कलियुग के ब्राह्मण इसलिए हैं पथभ्रष्ट

आज ब्राह्मणों को लेकर अच्छी-बुरी चर्चाएं हर जगह होती रहती हैं। अच्छे-बुरे लोग सब जगह होते हैं। फिर भी यक्ष प्रश्न यह है कि धर्म पर चलने और धर्म का प्रचार-प्रसार करने वाले ब्राह्मण आज ब्राह्मणत्व के संस्कारों से विमुख क्यों हैं, राक्षसों की तरह व्यवहार क्यों करने लगे हैं।

संस्कारवान और पवित्र ब्राह्मणों को भी इस बात का मलाल रहता है कि आखिर हम ब्राह्मणों को हो क्या गया है। हम ब्राह्मणों में से ही खूब सारे व्यभिचारी, रिश्वतखोर, भ्रष्ट, लोभी, अधर्मी, अन्यायी, अत्याचारी, पतितों के पिछलग्गू और दुष्टाें की सेवा-चाकरी करने वाले,  शराबी, माँसाहारी और आसुरी क्यों होते जा रहे हैं।

कलियुगी ब्राह्मणों के पतन के बारे में गंभीरता से गहन पड़ताल की जाए तो यह सामने आएगा कि हम ब्राह्मणों की ही एक छोटी सी गलती के कारण हम असुरों की परंपरा और धाराओं में बहते चले जा रहे हैं।

कलियुगी ब्राह्मणों के अधोपतन के बारे में बहुत समय पहले ही सब कुछ साफ हो गया था लेकिन न हमारे पुरखों ने हमें बताया और न हमने कभी ये कोशिश की कि आखिर ऎसा क्या हो गया है कि हम ब्राह्मण लगातार नीचे गिरते जा रहे हैं और हम हीन माने जाने लगे हैं।

इस बारे में पौराणिक कहानी कही जाती है। यह कहानी मुझे वैदिक संस्कृति के शिखर पुरुष, जाने-माने प्राच्यविद्यामर्मज्ञ स्व. ब्रह्मर्षि पं. महादेव शुक्ल ने नब्बे के दशक में सुनायी थी।

पुराने युगों की बात है। एक समय सभी जगह दुष्काल पड़ गया। इतना भारी अकाल कि जीवित रहना ही मुश्किल हो गया था। उस जमाने में सिद्ध तपस्वी गौतम ऋषि के क्षेत्र में यह प्रसिद्ध था कि वहाँ न कभी कोई अकाल पड़ता है, न कोई कमी। ऋषि के तपोबल के प्रभाव से हमेशा खुशहाली रहती है और अन्न-जल के भण्डारों में कभी कोई कमी नहीं आती।

इस पर दूर-दूर के देशों से आकर हजारों ब्राह्मण गौतम ऋषि के सान्निध्य में रहने लगे। वहां 12 साल तक रहकर अच्छी तरह जीवन निर्वाह किया। दुष्काल के समय गौतम ऋषि के वहां 12 साल तक रहकर जीवन बचाने वाले हजारों ब्राह्मणों को जब अपने-अपने इलाकों में वृष्टि होकर सुकाल आ जाने का समाचार मिला। तब वहां से लौटना शुरू कर दिया।

इनमें से कुछ आदतन शरारती और धूर्त ब्राह्मणों ने यह सोचा कि इस तरह से तो 12 साल तक ब्राह्मणों को जिमाने, रखने और अच्छी तरह पालने की कीर्ति का श्रेय गौतम ऋषि को प्राप्त हो जाएगा और सारे जग में उनका गुणगान होने लगेगा।

इन कतिपय नालायक और विघ्नसंतोषी ब्राह्मणों ने माया से दर्भ की गाय बनाकर खेत में वहाँ रख दी, जहां गौतम ऋषि ध्यान में मग्न थे।  ध्यान समाप्ति के उपरान्त गौतम ऋषि ने जैसे ही आँख खोली, हुंकार भरी। इससे  माया से बनी यह गाय गिर गई।

षड़यंत्रकारी ब्राह्मणों को इसी की प्रतीक्षा थी। उन्होंने जोर-जोर से चिल्लाते हुए यह शोर मचा दिया कि गौतम ऋषि गौहत्यारा है, ऎसे गौहत्यारे ऋषि के वहाँ रहना भी पाप है, चलो, भाग चलो। यह कहकर सारे ब्राह्मणों के समूह गौतम ऋषि के क्षेत्र को छोड़कर अपने गंतव्य की ओर लौट चले।

