जो खुलेगा, वही खिलेगा

जो खुलेगा, वही खिलेगा

इंसान की जिन्दगी पुष्प की तरह है। उसकी गंध और सौन्दर्य तभी अनुभव में आ सकता है जब वह कली के रूप में पूर्ण यौवन भी प्राप्त करे और पूरी स्फूर्ति के साथ उपरान्त खिले। तभी उसकी सुन्दरता और सुगंध जमाने भर को प्रभावित कर सकती है।

कोई सा पुष्प चाहे कितना दुर्लभ हो, वह यदि कली ही न बन पाए, खिल ही न पाए  तो उसका कोई अर्थ नहीं है। कली का बनना जितना जरूरी है उससे भी कहीं अधिक जरूरी है कली का फूल के रूप में खिलकर दिखना।

दुनिया में पुष्पों को इसीलिए सुन्दरतम कहा गया है, देवी-देवताओं के सर पर सुशोभित होने का अधिकार उसे इसीलिए है कि वह बिना किसी संकोच के प्रकृति से प्राप्त सौन्दर्य का दिग्दर्शन जगत, जगदीश्वर और जीवों को कराता है।

कली का खिलना ही इस बात का प्रतीक है कि भविष्य का फूल आकार भी ले रहा है और सुगंध का अखूट स्रोत भी सृजित हो रहा है। कली और इससे प्रस्फुटन का गहरा और गूढ़ रहस्यों से भरा आध्यात्मिक विज्ञान है। हमारे शरीर में जो भी चक्र विद्यमान हैं उनमें प्रत्येक चक्र का अधिष्ठातृ देवी-देवता और इनसे संबंधित दिव्य शक्तियाँ कमल दल पर विराजमान हैं और इन सभी का अपना-अपना अक्षर है।

इन दलों और अक्षरों की सिद्धि से ही चक्रों का जागरण होता है और मूलाधार चक्र से लेकर सहस्रार चक्र तक की सिद्धि होती है। हर चक्र में अलग-अलग संख्या में कमल दल विद्यमान होते हैं। सहस्रार चक्र में एक हजार कमल दल उपस्थित रहते हैं।

दैहिक और स्थूल साधना और पदार्थ भावों से सिक्त कर्मकाण्ड में जहाँ बहिर्मुखी भावनाएं प्रधान होती हैं वहीं इससे ऊपर के स्तर में जाने पर मानसिक साधना और योग मार्ग का आश्रय ग्रहण किया जाता है जहाँ सब कुछ मानसिक धरातल पर होता है और सूक्ष्म तरंगों में दैवत्व एवं दिव्यत्व की प्रतिष्ठा करते हुए ऊध्र्वगामी यात्रा को गति प्रदान की जाती है।

बात चाहे चक्रों की हो या दिल की, दिमाग की हो या चित्त को एकदम खाली कर देने की, हर मामले में यह जरूरी है  कि भीतर कुछ न रहे। जो कुछ पुराना है, बिना काम का है, बोझ की तरह है उन सभी को बाहर निकाल फेंके कुछ भी नया, ताजा और ऊर्जावान ग्रहण नहीं किया जा सकता।

आम इंसान की पूरी जिन्दगी मनहूसियत, मायूसी, मुर्दानगी और आत्महीनता में निकल जाती है, इसका मूल कारण यही है कि हम भीतर से इतने बन्द रहते हैं कि कुछ भी प्रकट किए जाने से डरते हैं। और भय किसी और से नहीं, अपनी ही तरह के उन लोगों  से ही होता है जो स्वयं भी किसी न किसी तरह से भयभीत रहा करते हैं।

जब तक इंसान में यह भय बरकरार है तब तक वह न आनंद को पा सकता है, और न ही जीवन के किसी भी लक्ष्य को। जीवन के तमाम लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए सबसे बड़ी आवश्यकता है खुलने की। अपने भीतर ऎसा कुछ न रखें जिसकी वजह से बार-बार हमें नकारात्मक भावों का स्मरण आए।

आध्यात्मिक दृष्टि से देखा जाए तो चित्त में न कोई बुरा भरा रहे, और न ही कोई अच्छा। बुरा और अच्छा हमारे मन का वहम है। कई बार जो हमारे लिए बुरा होता है वह औरों के लिए अच्छा होता है, और दूसरों के लिए जो बुरा होता है वह हमारे लिए अच्छा हो जाता है।

इंसानी आनंद को पाने की सबसे पहली शर्त यही है कि जो मन में आए उसे उगल दो, मन में कुछ न रखें चाहे वह किसी के लिए या हमारे लिए कितना ही अच्छा या बुरा क्यों न हो। जब हम अपने चित्त में कुछ विचार सायास दबाए रखते हैं तब हमारी मानसिक और शारीरिक शक्ति का अधिकांश हिस्सा इन बातों को दबाने में खर्च करना पड़ता है और इस कारण से जो शक्ति मन, मस्तिष्क और शरीर को पुष्ट करने और क्षमताओं मेंं अभिवृद्धि के लिए लगनी चाहिए वह चित्त में दफन विचारों पर परदा डालने में खर्च हुआ करती है और इससे मनुष्य अपनी पूरी क्षमता से विकास नहीं कर पाता।

इसी  प्रकार अपनी भावनाओं को दबाए रखना भी आत्महीनता का बहुत बड़ा कारण है क्योंकि तब हम पूरी तरह खुल नहीं पाते। और इस तरह हमारे चक्रों और इनमें समाहित कमल दलों का उत्थापन नहीं हो पाता। इनका मुँह नीचे ही रहता है इस कारण ऊध्र्वमुख नहीं हो पाता।

जब तक यह नहीं होता, हमारा जागरण संभव नहीं है। इसलिए यह जरूरी है कि हम खुले रहें। जो इंसान जितना अधिक खुला, पारदर्शी और मुक्त रहेगा, उतना अधिक खिलेगा। ऎसे इंसान के लिए न किसी ब्यूटी पॉर्लर की आवश्यकता होती है और न ही किन्हीं प्रकार के बाहरी सौन्दर्य प्रसाधनों की। ऎसे इंसान के चेहरे की चमक-दमक अपने आप दिव्य और स्वर्णिम हो जाती है।

जिन लोगों को मानसिक स्वास्थ्य, चेहरे का ओज-तेज और शारीरिक सौन्दर्य पाने की तमन्ना हो, वे यदि दिल से खुले और खाली रहने का अभ्यास डाल दें तो अपने आप खिलने लगेंगे। इसमें किसी भी प्रकार का कोई संदेह नहीं। ऎसे इंसानों की भीतरी-बाहरी कली-कली अपने आप खुल जाया करती है।