भुक्खड़ों ! और कितना खाओगे ?

आजकल लोग वह सब खा रहे हैं जो खाना नहीं चाहिए, और जो खाना चाहिए उससे दूर भाग रहे हैं। लोग जो कुछ खाएं या पीएं, इतना जरूर है कि खाने-पीने वालों की तादाद पहले से कई गुना बढ़ती जा रही है।

अधिसंख्य लोग खाने और पीने के लिए जी रहे हैं और थोड़े-बहुत ऎसे हैं जो जीने के लिए खा रहे हैं। कई ऎसे हैं जिनका पेट भरता है और डकारें भी आती हैं, ढेर सारे ऎसे हैं जो दिन-रात जुगाली करते रहते हैं फिर भी पेट नहीं भरता। कितना ही खा जाएं या पी जाएं, कभी डकार का नाम नहीं लेते।

कई लोग अगस्त्य की तरह जी भर कर इतना पी रहे हैं कि जमाने भर को पी जाने का कहें तब भी पीछे न हटें, कई कुंभकरण की तरह माल साफ कर रहे हैं तो कइयों को खाने के मामले में लगता है भीम के ही भाव आ रहे हों।

खूब सारे ऎसे हैं जो हराम की खा रहे हैं। ऎसे लोगों के खाने और पीने का इंतजाम भी और लोग करते हैं। यहां तक कि ऎसे लोगों की सिम में रिचार्ज भी और लोग करवाते हैं। कई तो ऎसे हैं जिनके लिए घर का खाना बेमानी हो गया है। दिन भर कहीं चाय-कॉफी, कहीं समोसा और कचोरी, पौहे, पकोड़ी और अटरम-शटरम। रोजाना का लंच और डिनर भी बाहर ही तलाशते लेते हैं ये लोग। फिर इन लोगों को खिलाने-पिलाने वाले लोग मिल भी जाते हैं। वे भी ऎसे ही लोग होते हैं जिन्हें घर की बजाय बाहर का, पुरुषार्थ की बजाय हराम का खाने में अलग ही स्वाद और ताजगी का अनुभव होता है।

खूब सारे हैं जिनकी पूरी की पूरी जिन्दगी आवारा पशुओं से भी गई-बीती हो गई है। जागरण से लेकर शयन तक की रोजमर्रा की जिन्दगी में खाने-पीने और गपियाने के कई सारे डेरे हैं। एक जगह पेट भर जाए तो दूसरी जगह का स्वाद ले लिया करते हैं। बकवास और चर्चाओं से एक जगह मन भर जाए तो दूसरे ढेर सारे ठिकाने आगे से आगे तैयार रहते हैं। रहें भी क्यों नहीं, अनचाहे और आकस्मिक टपक पड़ने वाले भी खूब हैं और मनोरंजन की चरमावस्था के प्रतिफल भी अनगिनत हैं।

खाने-पीने वाले पुराने जमाने में भी थे और इस जमाने में भी हैं। अन्तर सिर्फ इतना भर है कि बीते युगों में औरों को खिलाने-पिलाने के बाद खाते-पीते थे और संतोष की साँस लेते थे।

आजकल खिलाने-पिलाने की बात तो गायब हो गई है और खाने-पीने पर जोर है। चाहे यह आसानी से मिल जाए, या फिर धौंस-धमक से मिले अथवा हड़पने से, साधन का कोई मायना अब नहीं रहा, अब सारे भिड़े हुए हैं साध्य की ओर। प्राप्ति हमारा चरम लक्ष्य हो गया है, फिर चाहे हमें इसके लिए किसी भी तरह के रास्तों को अंगीकार क्यों न करना पड़े।

एक जमाना वह था जब खान-पान में शुद्धता और गुणवत्ता थी और जो कुछ खाते थे वह शरीर पर गुण देता था। इतना कि दिल और दिमाग के साथ शारीरिक सौष्ठव का भी कोई मुकाबला नहीं था। तब जेब की बजाय जोर दिया जाता था सेहत पर।

आज लोग कागज के नोटों के दीवाने हो गए हैं इसलिए कागजों की तरह हल्के और हवा में उड़ने के आदी हो गए हैं। पहले आदर्श और सिद्धान्तों का भारीपन था, आजकल हवाएं जिधर बहने लगती हैं उधर ही आदमी बहने लगता है क्योंकि आदमी आदमी न होकर नोट हो गया है।

हर कहीं बाजारवाद हावी है, बिकने वालों की भी कमी नहीं है और खरीदने वालों की भी नहीं।  थोड़ा-बहुत मोल-भाव करने के बाद नखरे दिखाता हुआ हर कोई बिकने को सहर्ष तैयार हो जाता है। कुछ बिरले ही ऎसे बचे हैं जिन्हें किसी कीमत पर नहीं खरीदा जा सकता, वरना बहुसंख्यकों की हालत तो ऎसी ही होती जा रही है। कोई किसी को भी खरीद सकता है।

