सच्चे और ईमानदार हैं तो भय मुक्त रहें

भय केवल अपराधियों को ही रखना चाहिए। चाहे वे सार्वजनीन अपराधी हैं अथवा आत्म अपराधी। पूरी दुनिया दो तरह के लोगों में विभाजित है।

एक तरफ चोर-उचक्के, बेईमान-लूटेरे, भ्रष्ट-रिश्वतखोर और आपराधिक चरित्र वाले विद्यमान हैं और दूसरी तरफ सज्जन, चरित्रवान और ईमानदार।

इन दोनों के बीच यानि की अच्छों और बुरों के मध्य हमेशा संघर्ष होता रहा है। राम-रावण, कृष्ण-कंस हों या फिर दूसरे कोई से ऎतिहासिक और पौराणिक पात्र, सत-असत का संघर्ष कोई नया नहीं है।

कलियुग के प्रभाव की वजह से यह हमें अधिक दिखने में आता है क्योंकि इसमें असत्य और अधर्म ही चल निकलते हैं। इस वजह से सज्जनों और अच्छे लोगों को लगता है कि वे इस युग में गलती से पैदा हो गए हैं अथवा जमाना अब उनके लायक नहीं रहा।

हर तरफ यह संघर्ष अब बढ़ता ही चला जा रहा है। मानवता और मानवीय संवेदनाओं, सत्य, तथ्य और यथार्थ को समझने को कोई तैयार नहीं है, सब तरफ कोई न कोई झण्डा, टण्टा और अडंगा लगाए बैठे लोग अपनी मनमानी पर तुले हुए हैं।

सत्य को न कोई स्वीकारना चाहता है न सत्यपरक बात करना।  सब तरफ उन्मुक्त स्वेच्छाचार हावी होता जा रहा है। अच्छे और सच्चे लोग हर कहीं यह महसूस करते हैं कि बुरे लोग जहाँ-तहाँ हावी हो रहे हैं, लूटेरे और बेईमानों की चवन्नियां चल पड़ी हैं, और इनकी वजह से सज्जनों में परेशानियां, तनाव और पीड़ाओं का माहौल बन पड़ा है।

वर्तमान युग में जो अच्छा और सच्चा है उसे इतना अधिक सहनशील होने की जरूरत है जितनी औरों को नहीं। फिर अमर्यादित आचरण, व्यवहार और असत्याश्रित बातों व घटनाओं पर दुःखी वही होता है जो कि संवेदनशील और देशभक्त है।

जो चोर-उचक्के, बेईमान, भ्रष्ट और रिश्वतखोर हैं वे लोग तो नशे को सहारा बना कर सारी संवेदनाओं और विवेक की रोजाना निर्मम हत्या करते हुए सब कुछ भूल-भाल जाते हैं और अपनी आयातित मद-मस्ती की खुमारी में ही पूरी जिन्दगी निकाल दिया करते हैं।

उन्हें सिर्फ अपनी पड़ी है और इसलिए सामाजिक प्राणी होते हुए भी असामाजिकों और हिंसक पशुओं जैसा व्यवहार करते हैं और सज्जनों को दुःखी करते हैं।

वर्तमान की इस विषम दुरावस्था का सर्वाधिक खामियाजा वे लोग भुगतते हैं जो वाकई अच्छे, सच्चे, ईमानदार और निष्ठावान हैं। जो लोग मौके को देखकर पाले बदलने और किसी की भी गोद में बैठ जाने, हर तरह की सेवा के लिए तैयार हो जाने और स्वाभिमान बेच डालने में माहिर हैं उनके लिए कोई संकट नहीं है क्योंकि वे अपने स्वार्थ के लिए किसी भी आकार-प्रकार में ढल जाते हैं और बेशर्म होकर पसरने से भी कोई परहेज नहीं रखते।

इस अवस्था में आकर ये इंसान न होकर वस्तु हो जाते हैं और वस्तुओं का मनचाहा और मनमाना उपयोग करना इंसान की फितरत मेंं होता है। यहाँ जितने भोगने वाले हैं उससे अधिक भोग्य सामग्री सहर्ष उपलब्ध है।

