कामचोरी जिन्दाबाद, कामचोर अमर रहें

दुनिया में पैदा होने वाला हर इंसान हर प्रकार के काम की बुद्धि और शक्ति लेकर पैदा हुआ है और इस मामले में सभी समान हैं। कोई न कम है न ज्यादा।

हर आदमी को भगवान ने सभी प्रकार की क्षमताओं से भरपूर नवाज़ कर भेजा हुआ है। लेकिन धरती पर पैदा होने के बाद आदमी की प्रवृत्तियों में बदलाव आ जाता है और इसी की वजह से आदमी अपने स्वभाव और मनोवृत्तियों को अपने हिसाब से ढाल दिया करता है और खुद भी इन्हीं के अनुरूप ढल भी जाता है।

विराट शक्तियों और व्यापक ऊर्जाओं का भण्डार के होते हुए आदमी अपने आपको इतना संकीर्ण कर लिया करता है कि उसे सब कुछ होते हुए भी कुछ ही काम अच्छे लगने लगते हैं और कुछ ही आदतों में अपने आपको आप्लावित कर सीमित कर्मयोग की पहचान कायम कर लिया करता है।

दुनिया में कर्मयोग के मामले में आदमियों का स्वभाव अब बदला हुआ देखा जा रहा है। जब से आदमी आरामतलबी और  सुविधाभोगी हो गया है तभी से उसके दायरे सीमित होते जा रहे हैं क्योंकि उसे कर्मयोग को तल्लीनता से पूरा करने की बजाय  हर जगह भोग-विलासिता और आनंद पाने की तलब हो गई है और यही कारण है कि कर्मयोग अब अपना प्राथमिकता क्रम छोड़कर  तीसरे-चौथे या कि अंतिम पायदान पर आ चुका है।

हर तरफ आदमी  कम से कम परिश्रम करते हुए अधिक से अधिक पाना चाहता है और इस दौड़ में वह समाज और देश के प्रति अपने परम्परागत कर्तव्यों को भुला बैठता है तथा अपने वैयक्तिक आनंद तथा सुकून उसे हमेशा श्रेष्ठ लगते हैं।

वो जमाना भी अब नहीं रहा जब आदमी को परिश्रम करके जीवन चलाने की चाहत में मजा आता था और कर्मयोग को वह अपने जीवन भर के लिए ध्येय और श्रेष्ठ मानता था।

अब समय बदल गया है। आदमी कहीं भी किसी भी खूँटे से बँधा हुआ रहकर जमाने भर की ओर नज़र दौडाता हुआ सब कुछ पा लेना चाहता है सिवाय अपनी ड्यूटी पूरी करने के। हर आदमी अपने घोड़े को छाया में रखना चाहता है। अपना घोड़ा कहीं छाया में बँध गया तो फिर वह निश्चिन्त हो उठता है, चाहे जमाना भर समस्याओं, अभावों और पीड़ाओं की धूप में झुलसता ही क्यों न रहे।

जीवन भर उसका यही ध्येय रहता है कि उसे बँधा-बँधाया हुआ जो कुछ मिल रहा है वह वैसे ही बिना किसी बाधा या कमी के प्राप्त होता रहे तथा उसके लिए कुछ भी मेहनत कहीं भी नहीं करनी पड़े। बल्कि इस कर्तव्य कर्म के लिए जो निर्धारित समय मिला है उसमें से समय चुरा कर ऎसा कुछ करे जिससे कि उस समय को वह अपने हक में भुना सके और उसे दूसरे सारे स्रोतों से भी उसे बहुत कुछ प्राप्त होता रहे, भले ही इसके लिए उसे कुछ भी मेहनत क्यों न करनी पड़े।

जमाने भर की चकाचौंध और आधुनिकताओं से सराबोर आकर्षण के मायाजाल को देखते हुए हर आदमी अपने लिए नहीं बल्कि दूसरे के लिए जी रहा है और वह जो कुछ जमा कर रहा है उसका उद्देश्य भी यही है कि ऎसा कुछ करे ताकि जमाने के लोगों को दिखा सके।

आदमी आजकल अपनी मानवीय संवेदनाओं, सेवाओं और कर्मयोग की बजाय अपने द्वारा जायज-नाजायज रास्तों से संग्रहित भौतिक संसाधनों, भवनों, वैभव और संपदाओं के माध्यम से अपने आपको बड़ा और प्रभावशाली दिखाने की कोशिश कर रहा है।

