नरकगामी होते हैं व्यक्तिपूजा करने वाले

सर्वशक्तिमान को सर्वोपरि मानते हुए जो लोग जीवननिर्वाह करते हैं, ईश्वर में अगाध श्रद्धा व आस्था रखते हैं उनका ईश्वर पूरा ध्यान रखता है और उनके सारे कर्मों में भगवान मददगार बनता है।

प्रभु के प्रति अनन्य भाव रखने वालों की जीवनयात्रा का हर पल आनन्ददायी होता है और भगवान इनके समग्र जीवन में पग-पग पर ‘योगक्षेमं वहाम्यहम्..’ का दिग्दर्शन कराते रहते हैं।

लेकिन आजकल लोगों का व्यक्ति पूजा में विश्वास कुछ ज्यादा ही बढ़ गया है। ईश्वर को भुलाकर व्यक्तिपूजा करने वालों के लिए जीवन का हर क्षण समझौतों और आत्महीनता के दौर से गुजरता है जहाँ स्वाभिमान नाम की कोई चीज नहीं होती बल्कि उसकी जगह ले लेता है दासत्व अभिमान।

व्यक्तिपूजक वे ही लोग होते हैं जिन्हें ईश्वर अपने से दूर, बहुत दूर रखना चाहता है। या यों कहें कि व्यक्तिपूजा वे ही लोग करते हैं जो प्रभु से दूर रहते हैं। यह उनके ग्रहों का खेल हो, पुराने पापों का उदय या दुर्भाग्य का, लेकिन इतना तो तय है कि ये लोग वह जीवन जीने मेें विफल रहा करते हैं जिसके लिए बड़े अरमानों के साथ भगवान ने उन्हें मनुष्य अवतार प्रदान किया है।

ईश्वर ने जिस कर्मयोग के लिए मनुष्य को पृथ्वी पर भेजा होता है उसमें कहीं भी दासत्व और व्यक्तिपूजा का जिक्र नहीं है बल्कि प्रत्येक मनुष्य को ईश्वर ने अपनी ही तरह संप्रभु बनाया है जहां उसके जीवन निर्माण और व्यक्तित्व तथा व्यवहार के साथ ईश्वर के रूप में प्रतिष्ठित होने के सारे अवसर सुलभ हैं।

लेकिन व्यक्ति विराट और अपार ऊर्जाओं से अनभिज्ञ होते हुए अपने आपको छोटी सी उस फ्रेम में सिमट लेता है जिसे उठाकर कोई भी कहीं भी उपयोग में ला सकता है। यह स्व-निर्मित मकड़जाल ही है जो व्यक्ति को पूरी जिन्दगी अपनी परिधियों में बाँधे रखता है और ऎसे में व्यक्ति की दृष्टि सीमित, व्यवहार संकीर्ण और बुद्धि संकुचित हो जाती है और तरक्की की सीमाएं इतनी छोटी कि उसे अपने मकड़जाल के सिवा कुछ दिखता ही नहीं।

आजकल हर कहीं ईश्वर को भुला बैठे लोग व्यक्तिपूजा के माध्यम से अपने स्वार्थ पूरे कर रहे हैं या कुछ न कुछ पाने के फेर में रमे हुए हैं। इन लोगों के लिए व्यक्तिपूजा ही पूरे जीवन का सार और ध्येय है और उसके लिए ये दिन-रात कुछ भी करने को तैयार रहते हैं।

बड़े लोग इनके लिए कभी बैसाखियों का तो कभी विटामिन-न्यूट्रीन्स का काम करते हैं। और इसलिए भी यह जरूरी हो जाता है कि अपने रॉल मॉडल या कि कल्पवृक्ष के रूप में दिखने और आभासित होने वाले बड़े-बड़े लोगों को खुश करने की सभी विधाओें का इस्तेमाल किया जाए।

यों भी आजकल अनुचर और अनुयायी परम्परा लगातार लम्बी होती जा रही है, लोगों को बड़े लोगों का मन और मस्तिष्क नहीं दिखता, उन्हें मतलब है अपने स्वार्थों से। जिसके स्वार्थ जहाँ पूरे होने की उम्मीद होती है उसी बाड़े में बेफिक्र होकर घुस जाता है और फिर भीड़ में शामिल होकर उन लोगों का जयगान करता रहता है जिनके हाथों से शहद टपकने वाला होता है।

