यों पहचाने इंसान को

अपने लिए जीना खुदगर्ज व स्वार्थी इंसान की निशानी है और दूसरों के लिए जीना वास्तविक इंसान को दर्शाता है। इंसान को इसीलिए सामाजिक प्राणी की संज्ञा दी गई है कि वह औरों के लिए जिये, समाज और क्षेत्र के लिए जिये तथा इस प्रकार जिन्दादिली के साथ जिये कि खुद भी मस्त होकर जीवन बसर करे और अपने सम्पर्क में आने वाले तथा आस-पास के सभी लोगों को आनंदित रखे, आनंद प्रदान करे।

हमारी सफलता इसमें नहीं है कि हम किसी न किसी की दया, अनुकंपा पर पलते हुए या नाजायज रास्तों अथवा अवैध संबंधों का सहारा लेकर किसी मुकाम पर पहुँच जाएं तथा औरों पर धौंस जमाते हुए जीते रहें और अपने अहंकारों के झण्डे गाड़ते हुए भय और तनावों भरा माहौल सृजित करते रहें।

बल्कि हमारा जीवन तभी सफल कहा जा सकता है कि जब हम खुद भी मस्ती के साथ निद्र्वन्द्व भाव से जीयें और उन सभी को आनंद भाव में जीने के लिए माहौल दें जो कि हमारे आस-पास और साथ रहते या काम करते हैं अथवा हमारे सम्पर्क में आते हैं।

हमारे सम्पर्क में आने या रहने वाले इंसान यदि हमारे कारण से डर, तनाव और दुविधा में रहें, खिन्नता और मायूसी में जीने लगें अथवा समस्याओं व अभावों का सामना करते रहें तो इसका अर्थ यही है कि हम कमजोर, कायर और अमानवीय हैं तथा हमारे द्वारा बरपाए जा रहे कहर, शोषण और धौंस के कारण से जमाना हमसे दुःखी है।

अपने आयातित मद, पद और कद के अहंकार कभी स्थायी नहीं रहते। या तो पाँच साल या फिर साठ-बासठ साल तक ये धींगामस्ती जारी रहने वाली है, फिर तो अपनी गली के कुत्ते-बिल्लियाँ भी नहीं पूछने वाले। असली प्रतिष्ठा, आदर-सम्मान और श्रद्धा तो वही है कि जो साठ साल के बाद मिले या पाँच साला कुर्सी छिन जाने के बाद।  वरना इससे पहले तो लोग कुर्सी को पूजते हैं, हमें नहीं।

पर हम हैं कि इस शाश्वत सत्य को जान नहीं पाते अथवा जीवन के यथार्थ को जानने की कभी कोशिश नहीं करते। और यही कारण है कि हम जब तक पॉवर में होते हैं तब दुर्जनों और दुराचारियों के कुसंग, धौंस, भ्रष्टाचार, अन्याय और शोषण से लेकर हर तरह की हरसंभव धमाल करते रहते हैं और अहंकारों में इतने अधिक बंध जाते हैं कि हमें और कुछ सूझता ही नहीं हमारे स्वार्थ, मक्कारी, धूर्तता और संग्रह के सिवा।

सब तरह की प्रभुता पाने के बाद भी अहंकार छू न सके, सरलता, सहजता और सादगी बनी रहे, मन निर्मल, दिमाग स्वच्छ और तन पवित्र बना रहे, तभी इंसान अपने आपको इंसान कह सकता है अन्यथा हमारा इंसान होना ही बेकार है।

यही कारण है कि बहुत से स्त्री-पुरुषों के लिए लोग यही कहते हैं कि ये कमीन और नालायक लोग इंसान होने के काबिल नहीं अथवा जिस स्थान पर ये सायास सुशोभित हैं, उन स्थानों की गरिमा और साख मटियामेट हो रही है और इससे तो अच्छा होता कि प्रसूति से पूर्व ही इनका गर्भ समापन हो जाता अथवा कहीं नदी की चट्टान होते तो कम से कम कपड़े धोने के काम तो आते। यहाँ तो ये लेने ही लेने और जमा करने का ही काम कर रहे हैं।

