न बाँधे नया कर्मबंधन

जीवन का हर क्षण किसी न किसी कर्म का प्रतीक है और हर कर्म बांधने वाला होता है यदि वह आसक्ति से भरा हो। अनासक्त और परमार्थ के उन कामों का कोई कर्मबंधन नहीं बनता जो निरपेक्ष भाव से जगत के कल्याण के लिए होते हैं।

लेकिन जिस कर्म में आसक्ति का भाव होता है, अपेक्षा और किसी न किसी प्रकार का कोई स्वार्थ होता है वहाँ हर कर्म का अपना बंधन होता है और यह कर्म बंधन जीवात्मा के साथ तब तक लगा रहता है जब तक कि उससे उऋण न हो।

यह ऋणानुबंध हमेशा चलता रहता है और इसी कारण से जन्म और मृत्यु का चक्र गतिमान रहता है। यदि जीवों के संबंधों के गणित का पता लगाया जाए तो साफ-साफ यह सामने आएगा कि जो कुछ हो रहा है वह किसी न किसी जन्म के ऋण अर्थात लेन-देन का परिणाम है और यह तब तक चलता रहता है जब तक कर्मों का क्षय न हो जाए।

यह कर्म सकारात्मक भी हो सकते हैं और नकारात्मक भी। जीवन में सच्चे आनंद और शाश्वत सुख-शांति की प्राप्ति की कामना को पूर्ण करने के लिए अपने संचित कर्मों का किसी न किसी प्रकार  से क्षय करना जरूरी है।

इसके लिए दो तरफा कार्यवाही जरूरी है। एक तो पुराने कर्मों का पूरा का पूरा क्षरण होता रहे और दूसरी तरफ कोई न कोई नया कर्म बंधन न बने। यह तभी संभव है कि जब हम हमेशा इस बात पर चिन्तन करें कि कोई सा ऎसा काम न हो जिससे कि कोई कर्म बंधन बंध जाए।

वर्तमान में आम और खास हो या औसत आदमी, हर किसी के जीवन में रोजाना बहुत से लोगों से काम पड़ता है, बहुत से काम करने पड़ते हैं। खूब सारे लोग हमारे शुभचिन्तक होते हैं और न्यूनाधिक ऎसे भी होते हैं जो हमेशा इस बात की चिन्ता में रहते हैं कि कहीं हमारा शुभ न हो जाए।

इस मामले में मित्र, अमित्र और शत्रु व्यवहारी लोगों का बाहुल्य हमेशा  हमारे इर्द-गिर्द बना रहता है। इनमें हर किसी से कुछ न कुछ लेन-देन का संबंध रहता है। इन सभी में यह ध्यान रखना जरूरी है कि पुराने कर्मों का क्षय हो तथा कोई ऎसा वाणी संबंध, व्यवहार और खान-पान से लेकर किसी भी प्रकार का कर्मेन्दि्रयजनित या ज्ञानेन्दि्रयों से संबंध रखने वाला नया कर्म बंधन का अंकुरित न होने पाए और न पल्लवित-पुष्पित हो, और न ही आकार ले पाए।

यह सब निर्भर करता है कि हमारे आत्मसंयम, संकल्प शक्ति और दृढ़ इच्छाशक्ति  पर।  हमारे जीवन में अधिकांश लोग निंदक, प्रशंसक और स्वार्थ से भरे हुए मिलते हैं। और इनमें से अधिकांश लोगों का व्यवहार और काम-काज ही ऎसा होता है कि जो हमें कर्मबंधन में बांधता है और हम कभी संबंधों के माधुर्य तो कभी शत्रुता के तीव्र वेग के वशीभूत होकर अपने आपको लिप्त कर ही दिया करते हैं।

और यहीं से शुरू हो जाता है नवीन कर्मबंधन का सफर।  इनसे पृथक और मुक्त रहने के लिए यह जरूरी है कि अनासक्त कर्मयोग को अपनाएं और कर्मबंधन से परे रहें।न मोह न शत्रुता। दोनों ही बांधते हैं।  खासकर शत्रुता करने वाले लोगों के कारण हमारे जीवन का अधिकांश वर्तमान दुःखी और तप्त रहता है तथा आने वाले जन्मों तक यह सिलसिला चलता रहता है।

हर इलाके में कुछ लोग तो केवल इसीलिए पैदा होते हैं ताकि जिन्दगी भर लोगों की निन्दा, शिकायतें और दुश्मनी के सारे हथकण्डे अपनाते हुए जैसे-तैसे अपने वजूद को कायम रख सकें और दूसरों के कंधों पर सवारी कर आगे बढ़ सकें। या किसी हाथी छाप आदमी के आगे-पीछे घूमते रहकर अपने आपको बड़ा मनवा सकें।

जो लोग निन्दा करते हैं, शत्रुता के भाव रखते हैं उन्हें क्षमा करते हुए आगे बढ़ते जाएं अन्यथा इन्हीं नालायकों, नुगरों और समयभक्षी लोगों के चक्कर में हम भटक सकते हैं। असल में ये टाईमपास और दुष्ट लोग भी यही चाहते हैं कि हम आगे न बढ़ें और कोई न कोई स्पीड़ ब्रेकर हमारी गति का बाधित करता रहे।

कर्म बंधन से बचने का सबसे सहज और सरल मार्ग यही है कि अनासक्त कर्मयोग अपनाएं, निन्दकों और शत्रुओं की निरन्तर उपेक्षा करते रहें या इन वज्र मूर्खों और नासमझों के प्रति दया भाव रखते हुए क्षमा कर दें क्योंकि हराम के खान-पान से दिल, दिमाग और जिस्म को सिंचते रहने वाले इन पुरुषार्थहीनों और कायरों को यह समझ ही नहीं है कि जीवन क्या है और किसलिए है। इन बेचारों को अपने हाल में जीने दें ताकि ये समाज की गंदगी को सूंघ-सूंघ कर इकट्ठा करते रहें और इस मलीनता और मैल के सहारे जिन्दगी गुजार सकें।