इस घटना से स्तब्ध रह गए गौतम ऋषि को भी अचम्भा हुआ कि आखिर यह सब कुछ कैसे हुआ। उन्होंने ध्यान लगाया तब सारा माजरा सामने आया कि कुछ खुराफाती ब्राह्मणों ने यह सब इसलिए किया ताकि यश प्राप्त न हो और बदनामी का ठीकरा ऋषि पर फूट जाए।

इस घटना से क्षुब्ध व आहत  गौतम ऋषि अत्यन्त क्रोधित हो उठे।  उन्होंने यह घृणित करतूत करने वाले इन सभी ब्राह्मणों को श्राप दे डाला कि ये सारे ब्राह्मण कलियुग के अठाइसवें मन्वन्तर में धरती पर पैदा होंगे और राक्षसों की तरह जीवन जीयेंगे। इनमें असुरों के सारे गुण होंगे। माँस-मदिरा, मैथुन, व्यभिचार, नशाखोरी, षड़यंत्रों, पाखण्ड और अधर्म में रत रहेंगे और वो सब कुछ करेंगे जो राक्षस करते रहे हैं।

इस श्राप को सुनकर ब्राह्मण भयभीत हो उठे। इनमें से कुछ श्रेष्ठ और ब्रह्मवर्चस् प्राप्त ब्राह्मणों का समूह ऋषि के पास गया और साष्टांग दण्डवत करते हुए विनम्रतापूर्वक निवेदन किया कि – भगवन् ! नालायक और धूर्त ब्राह्मणों ने यह कुकृत्य किया है, इसकी सजा दूसरे सभी ब्राह्मणों को क्यों?

कॉफी अनुनय-विनय के बाद गौतम ऋषि का गुस्सा शान्त हुआ और उन्होंने यह कहा कि जो लोग उस समय भी संध्योपासना और गायत्री जप का नियमित अनुष्ठान करेंगे, वे ब्राह्मण उनके श्राप से मुक्त रहेंगे। आज हम सभी लोग कलियुग के अठाइसवें मन्वन्तर में पैदा हुए हैं।

ऋषि से शापित युगीन प्रभाव ही है कि आज भी जो ब्राह्मण संध्या और गायत्री से विमुख हैं वे अपनी कुल और वंश परंपरा, गौत्र परम्रा, अपने पुरखों और ऋषियों की परंपरा से चली आ रही दिव्य ऊर्जा से भटके हुए हैं तथा उनमें आध्यात्मिक अर्थिंग पॉवर का अभाव है।

इस वजह से वे गौतम ऋषि के श्राप के प्रभाव में हैं और लुच्चे-टुच्चे बाबाओं, तंत्र-मंत्र और टोनों-टोटकों, मैली विद्याओं तथा साई-फाई, धूर्त-पाखण्डियों और लोभी धुतारे पण्डों-भिखारियों के चक्कर में फंसे हुए अधर्म में रमे हुए स्वयं को पण्डित, धार्मिक,महात्मा, पुजारी, सिद्ध और बाबा के रूप में पूजने-पूजवाने के धंधे में लगे हुए हैं।

न इन्हें धर्म से कोई मतलब है, न वेद-पुराणों, न संस्कृत-संस्कृति से। अपने परिचितों और आस-पास वालों तथा अपने क्षेत्र के ब्राह्मणों को देखें तथा आश्वस्त होने की कोशिश करें कि युगों पहले दिया गया गौतम ऋषि का श्राप आज भी ब्राह्मणों के जीवन पर किस तरह छाया हुआ है।

इससे बचने का एकमात्र उपाय है संध्या और गायत्री को नियमित रूप से अपनाना। शास्त्र आज्ञा तो यह भी है कि तीन दिन तक संध्या नहीं करने वाले द्विज ब्राह्मण का फिर से यज्ञोपवीत किया जाना चाहिए।

हम ब्राह्मणों की दुर्गति और पतन के लिए कोई और नहीं, बल्कि हम खुद ही जिम्मेदार हैं। गौतम ऋषि के श्राप का निवारण किए बगैर न हमारा भला हो सकता है, न हमें प्रतिष्ठा प्राप्त हो सकती है।

समाज और देश के पतन का मूल कारण भी यही है। अब भी समय है, धर्म की अपने-अपने स्वार्थ के अनुकूल व्याख्या और परिचालन का भाव त्यागें और वैदिक संस्कृति का आश्रय ग्रहण करें। इसके बिना हमारा कल्याण भगवान भी नहीं कर सकता।

जे दृढ़ राखे धर्म को तेहि राखे करतार।

जय परशुराम।

(नोट – यह पोस्ट केवल ब्राह्मणों के लिए हैं। गैर ब्राह्मण कृपया इस पर टिप्पणी न करें। अपने आपको ब्राह्मण मानने-मनवाने वाले गौतम ऋषि से शापित सभी ब्राह्मणों से क्षमायाचना सहित)

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