श्री मणि बावरा से अंतरंग साक्षात्कार के प्रमुख अंश

नई कविता के यशस्वी रचनाकार के रूप में प्रदेश और देश के साहित्य जगत के साथ ही बांसवाड़ा की रचनात्मक गतिविधियों में सदैव अपना अच्छा खासा दखल रखने वाले मणि बावरा वाग्वर अँचल में नई कविता का प्रयोग करने वाले प्रथम पंक्ति के कवि थे।

श्री बावरा की कविता में प्रतीक तथा बिम्ब उनकी अनूठे लहजे वाली संप्रेषण क्षमता के कारण और अधिक प्रभावी बन पड़ते हैं। लेखक का उनसे आत्मीय और अन्तरंग रिश्ता रहा है। शब्द शिल्पी इस फक्कड़ साहित्यकार के व्यक्तित्व और कृतित्व के बारे में कुछ वर्षों पूर्व लिये गए साक्षात्कार के अंश यहाँ प्रस्तुत हैं ः-

साहित्यांकुरण कब/कैसे?

संभवतः सत्तर का दशक रहा होगा। दूर देहात में पुस्तकें ही मात्र एक ऎसी मित्र बनी जो एकाकीपन को तोड़ सहलाती, गुदगुदाती, समय के साथ बाँध देती, कामरेड़ यशपाल, प्रेमचंद, भैरव प्रसाद गुप्त, विमल मित्र, शंकर धर्मवीर भारती, कमलेश्वर, राजेन्द्र यादव, राकेश, निराला, हरिऔध आदि का साहित्य खूब पढ़ा। लहर, फेनिल, आलोचना, ज्ञानोदय, बिन्दु आदि प्रतिष्ठित और चर्चित पत्रिकाओं ने साहित्य की विविध विधाओं का हृदय पटल खोला।

प्रथम प्रकाशित रचना नवभारत टाइम्स में, स्वयं के नाम से कहानी प्रतियोगिता में पुरस्कृत कहानी – ‘‘सांप की शैतानी’’ और ‘‘बांसवाड़ा समाचार’’ साप्ताहिक पत्र में ‘‘बंधु ममता के धागे ढाल’’ शीर्षक से प्रथम कविता छपी। एक बात खास – इस अवसर पर कदाचित नहीं भूल सकता ‘‘ सर्वोदय वाहक’’ को, जिसके सम्पादक स्वतंत्रता सेनानी स्व. श्री चिमनलाल मालोत थे, जिन्होंने कई सारी कविताएं प्रकाशित कर प्रोत्साहन दिया।

प्रकाशन?

अनेकानेक हिन्दी काव्य संकलनों में रचनाएं प्रकाशित। यथा – रोशनी बाँट दो, इस बार, संकल्प के स्वर, भोर की किरणें, धूप के पखेरू, अपने से बाहर-अपने में, सुनो और रेत की नदी, रेत का घर, निर्निमेष, कविता की बात आदि-आदि। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में निरन्तर प्रकाशन। यथा – सर्वोदय वाहक, बांसवाड़ा समाचार, दैनिक हिन्दुस्तान, धनुर्धर, मनु शक्ति, सरिता, कृत संकल्प, दैनिक नवज्योति, आसंगिनी, राजस्थान पत्रिका, प्रयास, शिविरा, फेनिल, सुलभ, निकष, अर्पण, मधु सारिका और स्थानीय सभी पत्र-पत्रिकाएं।

प्रकाशन, प्रसारण और पुरस्कार के बारे में आपका अपना नज़रिया –

प्रकाशन, प्रसारण और पुरस्कार की लालसा रही नहीं। हाथ फैला कर याचक बनने या गिड़गिड़ाने से बाज आया हूँ और न ही टिनोपाल लगाने की कला का ख्याल आया है। बीते वर्षों से साहित्य की सेवा तो कर रहा हूं पर सामान्य से विशिष्ट बनने की चाह रही नहीं। जैसा था, जैसा हूं, वैसा ही रहूंगा। अब भला आप ही बताइये इस अदने को कौन पुरस्कार देगा? हाँ, याद आता है कभी हिन्दी सृजन के लिए सृजन मंच बड़ी, उदयपुर ने ‘‘लोक मान’’ से सम्मानित किया था।

प्रकाशन की भावी योजना?

स्वयं बिखरा-बिखरा हूँ, लिखा साहित्य भी बिखरा-बिखरा है। व्यवस्थित होने पर हो सकता है पाण्डुलिपियां तैयार हों।

सृजनधारा/कविता के प्रति विशेष आत्मीयता का कारण और अपेक्षा ?

वैसे साहित्य की सभी विधाओं से स्नेह है पर कविता से विशेष आत्मीयता है। अपने पसन्द के कवि और कविता को पढ़ने लपक पड़ता हूँ। यदा-कदा लिख लेता हूँ और सृजन का सुख पा लेता हूँ। पता नहीं क्यों अलंकृत कविता मुखौटों का आभास देती है। प्रतीक और बिम्बों की कविता तो है, साहित्य नहीं है। पर मेरी यह भी सोच है कि दुरुहता से बचा जाय। छन्द मुक्त मेरी पसन्दीदा शैली है पर रागात्मकता का बना रहना ही चाहता हूँ।

भूख, प्यास, आवेश, आक्रोश, संत्रास आदि से गुजरते हुए कई कविताएँ लिखीं। क्षणिक अनुभूति ने भी प्रभावित किया। आम आदमी कविता का केन्द्र रहा, चाहे वह ट्रक ड्राईवर, मजदूर, शराबी, बिगड़ैल औरत, हम्माल या कांस्टेबल ही हो। खण्डहर, मकड़ी, जाले, आह-कराह, खन्दक -खाइयों ने भी पीछा नहीं छोड़ा। पर अब थोड़ा परिर्वतन आया है मेरी सोच में कि पहलेे से ही बहुत दुःखी है मनुष्य। उसके दुःखों को काव्यबद्ध कर पुनः उसके सामने परोसना क्या न्यायोचित है?

संयुक्त सम्पादन ः शेष यात्राएँ, प्रयास, जागृति,प्रतिबिम्ब ।

    साहित्योद्यान की नई पौध के लिये आपका संदेश !

मेरा अनुभव है कि साहित्यक खेमों की उखाड़-पछाड़ सृजनशीलता में ह्रास लाती है। अंश जहर पीना। जहर चाहे नफरत का हो, गाली-गलौच का हो, वहम का हो या शराब सिगरेट का। इस जहर से आदमी को बचना चाहिए।

मेरी इच्छा है बांसवाड़ा के साहित्य जगत की परम्पराएँ स्वस्थ, सुदृढ़ हों, यही अभिलाषा है। अंतिम समय तक जिज्ञासु साधक के रूप में उनका ध्येय यही बना रहा –

अभी भी तलाश है संवेदना में गहराई की, रचनात्मक में चमक की। अभी जारी है संघर्ष-धुंआ-धुंध, कुहरा, अवगुण्ठन से, अपनी अंतस् चेतना से कि कविता कोई आकार ले जो दुःखी मानवता को सहलाए।

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