दिल पारदर्शी रखें, और दिमाग साफ-सुथरा

मनुष्य जीवन में ईश्वरीय सत्ता का अनुभव करने तथा भीतरी आनंद और मस्ती के साथ जीवनयापन के लिए चित्त का शुद्ध-बुद्ध होना अनिवार्य और पहली शर्त है। इसके बगैर ऎसा कोई माध्यम नहीं है जो मनुष्य को द्वन्द्वों, उद्वेगों, असन्तोष और अशांति से पृथक रखकर आनंद की भावभूमि प्राप्त करा सके।

मनुष्य जब जन्म लेता है तब बालक के स्वरूप में वह अति सुन्दर व सर्वप्रिय रहता है। लेकिन जैसे-जैसे बड़ा होता चला जाता है उसकी सर्वप्रियता गायब हो जाती है और उन्मुक्त एवं निश्छल हास्य तथा मस्ती का भाव क्षीण होता चला जाता है। जबकि मनुष्य वही है लेकिन वय बढ़ने के साथ उसके प्रति रागात्मक व प्रेमात्मक भाव कम होता चला जाता है।

इसका कारण यह है कि जब तक उसका चित्त निर्मल होता है, बुद्धि विकारों से मुक्त रहती है और वह पवित्र रहता है तभी तक सर्वप्रिय और सद्यः राग उत्पन्न कर देने वाला रहता है।

आयु बढ़ने के साथ ही जैसे-जैसे बड़ा होने लगता है, जमाने भर के संस्कार उस पर छाने लगते हैं। बड़े लोगों की संगति में उसे अपने-पराये और स्वार्थ का बोध होने लगता है और इस प्रकार धीरे-धीरे संसार की माया उसके चित्त पर मोह तथा स्वार्थ के कई सारे आवरण चढ़ा देती है। बस यहीं से उसके चित्त की सौ फीसदी निर्मलता धीरे-धीरे कम होती चली जाती है।

दूसरी अवस्था में यदि बालक को ईश्वरीय ज्ञान और दिव्य संस्कार प्राप्त होने पर उसके चित्त की शुद्धता बनी रहती है और आयु बढ़ने के बावजूद उसमें मलीनता का संचार नहीं होता, तब उसके प्रति बचपन से चली आ रही सर्वप्रियता का भाव निरन्तर बना रहता है।

मनुष्य ईश्वर की सर्वोत्तम कृति है और वह अपने कर्म तथा जीवन को दिव्यता प्रदान करते हुए दैवत्व की प्राप्ति तक कर सकता है लेकिन तभी जब संसार के कुसंस्कार उस पर हावी न हों तथा बचपन में विद्यमान मौलिक संस्कार और शुचिता बरकरार रहे।

पर प्रायःतर ऎसा हो नहीं पाता। बच्चा ज्यों-ज्यों बड़ा होता जाता है उसके मन-मस्तिष्क में पूरी दुनिया को जान लेने की उत्सुकता-जिज्ञासा एवं आतुरता बनी रहती है और इसी के चलते उसके चित्त में शैशव के संस्कारों की बजाय परिवेशीय संस्कारों की स्थापना हो जाती है।

मौलिक संस्कारों के क्षरण और बाहरी संस्कारों के पुनर्भरण के संक्रमण का यही दौर हर मनुष्य के लिए आत्मघाती होता है और जीवन निर्माण की दिशा और दशा तय करता है।

शुचितापूर्ण संस्कारों और दिव्य विचारों की भावभूमि में पले-बढ़े परिवारों में ही मौलिक संस्कारों के पल्लवन के साथ शुचिता बनी रहती है और यह शुचिता जीवन को सुनहरे इन्द्रधनुषों का अहसास कराती रहती है। लेकिन जहाँ इनकी कमी होती है वहां जमाने भर के कुसंस्कार और स्वार्थ से भरे रिश्ते-नातों के बीच गुजरते हुए व्यक्ति भी अपने मौलिक संस्कारों का परित्याग करता हुआ उन सारे कुसंस्कारों और गंदगी को अपना लेता है जो सम सामयिक होते हैं। इन दो स्थितियों में ही समूचे व्यक्तित्व का निर्माण आकार पाता रहता है।

समझदार होने के बाद हर व्यक्ति को वही ग्रहण करना चाहिए जो उससे संबंधित हो व श्रेयस्कर हो। लेकिन होता यह है कि ज्यादातर को  मिक्सचर ज्यादा पसंद होता और ऎसे में उनका पूरा दिमाग अपने और अपने से संबंधित गतिविधियों पर कम, लेकिन बाहरी हलचलों पर ज्यादा केन्दि्रत होने लगता है।

यहीं से हमारे दिमाग में कचरा भरने की शुरूआत हो जाती है। जब तक हमारे मस्तिष्क में अच्छे विचार रहेंगे, अपने से संबंधित सामग्री का ही समावेश होगा, तब तक ईश्वर भी अपने कल्याण के लायक विचारों और तरंगों से हमारे मस्तिष्क से सीधा जुड़ा रहता है और मस्तिष्क को जरूरत के वक्त आवश्यक सूचनाओं व सामग्री की प्राप्ति सहजतापूर्वक होती रहती है।