ऎसे खूब सारे स्त्री-पुरुष हमारी जानकारी में हैं, हमारे रिश्तों में हैं तथा हमारे आस-पास रहते हैं या हमारे साथ या ऊपर-नीचे काम करते हैं, जिनके बारे में आम धारणा और अभिव्यक्ति यही सुनने को मिलती है कि ऎसे धूर्त लोग इंसान होने के लायक ही नहीं हैं, पता नहीं कौनसे पुण्य से इंसान की देह पा चुके हैं अन्यथा इनमें इंसानी जिस्म के सिवा और कुछ भी ऎसा नहीं है जिसे देख इन्हें इंसान के रूप में स्वीकारा जाए।

दुनिया में निरन्तर विस्फोटक होती जा रही इंसानों की अवांछित भारी भीड़ में फोरी तौर पर इंसान की पहचान करने को कहा जाए तो मौलिक और असली इंसान को एक ही गुण से पहचाना जा सकता है और वह है उदारता।

उदारता वही रख सकता है जो कि अपरिग्रह में विश्वास रखता हो, संग्रह वृत्ति से परे हो तथा मानवीय संवेदनाओं से भरा-पूरा हो।  उदारता का अर्थ यही है कि औरों के प्रति उदारमना हो, औरों की जरूरतों के प्रति संवेदनशील हो, दूसरों की पीड़ा और अभावों तथा समस्याओं को अपने भीतर अनुभव कर मददगार सिद्ध होने वाला हो।

कुल मिलाकर कहा जाए तो उदारमना इंसान अपनी पूरी जिन्दगी दूसरों के लिए ही जीता है, अपने लिए कभी नहीं। ऎसा इंसान खुद को कष्ट में रखकर भी औरों को खुश रखने तथा पीड़ाओं को दूर कर प्रसन्न रहने का गुण धारण करने वाला होता है।

सीधे साधे शब्दों में कहा जाए तो यह साफ पैमाना है कि जो उदार है वह दैवीय गुणों वाला है और जो कृपण या कंजूस होता है वह आसुरी अवगुणों वाला होता है। अपने आस-पास और सम्पर्क में आने वाले इंसानों की केवल इसी प्रवृत्ति को देख लिया जाए तो इंसान की विशुद्ध, सत्य और सटीक पहचान हो सकती है।

बहुत सारे लोग हैं जो किसी जरूरतमन्द पर खर्च नहीं कर सकते, उनका दिल मानता ही नहीं कि अपने सिवा किसी और के लिए जीयें। यहाँ तक कि ये लोग हमेशा अपनी आवक के खिड़की-दरवाजे और रोशनदान भीतर की ओर खुलने वाले रखते हैं जहाँ आवक ही आवक है, धेला भर भी बाहर जाने का नाम नहीं।

इस किस्म के लोग किसी को चाय-नाश्ता भी कराएंगे तो परायों की जेब से। खूब सारे ऎसे देखे गए हैं जो किसी को अपनी जेब से चाय तक नहीं पिलाते। इसके लिए भी औरों पर निर्भर रहेंगे या कि राज-मद में चाय पिलाएंगे।

जो चाय तक के लिए दूसरों पर निर्भर रहते हैं उनसे आतिथ्य सत्कार और आवभगत की उम्मीद करना भी मूर्खता है। पर ये लोग दूसरों से यह अपेक्षा जरूर करते हैं कि उन्हें भरपूर वीआईपी आतिथ्य प्राप्त होता रहे।

केवल इसी एक कसौटी से किसी की भी पहचान की जा सकती है। जो लोग औरों पर उदारतापूर्वक खर्च करते हैं उन लोगों का दिल बहुत बड़ा होता है। ऎसे लोगों के पास अकूत धन-सम्पदा भले न हो, पर ये लोग कृपण या कंजूसों की नाकारा भीड़ के मुकाबले मुदित और निर्विकार भावों में जीते हैं और इन्हें तथा इनकी जिन्दगी को देखकर माना जा सकता है कि इन पर दैवीय कृपा हमेशा बरसती रहती है।

इसी एक संकेत को पैमाना  मान लिया जाए तो पूरी दुनिया के लोगों के स्वभाव, व्यवहार और असलियत को अच्छी तरह जाना-पहचाना जा सकता है।  वे लोग धन्य हैं जिनके साथ तथा आस-पास निर्मल चित्त वाले उदारमना लोग हैं।

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