हमारा पूरा जीवन दवाओं पर निर्भर हो जाता है और मरते दम तक दवाएं तथा तरह-तरह की जाँचें हमारी संगी साथी बनी रहती हैं।

       दुआओं और दवाओं में शाश्वत शत्रुता रही है। जहाँ दुआएं होंगी वहाँ दवाएं नहीं होंगी। जहाँ दुआएं नहीं होंगी वहाँ किसम-किसम की दवाओं का इस्तेमाल इंसान की मजबूरी होगा। दवाओं और दुआओं में से एक को चुन लें। न चुनें तब भी दोनों में से एक का ही वजूद रहेगा।  तय हमें ही करना है – दवाओं पर जिन्दा रहें या दुआओं का आनंद पाएं।

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