कितने काम आते हैं हम औरों के लिए

हमारे जीवन का समग्र मूल्यांकन हमारी धन-सम्पदा, वैभव और पद-प्रतिष्ठा से नहीं होता बल्कि असली मूल्यांकन दूसरे लोग करते हैं।

हम कितने ही महान और लोकप्रिय, अकूत धन-सम्पदा, भूमि और भवनों के मालिक हो जाएं या फिर कोई सी पदवियां पा लें, पुरस्कारों, अभिनंदनों और सम्मानों के ढेर लगा दें, किन्तु यह हमारे सच्चे इंसान होने के पैमाने नहीं हैं।

बहुत से लोग हैं जो हर दृष्टि से सम्पन्न, लोकप्रिय और प्रभावशाली हैं किन्तु जब लोग बात करते हैं, इनके बारे में चर्चाएं करते हैं तब इनके लिए जिन अपशब्दों, गालियों और अश्लील भाषा का प्रयोग करते हैं उसे सुनना भी लज्जाजनक है।

यही कारण है कि बहुत से लोग खुद को हर जह स्वागत-सत्कार कराने, पूजवाने, सम्मान-अभिनंदन पाने के लिए खुद ही बैकडोर से प्रयास करते हैं।

कई सारे लोग तो लगता है कि केवल पुरस्कारों और सम्मानों को पाने के लिए ही पैदा हुए हैं।

ढेरों हैं जो कि छपने-छपवाने, तस्वीरों का आभामण्डल जगजाहिर करने को ही जिन्दगी समझ बैठे हैं।

कुल मिलाकर बात यह है कि आदमी अब किसी के हृदय में जगह बना पाने में समर्थ नहीं है बल्कि किसी न किसी बेजान कैनवास पर ही अपना स्थान बनवाकर खुश हो जाता है।

बहुत से लोग हैं जिन्हें कोई दिल से नहीं चाहता लेकिन तिलस्म ऎसा रच देंगे जैसे कि इनके मुकाबले दुनिया में सारे लोेकप्रिय और लोेकमान्य फीके हैं और ये ही हैं जो सदियों बाद जन-मन के हृदय सम्राट या हृदय साम्राज्ञी के रूप में पैदा हुए हैं।

हम अपना कद कितना ही ऊँचा उठा लें, किसी बड़े आदमी या औरत अथवा विराटकाय व्यक्तित्व की गोद या माँद में स्थान क्यों न पा लें, हमने यदि औरों के लिए कुछ नहीं किया तो यह मान लेना चाहिए कि हमारा जीवन व्यर्थ चला गया।

हमारे जीवन का उद्देश्य केवल हमारा अपना पेट या घर भरना नहीं है बल्कि हमारा जीवन औरों के काम आना चाहिए। जो औरों के काम आते हैं, सेवा और परोपकार को अपनाते हैं उन्हीं लोगों का जीवन सफल है।

बहुत से लोग कहते हैं कि वे काम तो खूब करते हैं किन्तु जस नहीं मिलता। इसका मूल कारण यह है कि किसी भी काम की एवज मे मेहनताना अथवा उपहार या धन्यवाद पा लिया जाए तो हमें इसके बाद यश प्राप्ति की कामना छोड़ देनी चाहिए।

यश केवल उन्हीं कामों का मिलता है जो काम हम निरपेक्ष भाव से बिना किसी अपेक्षा के लोक मंगल की भावना से करते हैं। इसलिए लोगों की यह बात सरासर बेमानी है कि कितना ही काम कर लें उन्हें यश नहीं मिलता।

यश पाना है तो पैसा, उपहार और आभार की कामना छोड़नी पड़ेगी। और इनके छोड़ देने के बाद अच्छे कामों का यश प्राप्त न हो पाए, यह कभी संभव है ही नहीं। औरों की भलाई और मदद के लिए आगे आकर काम करें। इसी से अपना भी भला हो सकता है।