जो सुधरेगा, वही सँवरेगा

बहुत सारे लोग ऎसे होते हैं जो हमेशा ही कहते रहे हैं यह दुनिया खराब है।

बहुत से लोग ऎसे हैं जो किसी न किसी से हमेशा परेशान रहते हैं और कहते हैं कि लोग खराब हैं।

कई लोग ऎसे होते हैं जो अपनी ही समस्याओं से ग्रस्त रहते हैं और दिन-रात इस बात को लेकर कुढ़ते रहते हैं कि उन्हें उतनी तवज्जो नहीं मिल पाती जितनी मिलनी चाहिए।

आम तौर पर  देखा यह जाता है कि दुनिया में कोई भी इंसान अजातशत्रु नहीं हो सकता है। हर किसी का कोई न कोई शत्रु हो ही जाता है।

यह जरूरी नहीं कि इसकी कोई वजह हो ही। खूब सारे लोग शत्रुता पैदा होने के लिए ही पैदा हुए हैं और इनके जीवन का एक सूत्री कार्यक्रम यही है कि वे बेवजह शत्रुता पैदा करते रहें और इसी से इनका वजूद बना रहता है।

जब तक रोजाना कोई न कोई नकारात्मक काम न कर लें या किसी से दुश्मनी नहीं निकाल लें तब तक चुप नहीं बैठते।

सांसारिक जीवन में हर इंसान के लिए शत्रु और मित्र हमेशा बने रहते हैं और इस कारण से इंसान किसी न किसी उलझन में पड़ा ही रहता है।

लोग हमसे किसी कारण या स्वार्थ से कोई शत्रुता करे यह बात है लेकिन कोई बिना कारण से शत्रुता करे, तो इसका अर्थ यही है कि इंसानियत के दुश्मनों का वजूद अभी कम नहीं हुआ है। 

आम तौर पर दो तरह के इंसान होते हैं। कई सारे लोग ऎसे होते हैं जो सारी दुनिया को खराब बताते रहते हैं और कोई काम नहीं करते हैं।

इन लोगों का हर दिन दूसरों की निंदा के साथ उगता है और सारे संसार की समस्याओं पर गंभीर चिन्तन  और षड़यंत्रों की चिन्ता के साथ समाप्त होता है।

ये लोग जहां काम करते हैं, जहां रहते हैं वहां अपने ही अपने में खोये रहते हैं। खुद कुछ नहीं करते मगर संसार और अपने साथ रहने वाले लोगों को दोष देते रहते हैं।

काफी सारे लोग ऎसे हैं जो हमेशा आत्मदुखी रहने के आदी हैं और इनका कोई क्षण प्रसन्नता से नहीं गुजरता।

यह पूरा संसार एक दूसरे पर आश्रित है, समन्वय और सहकार का प्रतीक है और इसमें तरह-तरह के लोग मिलते हैं जिन्हें अपनेपन से भी, और अनमनेपन से भी साथ रखना पड़ता है और साथ काम करना पड़ता है।

नदी-नाव जैसा यह संयोग जिन्दगी भर चलता रहता है और इस दौर से हर कोई गुजरता ही है। किसी को दोष देने से कुछ नहीं होने वाला।

जिन लोगों को यह संसार बुरा लगता है उन्हें चाहिए कि वे संसार छोड़ देने के लिए तैयार हो जाएं और दूसरी सारी आशाओं, आकांक्षाओं तथा अपेक्षाओं को त्याग कर ईश्वर से यही प्रार्थना करें कि जितना जल्दी हो सके, संसार से दूर कर दे।

संसार में जो लोग जैसे हैं उन्हें स्वीकारें और अपनी बुद्धि तथा विवेक के अनुसार उनका उपयोग करें, उनसे काम लें तथा सांसारिक और परिवेशीय कर्मयोग का प्रवाह निरन्तर बनाए रखें।

आज संसार से भागने की बजाय संसार को अपने अनुकूल बनाकर चलने की आवश्यकता है। और यह तभी संभव हो पाएगा जबकि हम सभी लोग अपने-अपने क्षुद्र अहंकारों से मुक्त होकर संसार के लिए जीने और मरने की आदत डालें।

1 thought on “जो सुधरेगा, वही सँवरेगा

  1. अपने आप में लाएं सुधार..

    दूसरों की तरह न रहें।
    खुद में निरन्तर सुधार लाते रहें।
    आत्मसुधार और परिष्करण, मार्जन-परिमार्जन और दिव्य तथा दैवीय स्वभाव, कार्य एवं व्यवहार लाने की प्रक्रिया जीवन भर जारी रहनी चाहिए।
    दूसरे लोग क्या कर रहे हैं, इस सोच से पूर्णतया मुक्त रहकर जीवन विकास में समर्पित होकर जुटना ही जिन्दगी है।
    दूसरे लोग चोर-उचक्के, रिश्वतखोर, भ्रष्ट, बेईमान, लूटेरे और ब्लेकमेलर हों या फिर आसुरी वृत्ति वाले खान-पानी, व्यभिचारी, लूट-खसोटी, धन संग्रह करने वाले हों या नर पिशाच।
    यह उनकी समस्या है। न उनके बारे में सोचें, न उनके अनुकरण का प्रयास करें।
    ये सारे वे लोग हैं जो जीवन के उद्देश्य और लक्ष्य से नावाकिफ हैं या उनकी उपेक्षा करने वाले हैं।
    बिना ब्रेक की गाड़ियां हैं, समय आने पर कभी न कभी किसी गहरी खाई में गिरेंगी ही।
    कमीशनखोरी, कालाबाजारी और लूट से प्राप्त धन-सम्पदा और जमीन-जायदाद का स्वामी होना इंसान की पहचान नहीं हैं, यह तो वैश्याओं, डकैतों और लूटेरों के भी बांये हाथ का खेल है।
    निष्ठावान, कर्मयोगी और पवित्र होना बड़ी बात है, और ऎसा स्वभाव बिरलों के पास ही होता है।
    इसलिए यदि हम ईमानदार और शुचितापूर्ण हैं तो यह मानियें कि हम उन लोगों में हैं जो भीड़ से परे और अन्यतम हैं।
    अपने आप पर गर्व करें, यह आपको गौरव दिलाएगा।

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