यह सूचनाएं और भावी रास्तों के संकेत मनुष्य को आशातीत सफलता की ओर ले जाकर सुनहरे भविष्य का निर्माण करते हैं जिनसे व्यक्ति व्यापक धरातल पर बौद्धिक शक्ति और हुनर से समृद्ध तथा विलक्षणताओं से भरपूर मेधावी व्यक्तित्व के रूप में प्रतिष्ठा प्राप्त करता है। जब तक चित्त की शुद्धता बनी रहती है तब तक ईश्वरीय ऊर्जाओं से हमारा सम्पर्क सातत्य बना रहता है।

आज हो यह गया है कि हमारे दिमाग में अपने उपयोग से हजार गुना सूचनाएं और वैचारिक सामग्री या कल्पनाओं का जखीरा भरा हुआ है और ऎसे में हमारा पूरा दिमाग गैरजरूरी सामग्री की वजह से कबाड़खाना बना हुआ है जहाँ न शुचिता बची है न ताजगी।

इन हालातों में हमारा सम्पर्क सांसारिक हलचलों से ज्यादा सम्पर्क में रहने लगता है और ईश्वरीय संबंध लगभग टूट सा जाता है। यही कारण है कि जब संसार भर का कचरा हमारे दिमाग में घुसा रहता है तब हमारी बुद्धि कुण्ठित हो जाती है, विवेक समाप्त हो जाता है और हम इसी प्रदूषित कचरे की गंध से भविष्य को तलाशने लग जाते हैं।

इस फालतू के भरे हुए दिगामी कचरे की वजह से वैचारिक धुंध छायी रहने लगती है और जीवन में सुगंध की बजाय तरह-तरह की दुर्गन्ध आने लगती है।

तब हम ईश्वरीय गुणों को भुलाकर, ईश्वर से सायास दूरी बनाये रखकर जमाने भर की कुटिलताओं के सहारे जीवन निर्माण की बात सोचते हैं और उसी के अनुरूप हम आचरण करने लगते हैं।

हमारी भेड़चाल हर कर्म में प्रतिबिंबित होती है। जैसा लोग करते हैं, कहते हैं, हम आँखें बंद कर बिना कुछ सोचे-समझे उस दिशा में सोचना-समझना और चलना शुरू कर देते हैं। यही सारी स्थिति हमारे जीवन की विफलताओं के लिए जिम्मेदार है। हमें यह समझ लेना चाहिए कि यह दिमागी कचरा कई प्रारब्धों का निर्माण करता है जो कई जन्मों तक हमारा पीछा नहीं छोड़ते, मुक्ति की बात तो दिवा स्वप्न ही है।

जीवन में अन्दरूनी मस्ती और महा आनंद की भावभूमि पाने के लिए बच्चों की तरह सरल, सहज और निर्मल रहें। कोई भी व्यक्ति जिस अनुपात में शुद्ध चित्त होगा, उसी अनुपात में उसका जीवन सुन्दर बनता है। ईश्वर को तभी पाया जा सकता है कि जब चित्त पूरी तरह निर्मल हो जाए। इसके बगैर आनंद या प्रभु की प्राप्ति संभव है ही नहीं।

दुनिया के सारे योग, धर्म, साधनाएं आदि सभी चित्त को निर्मल बनाने का काम करती हैं। एक बार चित्त के निर्मल हो जाने पर ईश्वर को अपने आप अपने बहुत करीब अनुभव किया जा सकता है।

चित्त की निर्मलता के लिए जरूरी है कि हमारा प्रत्येक कर्म शुचिता से भरा-पूरा, निरपेक्ष, निष्काम और निर्मल हो। इसके लिए हमारे दिमाग से उन सभी विचारों और बातों को धीरे-धीरे खाली करना जरूरी होता है जो हमारे किसी काम के नहीं हैं।

एक तरफ हमें फालतू विचारों के विसर्जन की साधना करने की जरूरत है दूसरी ओर उन सभी विचारों से दूर रहने की आवश्यकता है जो हमारे किसी काम के नहीं हैं।

जो हमारे काम का विचार नहीं है उसके बारे में जानकारी सामने आने पर उस निरर्थक विचार को स्वीकारें ही नहीं और न इस बारे में आगे कोई जिज्ञासा रखें।

अपने दिमाग से पुराने वैचारिक कचरे को निकालने का निरन्तर प्रयास करते रहें और साथ ही उन सभी बातों या विचारों को सुनने से दूर रहें जिनसे अपना कोई वास्ता नहीं पड़ने वाला।

संसार भर में असंख्य विचार हैं और अपना मस्तिष्क है छोटा सा। ऎसे में यह हमें ही तय करना है कि हमारे मस्तिष्क में कचरा रहे या काम की बातें।

एक बार यह बात अच्छी तरह समझ में आ जाने पर हमारे जीवन की सारी समस्याएं अपने आप पलायन कर जाएंगी और हमें ऎसे महान शाश्वत आनंद की प्राप्ति होने लगेगी जो ऋषियों और देवताओं को प्राप्त है। इसी आनंद भाव से शुरू होती है ईश्वर के सान्निध्य की सरल-सहज और सुगम यात्रा। और तब अपना जीवन मस्ती का पर्याय होता हुआ दिव्यत्व और दैवत्व को पा जाता है जिसकी सुगंध युगों तक प्रेरणा का संचार करती रहती है।

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