जीवन्मुक्ति के लिए जरूरी है विसर्जन

मृत्यु के बाद मुक्ति या मोक्ष की कल्पना या आकांक्षा नहीं होनी चाहिए बल्कि असली मुक्ति वह है जिसमें जीते जी मुक्ति का गहरा और अमिट विश्वास हो जाए। यह तभी संभव है कि जब न बौद्धिक सम्पदा का अहंकार रहे, न शारीरिक सौन्दर्य को, और न ही जमीन-जायदाद या जमा किए गए वैभव का।

ये सब कुछ हमारे लिए उपयोगी हो, मातृभूमि और अपने आत्मीय या आप्तजनों अथवा जरूरतमन्दों के काम आए। अन्यथा यह केवल कबाड़ ही है जिसे देख-देख कर हम प्रसन्न तो हो सकते हैं किन्तु आत्मतोष, शाश्वत आनंद और सनातन तृप्ति का अहसास मरते दम तक नहीं कर सकते।

फिर मृत्यु के समय अधिकांश वैभवशालियों को यह मलाल बना रहता है कि इन सबका क्या होगा, परिवारजनों, अर्जित सम्पदा और एकत्रित किए गए कबाड़ का क्या होगा? कौन इसका उपयोग करेगा अथवा कौन लायक है इसका उपयोग करने के लिए।

इसी को लेकर आत्मा कचोटती रहती है और ऎसे में अचानक वह अनचाहा क्षण भी आ धमकता है जब पता ही नहीं चलता कि कब हाड़-माँस के पिंजरे से ये रफू हो गई। ऎसे में जीते जी भी नज़रबन्दियों की तरह रहते हुए कुढ़-कुढ़ कर कंजूसी करते हुए मरना और मरने के बाद भी चैन नहीं।

आसक्ति इन्हीं सभी पर टिकी रहती है। यही वजह है कि आने वाली संतति के ग्रह-नक्षत्रों में अतृप्त और मोक्ष की याचना करते हुए कतार में लगे दिवंगतों के कारण काल सर्प या पितर दोष जैसे प्रगतिबाधी और बीमारू योग बन जाते हैं, मरे हुए वे लोग भूत-प्रेत बनकर सताते हैं, विशालकाय भुजंगों के स्वरूप में अपने कहे जाने वाले घरों में कहीं न कहीं जगह बना लेते हैं अथवा श्वान योनि पाकर वापस उन्हीं के कहे जाने वाले घरों में इंसानों से भी कहीं अधिक आदर-सम्मान पाकर आत्म मुग्ध अवस्था में आनंद का उपभोग करते हैं।

इस अवस्था में मोक्ष या मुक्ति का कोई सिरा पकड़ा ही नहीं जा सकता। जब तक हमारी पदार्थों या मरणधर्मा इंसानों में आसक्ति है, चाहे वे अपने हों या पराये, तब तक आनंद और तृप्ति की कल्पना व्यर्थ है। मरने के बाद मुक्ति तभी संभव है कि हम जीते जी मुक्ति का सार्थक प्रयास करें और एक-एक कर सभी से आसक्ति छोड़ते चले जाएं।

इसका यह अर्थ नहीं कि संसार से वैराग्य प्राप्त कर कहीं दूर एकान्त सेवन करने लग जाएं या गृहस्थाश्रम का ही परित्याग कर दें। जरूरी यह है कि संयम की इतनी अधिक तपस्या कर लें कि सभी के बीच रहते हुए भी अनासक्त बने रहें, सभी से प्रेम रखें मगर मोह नहीं।  जल कमलवत रहने का अभ्यास ही वस्तुतः वास्तविक योग और वरेण्य लक्ष्य है।

चित्त की इन्हीं वृत्तियों के निरोध को योग कहा गया है। इसे जो जीते जी अपना लेता है वह निहाल हो जाता है। जो नहीं अपना पाता वो जन्म-जन्मान्तरों तक ऎसा ही भिखारी, मंगता, कबाड़ी और जुगाड़ी बना रहता है या फिर भुजंगों, श्वानों और दूसरे जानवरों की योनियां बदल-बदल कर उन्हीं ठिकानों में डेरा जमाता रहता है जहाँ आसक्ति और मोह बना रहता है।

मोक्ष के लिए मृत्यु के बाद की क्रियाओं और वंशजों द्वारा तर्पण, मुण्डन, दान-पुण्य एवं भोजनादि की शास्त्र सम्मत परंपराओं का निर्वाह होना चाहिए किन्तु इससे भी अधिक जरूरी यह है कि हम स्वयं अपने स्तर पर अभी से जीते जी ही अपनी मुक्ति का प्रयास आरंभ कर दें।

इसके लिए जीवन में सत्य, निष्ठा और शुचिता को अपनाने के साथ ही पुरुषार्थ को प्राथमिकता देने का संकल्प लेकर उस दिशा में बढ़ना जरूरी है। बुराइयों, अधर्म, पाप और कबाड़ आदि सब को छोड़ना तथा पापियों और मानवीय संवेदनाहीन लोगों के साथ रहना, खान-पान, व्यवहार और संपर्क को भी त्यागना जरूरी है क्योंकि ये सब हमारी मुक्ति की राह में आने वाले सबसे अधिक रोडे हैं जो खुद भी भटके, अटके और लटके हुए होते हैं और हमें भी भटकाकर अटका देते हैं। 