आदमी अब बिकने और खरीदने वाली वस्तु होता जा रहा है। हुनर और नकारात्मक या विध्वंसकारी गुणों के अनुसार भाव बढ़ते-घटते रहते हैं। कई लोग बार-बार बिक जाते हैं, कई लोग हर बार बिक जाने के लिए ही पैदा हुए हैं और कई ऎसे हैं जो बिक भी जाते हैं और दूसरों को खरीद भी लेते हैं। ऎसे दोतरफा कारोबारियों का आज जमाने में कुछ ज्यादा ही चलन चल निकला है।

इन सभी प्रकार की भीड़ के बावजूद कुछ ही लोग ऎसे बचे हैं जो जीवन का असली आनंद ले रहे हैं। वह भी इसलिए कि उन्हें जीवन के मर्म का भान है वरना बहुसंख्य इंसानी जिस्मों की हालत तो लोभी-लालची, बीमारू और मनोविकारों से ग्रस्त जैसी हो गई है।

इनमें भी सर्वाधिक संख्या उन लोगों की है जो दो-दो हाथों से बटोरने में लगे हुए हैं। इन लोगों को यह भान तक नहीं है कि वे जब आए थे तब भी नंगे थे और जब जाएंगे तब भी नंगे और खाली हाथ जाने वाले हैं।

ऎसे लोग जीवन का संतुलन खो कर सिर्फ दौलत के पीछे ही भाग रहे हैं। कोई ब्लैकमनी को व्हाईट बना रहा है, कोई व्हाईट रास्तों से होकर ब्लैकमनी अपने यहां ला रहा है। यह कालिख अब तो महानगरों से लेकर गांवों तक फैल गई है। जब खान-पान का संतुलन बिगड़ जाता है तब आदमी उन सभी भोज्य और पेय सामग्री से दूर होता चला जाता है जो आदमी के जीने के लिए जरूरी हुआ करती हैं।

पैसा बनाने वाले लोगों का पूरा ध्यान पैसा खाने पर ही टिका होता है और तब प्रकृति ऎसे लोगों को अपने निर्धारित खाद्य और पेय से अपने आप दूर कर देती है। प्रकृति जब भी आदमी की हरकतों के व्यतिक्रम से रुष्ट होती है तब असामान्य बना देती है और प्रकृतिजन्य सामग्री ऎसे लोगों के लिए वर्जित हो जाती है।

कुछ बीमारों और परहेजियों अथवा आत्म-संयमित जीवन जीने वालों को छोड़ दिया जाए तो पैसे खाने वालों का खाना-पीना अपने आप अवरूद्ध हो जाता है और ये लोग सामान्य मनुष्यों से भी गए गुजरे हो जाते हैं। ऎसे लोगों को डायबिटिज, बीपी, हार्ट अटैक जैसी असाध्य बीमारियां घेर लेती हैं और ये दाल-रोटी तक भी ढंग से नहीं खा पाते, फिर मिष्ठान्न की बात तो दूर है।

कोई लाख चाहने पर भी इनका मुँह मीठा नहीं करवा सकता, वरना राम नाम सत्य ही हो जाएं। धन कमाने की अंधी दौड़ में जीवन पूरा इस कदर असंतुलित हो जाता है कि यह असंतुलन मनोविकारों, तनावों, मस्तिष्क पर दबावों, हृदय की तेज धड़कनों आदि के रूप में प्रतिक्रिया देने लगता है। पैसा अपनी जगह है लेकिन पैसे की हाय जिन्दगी भर हाय-हाय ही करवाती रहती है।

पैसा खाने वाले सभी लोगों की जिन्दगी ऎसी ही दयनीय हो जाती है। जिनके पास पैसा तो खूब होता है लेकिन जिसके लिए पैसा कमाया जाता है वह शांति, सुख-चैन, सुकून, सेहत और आनंद ढूंढ़े नहीं मिलता।

ऎसे लोग हर क्षण हड़बड़ी और उद्विग्नता में जीते हैं और अंतिम समय आते-आते इनकी हालत ये हो जाती है कि इनका पैसा इनके किसी काम नहीं आता, बल्कि और लोग इनके पैसों पर मौज उड़ाते हैं और इनके सामने विवश होकर देखते रहने के सिवा कोई विकल्प नहीं होता। अंतिम अवस्था में इन लोगों को थोड़ा-बहुत ज्ञान होने लगता है लेकिन तब तक इनकी मुट्ठी खुल चुकी होती है और इनके पास न समय होता है न शरीर साथ देता है।

अपने इलाकों या अपने आस-पास पैसों के लिए मर-मिटने वाले लोगों को ही देख लें, इनमें से कितने ऎसे हैं जो आराम की जिन्दगी जी पा रहे हैं।  कइयों को तो इसी बात का पछतावा होता है कि आखिर उन्होंने जीवन के बहुमूल्य क्षणों को पैसा बनाने में ही लगा दिया और जब जाने का समय नज़दीक है तो न कोई पुण्य उनके खाते में है, न लोगों की सद्भावना और न आत्मतुष्टि का सुकून।

ऎसे लोग अपनी उत्तरक्रिया भी ढंग से न हो पाने की बातें सोचते-सोचते सब कुछ यहीं पर छोड़-छुड़ा कर दिगम्बर अवस्था में ही वहां के लिए प्रयाण कर जाते हैं जहाँ से आये होते हैंं। अब विकल्प हमारे हाथ में है। जीवन का असली आनंद पाना चाहते हैं या और कुछ।

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