सर्वाधिक संकट तो उन सज्जनों का है जिन्हें हर जगह दूसरे दर्जे का और उपेक्षित होने का दुःखद अहसास होता रहता है। इन सज्जनों की पीड़ाओं और उपेक्षाओं की आह ही वह सबसे बड़ा कारण है जिसकी वजह से सब कुछ होते हुए भी हमें किसी न किसी आनंद की कमी का अहसास होता है और लगता है कि इतना सब कुछ कर लिए जाने के बाद भी कहीं कुछ ऎसा छूटा हुआ है जो याद नहीं आ रहा है या सूझ नहीं पड़ रही है।

दुनिया में चाहे जैसी स्थितियां सामने आ जाएं लेकिन जो लोग सच्चरित्र, ईमानदार और नैष्ठिक कर्मयोगी है उन्हें किसी से भय खाने की आवश्यकता नहीं है।

आमतौर पर देखा जाता है कि ईमानदारी से काम करने वाले लोग उन लोगों से भय खाते हैं जो नालायक हैं तथा उन्हें हर मौके पर किसी न किसी बहाने प्रताड़ित करते रहते हैं, इधर से उधर करते रहते हैं, उनसे अपेक्षाएं  रखते हैं और हमेशा दबाव बनाते रहते हैं, तनाव देने की कोशिश करते रहते हैं।

पर सज्जनों की यह सोच मिथ्या है कि ये व्यभिचारी और दुर्दान्त लोग किसी का कुछ बिगाड़ने की स्थिति में हैं। सच्चे और ईमानदार लोगों को चाहिए कि वे अपने दिमाग से इस भय को हमेशा के लिए निकाल दें क्योंकि अच्छे और सच्चे लोगों का संकल्प और दिव्य ऊर्जाएं इन नालायकों और नुगरे लोगों की अपेक्षा अधिक पॉपरफुल होती हैं क्योंकि शुचिता के कारण उनमें दैवत्व का प्रभाव होता है।

दूसरी ओर जो लोग व्यसनी, व्यभिचारी, असामाजिक, हिंसक और क्रूर हैं, जो हर तरह से भ्रष्ट, रिश्वतखोर और डकैत हैं, बेईमान, अन्यायी और अत्याचारी हैं, पराये पैसों और संसाधनों पर मौज उड़ाने वाले हैं उन लोगाें में अपराध बोध भी उतना ही अधिक होता है जो इन्हें कभी भी शांत, स्थिर और आनंददायी नहीं रहने देता, श्वानों और गिद्धों की तरह हर पल उतावले और उद्विग्न हुआ करते हैं और ऎसे में इनमें न तो संकल्प शक्ति बची रह पाती है न आन्तरिक आत्मिक ऊर्जा।

इस मामले में ये लोग खाली बोरों की तरह होते हैं और इसीलिए पीपों की तरह बजते रहते हैंं।  इन दुष्टों के आभामण्डल इतने अधिक दागदार, काले और क्षतिग्रस्त होते हैं कि आसानी से छेदा, भेदा या फाड़ा जा सकता है।

सच्चा इंसान इनके बारे में थोड़ा भी कुछ कह देता है या संकल्प ले लेता है, सामने वाला अभद्र इंसान हिल जाता है।  इस भ्रम में न रहें कि ये बड़े पद-मद और कद वाले लोग अधिक शक्तिशाली होते हैं।  इसलिए इन लोगों से भयभीत न हों, मुकाबले के लिए हमेशा तैयार रहें। इन हालातों में ईश्वर भी सच्चे लोगों की मदद करता है।

अपने जीवन व्यवहार, वाणी, स्वभाव और कर्म के प्रति ईमानदार रहें, दुनिया में कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता चाहे कितना ही बड़ा सम्राट या साम्राज्ञी क्यों न हो। ये खोखले लोग केवल दिखावे के होते हैं, उनकी आत्मा मर चुकी होती है और जमीर पलायन कर चुका होता है।