पाखण्ड ही है ऎसी भक्ति

भक्ति अपने आप में किसी अथाह महासागर से कम नहीं है। हर कोई अपने-अपने हिसाब से भक्ति करता है। सबके अपने-अपने भगवान हैं जिनसे वह सब कुछ चाहता है और मनोकामनाएं पूरी करने के लिए प्रार्थनाएं करता है।हर इंसान की भक्ति के तौर तरीके अलग-अलग हैं और उनका अवलम्बन करता हुआ वह जीवन में आगे से आगे बढ़ना और  सब कुछ पा जाना चाहता है जो कि अभीप्सित है। कोई चाहे किसकी भक्ति करे, किसकी भी पूजा करे और किसी के प्रति भी विश्वास रखे, लेकिन सभी भगवानों की भक्ति और धर्मों का सार यही है कि इंसान अपने कर्म को पूजा समझ कर करे और हर काम को ईश्वर की भक्ति ही माने, तभी उसका जीवन सफल है और उसके इंसान होने का फायदा हैं।

धर्म, अर्थ, कर्म और मोक्ष भरे पुरुषार्थ चतुष्टय में कर्म को भी उतना महत्व दिया गया है जितना तीन अन्य को। इस दृष्टि से धर्म और कर्म तथा इसके बाद अर्थ और मोक्ष का नंबर आता है।हम सभी लोग धर्म पूर्वक कर्म करें तभी अर्थ की प्राप्ति होगी अन्यथा अनर्थ भी होगा और मोक्ष की प्राप्ति की तो कल्पना ही नहीं की जा सकती।

आजकल अर्थ को सर्वाधिक महत्व दिया गया है और बाकी सब कुछ इसके बाद में या नहीं के बराबर हैं। कर्म और भक्ति का भी अपना संबंध है लेकिन कहीं यह शुचिता पूर्ण है और अधिकांश मामलों में व्यभिचारी स्वरूप पा चुका है। बात किसी भी कर्म स्थल की हो, हर जगह काफी लोग ऎसे होते हैं जो आते ही हाथ में अगरबत्ती जला कर वहां टंगी या रखी किसी मूर्ति या स्थान को प्रणाम करेंगे,  अगरबत्ती लगा देंगे और कुछ न कुछ बड़बड़ाते हुए विनम्र मुद्राओं का ऎसा प्रदर्शन करेंगे जैसे कि उनके मुकाबले संसार में दूजा कोई भक्त हो ही नहीं।

कई अपनी टेबिलों पर काँच के नीचे सजाकर रखी गई और कमरे की दीवाराें पर टंगी तस्वीरों को नमन करते हुए कुछ मिनट ऎसे ध्यान में खो जाएंगे जैसे कि परमात्मा से सीधा साक्षात्कार हो रहा हो।

कुछ लोगों की कार्यस्थलों की भक्ति का कोई सानी नहीं। कभी दोनों हाथ पसारकर याचना की मुद्रा में दिखेंगे, कभी एक टांग ऊँची कर प्रार्थना करते नज़र आते हैं और कभी कुछ।   बहुत से भगवदभक्त हैं जो हर काम आरंभ करने से पहले भगवान का स्मरण करते हैं, भक्ति का कोई न कोई सा छोटा माध्यम अपनाते हैं।

पर बात इसके बाद के निर्धारित कर्तव्य कर्म की करें तो साफ पता चलेगा कि इस भक्ति का प्रभाव कहीं होता है, कहीं बिल्कुल नहीं, और कहीं न्यूनाधिक। कई बार देखा जाता  है कि जो भक्ति के नाम पर कर्तव्य स्थल पर जो कुछ करते हैं उसका कोई प्रभाव उनके कर्म पर नज़र नहीं आता।

इससे अच्छा काम वे लोग किया करते हैं जो कर्तव्य स्थल पर इस प्रकार का कोई आडम्बर नहीं करते। बल्कि भक्ति के नाम पर कार्यस्थलों पर कुछ न कुछ प्रार्थना, पूजा और ध्यान आदि करते रहने वाले लोगों में से काफी लोग ऎसे होते हैं जिनके बारे में कहा जाता है कि ये लोग अव्वल दर्जे के कामचोर, कामटालू, भ्रष्ट, बेईमान और रिश्वतखोर हैं, अपनी सीट पर टिकते नहीं, कभी समय पर आते नहीं, कोई न कोई बहाना बनाकर गायब रहते हैं, समय से पहले कार्यस्थल छोड़ कर भाग जाते हैं, अपने दायित्वों को पूरे करने में इन्हें मौत आती है, किसी का काम नहीं करते, लोग इनसे त्रस्त रहते हैं, दिन में कई-कई बार चाय-काफी और कचोड़ी, समोसों और पकौड़ियों के नाम पर आस-पास की होटलों और रेस्तराओं में चक्कर काटते रहते हैं, अपनी ही किस्म के कामचोर और टाईमपास लोगों के साथ गप्पे लड़ाते रहते हैं और इनकी पूरी जिन्दगी समाज और देश के लिए भार स्वरूप ही है।

इनमें से कइयों के घरवाले भी परेशान रहते हैं इनके आलसी-प्रमादी और कामचोरी से भरे व्यवहार के प्रति। ऎसी भक्ति आडम्बर और पाखण्ड से कम नहीं है। हमारे जिस कर्म से कोई इंसान खुश न रह सके, उससे भगवान कैसे खुश रह सकता है।

हर देवी-देवता ने अपने  अवतार का हर क्षण कर्म में ही लगाया है। कोई देवी-देवता ऎसा नहीं है जो कर्म हीन दिखाया गया हो। ऎसे में इनके निकम्मे भक्तों को कैसे सच्चा भक्त माना जा सकता है।

यह केवल भक्ति के नाम पर दिखावा ही है। जो लोग ऎसा कर रहे हैं वे भगवान के नाम पर संसार को धोखा दे रहे हैं और अपने आप को भी। यही कारण है कि सारे ढोंगी, पाखण्डी लोग भक्ति के नाम पर नौटंकी करने के बावजूद दुःखी, बीमारु और प्रतिष्ठाहीन हैं। भगवान बचाए इस पाखण्ड से। नाम भगवान का, और कर्म असुरों का।