वह जो कुछ कर रहा है उसका उसके आत्मसंतोष और आनंद से कोई सरोकार नहीं है बल्कि वह सब कुछ परायों की नज़र में अपने आपको बड़ा और अच्छा दिखाने भर से है।

कर्मयोग का यह हश्र पिछले काफी समय से चला आ रहा है। अब यह महारोग की तरह सभी स्थानों पर फैल चुका है। हर आदमी अपने आपको सीमित दायरों में इतना अधिक सिमटा चुका है कि उसे अपनी ही सीट, अपनी ही फाईलें, अपनी दुकान, स्कूल-कॉलेज, मकान, अपनी रोजाना की बैठकों के कोने-पाटे और पेढ़ियाँ,  गर्द जमी खिड़कियाँ, पीक से रंगी दीवारें और कोने, अपने सड़ियल से दराज और कुर्सी-टेबल ही अच्छे लगते हैं और उन्हीं के इर्द-गिर्द वह रमा रहता हैं।

चार-पाँच फीट के कोने धँसे रहने को ही जिन्दगी समय बैठने वाला आदमी इस कदर नालायक और निकम्मा हो जाता है कि वह अपने निर्धारित कर्म को भी ठीक ढंग से निभा नहीं सकता।

ऊपर से किसी आकस्मिक आवश्यकता के वक्त कोई सा काम बता दें तो वह यह कहकर छूट पड़ता है कि यह उसका काम नहीं है। बहाने भी बनाता है कि यह उनका काम है, मेरा काम नहीं है, दूसरों का काम है।

जब से आदमी की यह प्रवृत्ति बन गई है तभी से ‘कर्मण्येवाधिकारस्ते’,  ‘श्रमेव जयते’ और कर्मयोग से लेकर कार्य संस्कृति की सभी परिभाषाएं बदल गई हैं और इनका सीधा प्रभाव कर्मस्थलों पर पड़ा ही है जहाँ की कार्यप्रणाली जाने कितनी विषमताओं से भर गई है।

बहुत कम लोग ऎसे देखने में आते हैं जो स्वयंस्फूर्त होकर आत्मपर््रेरणा से अपने कामों को बिना किसी बाधा या नौटंकियों-बहानों के पूरा करते रहते हैं और किसी से कोई शिकायत नहीं करते। मगर इन लोगों के साथ सबसे बड़ी समस्या यही है कि सारा काम इन पर ही लाद दिया जाता है।

निकम्मे और कामचोर हमेशा कोई न कोई बहाना रचते हुए कामों से जी चुराते हैं और अपने आपको मुक्त रहने की कोशिशों में ही जिन्दगी खपा देते हैं। इन निकम्मों और बहानेबाजों के कारण ही समाज और देश आज पिछड़ेपन से मुक्त नहीं हो सका है।

इन कामचोरों को अपने कामों से कोई सरोकार नहीं रहता या कि काम नहीं आने जैसी बातें करते हैं मगर इनकी एकाध सुविधा छीन ली जाए या कि समय और श्रम में बीच अनुपात स्थापित कर दिया जाए या कि बंधी-बंधायी कमाई में कहीं कोई कमी आ जाए, तो ऎसे दिखावा कर लेंगे जैसे कि मर ही गए हों या मरने ही वाले हों। ऎसे खूब सारे चतुर और धूर्त कामचोर हम सभी के आस-पास भी बहुत बड़ी संख्या में हुआ करते हैं।

इस प्रकार के संकीर्ण दायरों में कैद रहकर अपने कामों से बचने के लिए तरह-तरह के बहाने करते हुए फिजूल की बातें करने वाले लोग स्वार्थी और खुदगर्ज होते हैं।  काम कोई सा हो, अपने आपको जानें, इंसान की शक्ति पहचानें और आत्मविश्वास रखें कि दुनिया में कोई सा काम ऎसा नहीं है जो आदमी नहीं कर सकता।

यह समाज, ये गलियारे, ये अपने बाड़े और अपना देश सब कुछ अपना ही और हमीं को सँवारना है। जो काम हमारे पास आते हैं, जिनके लिए हमें योग्य समझा या कहा जाता है वह चाहे कोई सा काम हो, हमें पूरी प्रसन्नता के साथ करना चाहिए क्याेंकि सब काम हमारे हैं, कोई काम न पराया है, न अपना है। जो जग का है वह अपना है, जो अपना है वो सारे जग का है।

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