ये न हों तो,  जीने का मजा ही क्या

ये न हों तो, जीने का मजा ही क्या

एकरसता भरा जीवन हमेशा एकतानता से इतना अधिक भरा हुआ रहता है कि किसी को जीने का कोई मजा ही नहीं आ सकता। यही कारण है कि भगवान ने हर क्षण को परिवर्तनशील बनाया है और यह परिवर्तन पिण्ड से लेकर ब्रह्माण्ड तक को प्रभावित करता है।

जो बदलाव ब्रह्माण्ड में आते हैं वे जीव मात्र या प्रकृति के किसी भी जड़ और जीवन्त तत्व या पदार्थ में आते हैं और इन परिवर्तनों के अनुरूप सभी को ढलना ही पड़ता है। जो लोग या जीव अपने आपको प्रकृति के अनुकूल कर दिया करते हैं वे प्रकृति की मुख्य धारा का आस्वादन करते हुए आनंद भाव को प्राप्त करते हुए अपने जीवन में मौज मस्ती पाते रहते हैं।

समय के अनुरूप ढल जाना अपने आप में वो कला है जो कि ख़ासकर इंसान के लिए हमेशा लाभकारी होती है। सिद्धान्तों, अनुशासन और मर्यादाओं  की सीमा रेखाओं के भीतर रहकर परिवर्तन को स्वीकार करने वाले लोग ही जीवन में सफलता को प्राप्त कर सकते है।

इंसानी मर्यादाओं का व्यतिक्रम करते हुए बाहर हाथ फैलाने और चादर से अधिक पाँव पसारने वाले लोग हमेशा पराश्रित रहा करते हैं और इस कारण से उनकी स्थिति आत्मनिर्भरता को प्राप्त नहीं कर पाती है।

पूरी जिन्दगी इन लोगों को किसी न किसी सहारे की जरूरत पड़ती ही है। जब तक सहारा प्राप्त होता रहता है तब तक उनकी अनुकंपा से जीवन चलता रहता है, और इस वजह से दूसरों की हर बात को मानने की मजबूरी इतनी अधिक रहती है कि अपने सिद्धान्तों, आदर्शों और मर्यादाओं को त्यागना हमारी सबसे बड़ी वो मजबूरी हो जाती है जो हमें गर्त में डालती है।

प्रत्येक जीव के जीवन में हर परिवर्तन तब तक स्वाभाविक रूप से बने रहते हैं, जब तक वह जीवन्त रहता है। मृत अवस्था में आने के बाद उसका अपना कुछ नहीं रहता, फिर जो कुछ करना होता है वह प्रकृति को ही करना पड़ता है।

जीवित अवस्था में रहने वाले या अपने आपको जीवित मानने वाले हर इंसान के जीवन में हर मोड पर कोई न कोई समस्या, अभाव और विषमता भरी स्थितियाँ बनी रहती है और इनसे सामना करना ही पड़ता है।

तमाम प्रकार की समस्याओं, अभावों और बुरे हालातों से निपटना इंसान के लिए सरल है किन्तु इंसानियत से हीन लोगांे की समस्या सभी को भारी लगती है। कारण यह कि सब जगह ऐसे-ऐसे लोग विद्यमान हैं जो नकारात्मक मनोवृत्ति वाले, कामचोर, निकम्मे और छिद्रान्वेषी स्वभाव और दुष्ट व्यवहारी होते हैं।

ये लोग उस चरम सडान्ध से भरे कचरे या नाली की तरह होते हैं जो कि जरा सी हिलाने-डुलाने भर से भीतरी सडान्ध के भभके उठाकर हैरान-परेशान करती रहती है और इसका असर यह होता है कि जो इनके दुर्गन्ध प्रभावित क्षेत्र में आता है वह त्रस्त हुए बिना नहीं रह सकता।

संसार में जो लोग हमेशा सुगन्ध ही सुगंध के कतरे बिखरने के आदी होते हैं उन लोगों के लिए दुर्गन्ध का छोटा सा कतरा भी बड़ा भारी त्रासदायक लगता है और वे बेचैन हो जाया करते हैं।

समाज-जीवन और परिवेश मंे इंसानी विस्फोट और स्वार्थ के चलते आजकल सभी तरफ सडान्ध भरी गन्दी मानसिकता के लोगों का बाहुल्य है और इस कारण से विध्वसंवादी सोच हावी होती जा रही है।