तनिक भी इस भ्रम में न रहें कि हम तो सच्चे और अच्छे हैं फिर हमारी मुक्ति कैसे नहीं होगी। हम कितने ही श्रेष्ठ, भगवदपरायण, सेवाभावी, परोपकारी और निष्ठावान क्यों न हों, यदि हमारा सम्पर्क व्यभिचारियों, चोर-डकैतों-लूटेरों, भ्रष्टाचारियों, रिश्वतखोरों, कमीशनबाजों, हिंसकों, शराबियों, नशेड़ियों, माँसाहारियों, आसुरी वृत्ति वालों, भय, दबाव या प्रलोभन के कारण राजधर्म और लोभ-लालच की वजह से लोकधर्म के पालन में फिसड्डी रहने वाले पतितों से है तो संसर्गजन्य दोष के कारण उनके पाप भी हमारे खाते दर्ज हो जाते हैं क्योंकि उनके साथ रहना, साथ निभाना और संरक्षण, आश्रय-प्रश्रय देना भी सामाजिक अपराध के साथ-साथ महापाप की श्रेणी में आता है। हैमाद्रि में इन पतितों के बारे में स्पष्ट उल्लेख है और इनके साथ किसी भी प्रकार के व्यवहार को महापाप की श्रेणी में रखा गया है।

कोई चाहे कितना ही संग्रह क्यों न कर ले, उतना ही उपयोग कर पाता है जितना शरीर के लिए उपयोगी होता है। इससे अधिक का वह सब कुछ कबाड़ ही है जिसे हम भविष्य की असुरक्षा से भयभीत होकर यह सोच कर जमा कर रखते हैं कि कहीं काम आएगा।

लेकिन नियति का परम सत्य यही है कि यह कबाड़, वैभव और जमीन-जायदाद कभी हमारे काम नहीं आती। खूब सारे लोग आए और चले गए, जिन्होंने भरपूर परिश्रम कर अथवा चोरी-चकारी, लूट एवं भ्रष्टाचार से इतनी अधिक सम्पत्ति और जमीन-जायदाद जमा की कि अपने इलाके में धन्ना सेठों और बड़े वैभवशालियों में उनका नाम गिना जाता रहा है। इनमें वे भी शामिल हैं जिन्हें अपने जमाने  में लोकप्रिय और भाग्यविधाता माना व मनवाया जाता रहा है।

इन लोगों ने सम्पत्ति जमा करने को ही जिन्दगी का लक्ष्य माना और खुद मंगतों-भिखारियों की तरह रहे, जायदाद इकट्ठी करने के फेर में न ढंग का खाना खाया, न कपड़े-लत्ते पहने, और न गरीबों या समाज अथवा क्षेत्र के किसी काम आए।

अपने द्वारा लूटी-खसोटी गई अथवा भ्रष्ट आचरणों से अर्जित किसी भी सम्पत्ति का वे जरा भी उपयोग नहीं कर पाए और जिन्दगी भर भिखारियों और विपन्नों की तरह गुजारकर ऊपर चले गए। उनकी जमा की गई सम्पत्ति या तो चोर-डकैतों व औरों ने हड़प ली या वंशजों ने गुलछर्रे उड़ा-उड़ा कर खत्म कर दी।

यह सत्य भी सामने है कि ऎसी सम्पत्ति की बुरी तरह दुर्दशा ही होती है और इसे हड़पने के लिए बाद में अर्से तक संघर्ष चलता रहता है। कइयों की तो हालत ये देखी गई है कि इस सम्पत्ति का उपयोग परिवार के लोग भी नहीं कर पाए और आपस में लड़-झगड़ कर मर गए या एक-दूसरे के द्वारा मारे गए।

इन सभी स्थितियों में किसकी मुक्ति होना संभव है? भोग-विलास ही जीवन का लक्ष्य हो तो वह सब कुछ करने के लिए हम स्वतंत्र हैं जो पशु और पिशाच करते आये हैं लेकिन मृत्यु  के उपरान्त यदि मुक्ति की तनिक भी इच्छा हो तो उसके लिए यह जरूरी है कि जिस स्थिति में हम पैदा हुए थे, उत्तरार्ध में वानप्रस्थाश्रम में आते ही उस स्थिति को पुनः प्राप्त करने का प्रयास करें।

