इतिहास के पन्नों से – – – जयमल-पत्ता एवं कल्लाजी का बलिदान याद रखेगा हिन्दुस्थान

शौर्य-पराक्रम भरी वीर प्रसूता वसुन्धरा पर ऎसे-ऎसे वीरों और महावीरों ने धर्मयुद्ध में गौरवशाली इतिहास का सृजन किया है कि जिसे सदियां नहीं भुला पाएंगी। इन ऎतिहासिक गाथाओं से आज नई पीढ़ी को परिचित कराने की आवश्यकता है।  इस दिशा में उदयपुर में समुत्कर्ष समिति द्वारा निरन्तर सार्थक प्रयास किए जा रहे हैं। हाल ही मेडतिया जयमल राठौड़, कल्लाती राठौड़ एवं पत्ता चुण्डावत तथा उनकी पटरानी फूलकंवर के नेतृत्व में चित्तौड़ के तीसरे जौहर के 450 वें वर्ष (1568-2018) पर समिति ने कृतज्ञ राष्ट्र की ओर से इनका पुण्य स्मरण करने सार्थक परिचर्चा की।

इसमें समुत्कर्ष पत्रिका के परामर्शदाता श्री तरुण शर्मा द्वारा मुख्य विषय रखने के साथ ही प्रबुद्धजनों व चिन्तकों सर्वश्री अनिल गुप्ता, प्रीतमसिंह राणावत, गोपाल कृष्ण गौड़, राकेश शर्मा, जसवन्त राय, संदीप आमेटा, संतोष गुर्जर, हरिदत्त शर्मा आदि ने विचार रखे और ऎतिहासिक बलिदानियों को पुष्पान्जलि अर्पित की।

 

25 फरवरी 1568 की  इस ऎतिहासिक बलिदानी घटना के विभिन्न पक्षों पर वक्ताओं ने अपने ओजस्वी विचार रखते हुए गर्व और गौरव का संचार कर दिया।

रजवट भूख अनोखड़ी , मरया मिटे चित्तौड़

1567 में अकबर ने चित्तौड़ का घेरा डाला था । पूरे 6 माह बीतने पर भी उसे कोई सफलता नहीं मिली । जयमल को टोडरमल के माध्यम से खरीदने की चाल भी सफल नहीं हुई । बारूदी सुरंगो से किले की दीवारों को क्षति पहुंचाई गई  । तब किले की प्राचीर की मरम्मत के समय अकबर की गोली लगने से जयमल घायल हो गए  ।  तब सतियों ने जौहर और वीरों ने साका करने का संकल्प किया ।

25 फरवरी 1568 ई. के पावन दिन सतीत्व की रक्षार्थ पत्ता चूंडावत की पटरानी महारानी फूल कँवर के नेतृत्व में 7000 क्षत्राणियों ने चित्तोड़ का तीसरा जौहर किया। सभी क्षत्रिय किले के द्वार खोल मुगलों पर टूट पड़े ।

इस निर्णायक युद्ध में जयमल जी राठोड़ के घुटने पर चोट लगने के कारण वे अपने भतीजे कल्ला जी राठौड़ के कन्धे पर बैठ कर युद्ध करने आये। इनके चतुर्भुज स्वरूप ने मुग़लो पर कहर बरपा दिया।

यह देख अकबर भी हतप्रभ रह गया। इन्हें रोकने का प्रयास किया गया। पर सब असफल  ।  अन्त में इनका बल क्षीण करने के लिए इनके ऊपर गौ मांस और रक्त फेंका गया।

इसका लाभ उठा तथाकथित वीर मुगलों ने  पीछे से वार कर जयमल जी और कल्ला जी के मस्तक काट दिए गए। कल्ला जी का सिर कटने के बाद भी धड़ लड़ता रहा। अनेक मुग़लो को मार कर वे भी रण खेत रहे। ऐसी मान्यता है कि कल्ला जी का धड़ अपने ठिकाने रनेला पहुंचकर  शान्त हुआ ।

पत्ता चूंडावत की माँ सज्जन बाई सोलांकिनी व दूसरी पत्नी जीवा बाई सोलांकिनी सैनिक वेश धारण कर युद्ध मे वीरगति को प्राप्त हुई। रामपोल पर युद्ध करते हुए पत्ता चूंडावत ने मुगल सेना को अत्यधिक हानि पहुँचाई।

सैंकड़ो मुग़लो को ढेर कर युद्ध करते हुए  वीरवर पत्ता अकबर के मदमस्त हाथी की चपेट में आकर बलिदानी हुए ।  भारत माता की रक्षा में ना जाने ऐसे कितने बलिदानियों ने उस दिन अपने सम्पूर्ण परिवार का सर्वस्व अर्पण कर दिया। यहाँ की मिट्टी का कण कण बलिदान की गाथा कह रहा है ।

अकबर ने चित्तोड़ पर आक्रमण के बाद किले में प्रवेश कर वहाँ निवास कर रहे 30,000 निर्दोष स्त्री,पुरूष ओर बच्चों को कत्ले आम कर अपनी जीत का जश्न मनाया। यह है मानवतावादी “अकबर दी ग्रेट ” का असली चेहरा। जिसने मानव सभ्यता के चेहरे पर कालिख पोत दी। इंसानियत का धर्म भूला दिया।

मेडतिया जयमल राठौड़ , कल्ला जी राठौड़ एवं  पत्ता चुण्डावत व उनकी पटरानी फूलकंवर के नेतृत्व में हुए चित्तौड़ के तीसरे जौहर के 450 वें वर्ष राष्ट्र उनके समक्ष नतमस्तक है  ।

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