सर्वत्र धुंध, कोहरा, धूंआ और गर्द का माहौल है और इस कारण से हवाएं बदहवास होती जा रही हैं और ऋतुएं बदचलन। इंसानी परिवेश में दो तरह के लोग देखे जा रहे हैं। उदासीनों और तटस्थों को छोड़ दिया जाए तो एक तरफ निस्वार्थ भाव से काम करने वाले निरपेक्षी लोग हैं और दूसरी तरफ बहुत सारी भीड़ है जिसमें शामिल लोग अपने आपमें इतने अधिक खारे, नमकीन और कड़वे हैं कि इन्हें झेलना भी हर किसी के बस में नहीं है।

बहुत से लोग अपने आपको इतने अधिक महान और नियन्ता समझ बैठे हैं कि खुद को भाग्यविधाता और स्रष्टा ही मानते हुए वैसा ही व्यवहार कर रहे हैं। ऐसे लोगों के भीतर से इंसानियत, माधुर्य और प्रेम समाप्त होता जा रहा है और इसका स्थान ले लिया है क्रूरता, हिंसा, छीना-झपटी और धूर्तता ने।

और यही वजह है कि आजकल इंसानों की एक प्रजाति ऐसी हमारे सामने है जिनके सामने जाने, इनसे बात करने और इनसे किसी भी प्रकार का सम्पर्क करने तक में कभी हीनता बोध होता है और कभी गुस्सा आता है, कभी घृणा और घिन आती है और हम लोग हमेशा यही प्रयास करते रहते हैं कि इन लोगों से जितना हो सके दूर ही रहा जाए, ताकि बेवजह ये अपने ऊपर न भौंक पाएं या कि कोई नकारात्मक और मलीनता भरी वाणी का प्रयोग करते हुए परेशान न कर सकें।

यही कारण है कि बड़े-बड़े और प्रभावशाली लोगों के बारे में कहा जाता है कि ये कुत्ते की जात के हैं या कुत्ते हैं, जो सामने आता है उससे दुर्व्यवहार करते हैं, बेवजह भौंकते, गुर्राते हुए लपक पड़ते हैं और बुरा व्यवहार करते हुए दुःख और तनावोें की बारिश किया करते हैं।

कोई इंसान कितना ही बड़ा हो, इसका कोई अर्थ नहीं है, इंसान होने का अर्थ तभी है कि जब वह बढि़या हो। सच्चा इंसान वही है कि जिसके प्रति सामने वालों के हृदय में प्रेम, माधुर्य और श्रद्धा का प्रकटीकरण हो, इसके बिना इंसान का होना निरर्थक है और ऐसे इंसान मृत्यु लोक में भार के सिवा कुछ नहीं।

इन नकारात्मक लोगों से निपटने में अपनी ऊर्जा खर्च नहीं की जानी चाहिए क्योंकि मच्छरों को मारने के लिए एके 47 की बजाय दूसरे घरेलू उपाय खूब सारे हैं।  इन विध्वसंक मनोवृत्ति के लोगों को मनोरंजन का माध्यम समझें और ईश्वर को धन्यवाद दें कि उसने हमारे मनोरंजन के लिए सब जगह मुफतिया इन्तजाम कर रखें हैं।

यह हमारी मूर्खता है कि हम लोग इनका उपयोग करने की बजाय इन्हें अपने से बड़ा और प्रभावी मान बैठते हैं। दूसरोें की चाबियों और बैट्रियों या रिमोट से चलने वाले लोग दुनिया में सबसे अधिक नाकारा और आत्माहीन होते हैं और केवल बिजूकों की तरह इनका इस्तेमाल होता है।

ये बदचलन और बदहवास हवाओं के इशारों पर चलने वाले पुतले, कठपुतलियां और कठपुतले दुनिया में न कोई बदलाव ला सकते हैं और न किसी का अच्छा या बुरा करने में समर्थ हो पाते हैं।  भगवान को धन्यवाद दें कि उसने अपने बाड़ों, परिसरों और गलियारों में ऐसे लोगों की भरमार कर रखी है जो हमारे लिए मुफतिया मनोरंजन का कितना जोरदार प्रबन्ध कर रखा है।

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