इसका यह अर्थ कदापि नहीं कि हम सब कुछ छोड़-छुड़ा कर संन्यासी या बाबाजी बन जाएं, बल्कि यह करें कि सभी के बीच और साथ रहते हुए अपने आपको सबसे पृथक अनुभव करते हुए  जीने का प्रयास करें, सेवा और परोपकार को दैनिक जीवनचर्या का अंग बनाएं, उन्हीं संसाधनों, वस्तुओं को अपने साथ और पास में रखें जिनका उपयोग होता है, इसके अलावा के संसाधनों, वस्तुओं और पैसों को उन आत्मीयजनों-परिवारजनों या जरूरतमन्दों को सहर्ष भेंट करें जिन्हें इनकी आवश्यकता है और इन्हें प्राप्त करने के बाद उनके अभाव व समस्याएं दूर होकर सामान्य जीवन निर्वाह में आने वाली बाधाओं से मुक्ति पाकर जीने का सुकून प्राप्त हो सकता है।

 और अधिक अर्जित किया हुआ हो तो समाज के लिए कुछ करें, विद्यार्थियों, रोगियों और निष्काम सेवाव्रतियों को सहयोग करें अथवा अपनी जन्मभूमि-मातृभूमि पर कोई ऎसा स्थायी काम करें कि जिससे बरसों-बरस अपने क्षेत्र के लोगों को लाभ प्राप्त हो, सुकून मिले।

लेकिन इन सभी में पात्रता का विचार जरूर कर लें। सहयोग उन्हीं को करें जो शुद्ध चित्त वाले, निष्काम कर्म वाले और परोपकारी हों। यह भी न कर सकें तो आज के युग में सबसे बड़ी सेवा गौसेवा है जिसके करने मात्र से मुक्ति के सारे मार्ग अपने आप और जल्दी खुलते चले जाते हैं।

सेवा-परोपकार के नाम पर संस्थाएं चलाकर पैसे कमाने वाले, पब्लिसिटी के लिए काम करने वाले, नाम और तस्वीर पिपासुओं, सम्मान, अभिनंदन और पुरस्कार चाहने वालों की भीड़ में चिल्लपों मचाने वाले लोगों को किसी भी प्रकार का सहयोग करना न केवल अधर्म बल्कि महापाप है और इससे हमारी मुक्ति में बाधा आती है।

जीवन्मुक्ति के ठोस प्रयासों की बुनियाद पर ही मृत्योपरांत मोक्ष या मुक्ति प्राप्त हो सकती है, इस शाश्वत और सनातन सत्य को सामने रखकर यदि जीवन निर्वाह करने का प्रयास करें तो ही संभव है कि हम वर्तमान में भी महा आनंद और तृप्ति से भरे रहें और देहपात के उपरान्त भी भगवदकृपा और पुण्यों की बदौलत जन्म-मरण के चक्र से मुक्ति पा लें अथवा आने वाले जन्मों में श्रेष्ठ मानवी योनि प्राप्त हो, ताकि आत्मा के उद्धार का यह क्रम निरन्तर ऊँचाइयां पाता हुआ श्रेष्ठतम बना रहे। हमें सृजन के साथ विसर्जन की इस पद्धति को अपनाने की आज आवश्यकता है।

1 thought on “जीवन्मुक्ति के लिए जरूरी है विसर्जन

  1. जो पाया है उसे बाँटें और संचित का शून्य में रूपान्तरण करें, यही है असली मुक्ति…

    पूर्वार्ध में जितना अर्जन-सर्जन क्रम रहता है, कम से कम उसी अनुपात में उत्तरार्ध में विसर्जन क्रम बना रहे, तभी आत्म मुक्ति के द्वार अपने आप खुलने लगते हैं।
    बल्कि यों कहें कि सर्जन के अनुपात में विसर्जन का घनत्व अधिक होना चाहिए क्योंकि इसमें जीवन में अर्जित ज्ञान और अनुभवों तथा मौलिक व्यवहारों का भी समावेश होता है।
    केवल अर्जन ही अर्जन करते चलें जाएं, सर्जन ही होता रहे, तो इससे सूक्ष्म शरीर भारी-भारी हो जाता है और दिमाग में संचित करने लायक विचारों का कबाड़ विस्फोट कर दिया करता है, जो दिल-दिमाग और जिस्म तीनों के लिए तो घातक होता ही है, सूक्ष्म शरीर के सूक्ष्मत्व को भी खण्डित कर देता है।
    ऎसा होने पर किसी भी जीवात्मा की मुक्ति कई जन्मोंं मेंं संभव है ही नहीं। इसके लिए यह जरूरी है कि आयु के मध्यकाल के आ जाने के उपरान्त विसर्जन की यात्रा आरंभ कर दें जिससे कि व्यक्तियों और पदार्थों के प्रति आसक्ति और मोह का भाव छूटता चला जाए और अनासक्त जीवन जीने का भाव बढ़ता जाए।
    जो कुछ है वह धरतीवासियों के लिए है, इस संकल्प के साथ जीने की कोशिश करते हुए विसर्जन की यात्रा को गति प्रदान करते रहें। यही असल में जीवन्मुक्ति है। जो जीवन्मुक्ति के लिए प्रयासों में लगा रहता है उसे अपने मोक्ष या सद्गति के लिए कुछ भी करने की आवश्यकता नहीं रहती। वस्तुतः मुक्ति पाने का यही सरलतम रास्ता है।

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