इन लोगों के लिए व्यक्तिपूजा का अर्थ है किसी न किसी को गॉड़ फादर या बॉस-बॉसी बनाकर जीवन निर्वाह करते रहना। कभी-कभी ये रिश्तों में बाँधकर भी स्वार्थ पूरे करने में लगे रहते हैं। घर-संसार को त्याग बैठे लोगोें की भी भीड़ इतनी बढ़ती जा रही है जो अपनी पूजा करवाने को हर क्षण तैयार बैठे रहते हैं। हर किसी को भूख है अपना पूजन करवाने की। किसे भी यह सोचने तक की फुर्सत नहीं है कि जिसे पूजा जा रहा है वह इस योग्य है भी या नहीं।

दूसरों के सहारे जीने वाले और व्यक्तिपूजक लोगोंं के लिए यह जरूरी नहीं कि एकनिष्ठ ही हों, इनके लिए स्वार्थनिष्ठता सबसे ऊँचे पायदान पर और प्रेरक भूमिका में होती है और इसके लिए वे अपने स्वार्थ और समय में बदलाव के हिसाब से आका बदलने को स्वतंत्र होते हैं। इस मामले में वे गणिकाओं भी पीछे छोड़ देते हैं।

जहाँ कहीं लाभ पाने का मौका हो, उस पाले में इनका खिंचाव अपने आप होता रहता है। इनके भाग्य में बहु-आका योग होता है और इन सभी का दासत्व और जयगान करते-करते ये इतने एक्सपर्ट हो जाते हैं हर आका को लगता है जैसे ये सिर्फ उसी के लिए जीते हैं, उसी पर मरते हैं।

योें प्रतिभा सम्पन्न और पुरुषार्थी लोगों के भाग्य में इस तरह की व्यक्तिपूजा होती ही नहीं है। भगवान ने उन्हें इतना सामथ्र्य पहले से ही दे दिया होता है कि इन्हें जिन्दगी में कभी भी किसी क्षण व्यक्तिपूजा की जरूरत नहीं पड़ती। इस किस्म के लोगों के लिए व्यक्ति का सृजन करने वाला ईश्वर ही ताज़िन्दगी सर्वोपरि होता है, वह व्यक्ति नहीं जो अपने आपको पूजवाने से प्रसन्न होने का आदी है।

व्यक्तिपूजा करने वाले लोग पुरुषार्थहीन होते हैं और प्रतिभाओं की कहीं न कहीं कमी से आत्महीनता रखते हैं, तभी तो व्यक्तिपूजा के सहारे अपना समय गुजारने के लिए सदैव प्रयत्नशील रहा करते हैं।

जो लोग व्यक्तिपूजा में विश्वास रखते हैं उनके भाग्य में जीवनभर दासत्व योग और पराधीनता का साया मण्डराया रहता है। ऎसे लोगों से ईश्वर भी दूर रहता है और इनके सोच-विचार में किसी न किसी की व्यक्ति की पूजा का भाव हमेशा बना होता है जिस कारण मरने के बाद इनकी आत्मा भी किसी न किसी आका में अटकी रहती है, इससे इन लोगों की गति-मुक्ति भी प्रभावित होती है।

भले ही गीता में कहा गया है कि अंतकाल में जो प्रभु का स्मरण करता है वह प्रभु को ही प्राप्त होता है। मगर इस किस्म के लोगों के लिए तो ईश्वर से कहीं ज्यादा व्यक्तिपूजा जरूरी हुआ करती है और इनका व्यक्तिपूजा का भाव मरते दम तक पल्लवित होता रहता है। इस वजह से अंतिम समय में भी उन्हें वे ही चेहरे याद आते हैं जिनकी ये पूजा करते रहे हैं।

व्यक्तिपूजा करने वाले लोगों के मनोविज्ञान को समझ लिया जाए तो फिर आदमी के स्वार्थपूर्ण जीवन और आत्महीनता के सारे पक्षों को अच्छी तरह जाना जा सकता है।

कई लोगों की तो आजीविका ही व्यक्तिपूजा पर टिकी हुई है, वे ऎसा न करें तो भूखों मरने की नौबत आ जाए। बड़े-बड़े आका भी इसीलिए ऎसे-ऎसे लोगों को पाले रखते हैं जो उनका गुणगान करते रहेंं, यह जयगान ही इन लोगों के लिए जीवन का लक्ष्य और आकाओं की प्रतिष्ठा में चार चाँद लगाने वाला होता है। यह भी मानना चाहिए कि व्यक्तिपूजा करने वाले लोग समाज में नहीं रहेंगे तो परंपरागत प्रशस्ति गान का हुनर समाप्त नहीं हो जाएगा।

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