अतिथि सत्कार में न करें अपना-पराया

अतिथि सत्कार में न करें अपना-पराया

अतिथि के मामले में स्पष्ट रूप से इस बात को समझ लेने की जरूरत है कि जो कोई अतिथि हमारे दर पर आता है उसका आतिथ्य कर हम कोई अहसान नहीं कर रहे हैं बल्कि वह अतिथि हमें उपकृत करने के लिए आया है। अतिथि सेवा का बड़ा भारी पुण्य प्राप्त होता है और इसलिए हमारे घर पर जब भी अतिथि का आगमन हो, सौभाग्य मान कर अतिथि सेवा करें।

रोजमर्रा की जिन्दगी में सभी प्रकार के शास्त्रीय और धर्माेचित कृत्यों में अतिथि यज्ञ का भी प्रावधान है जिसमेंं हर व्यक्ति और परिवार के लिए यह जरूरी है कि वह अतिथियों की सेवा करे और अपनी उदारतापूर्वक सेवा के माध्यम से अतिथियों को प्रसन्न रखे।

तभी हमारा रोजाना का अतिथि यज्ञ का कर्म सफल हो सकता है। कोई सा अतिथि अपने घर से अप्रसन्न या निराश होकर लौटता है तो उसका पाप लगता है व इसका दुष्परिणाम हमें भुगतना ही पड़ता है। अतिथि को देवता की संज्ञा दी गई है और इसीलिए कहा गया है – अतिथि देवो भव।

जितने समय अतिथि अपने घर ठहरता है, विश्राम पाता है, खान-पान करता है, उतने समय तक यह मानना चाहिए कि स्वयं भगवान हमारे घर विराजमान रहते हैं।  पर हम लोग आजकल सारे यज्ञों और मर्यादाओं की तरह अतिथि यज्ञ को भी भुला बैठे हैं।

किसी अतिथि को खिलाने-पिलाने और उसकी मदद करने से कतराते हैं, अतिथियों के आने पर नाक भौं सिकोड़ते हैं, अतिथि की सेवा तो दूर रही, सेवा के नाम पर कुछ भी करने में हमें मौत आती है और यही चाहते हैं कि हमारे यहां कोई अतिथि आए ही नहीं ताकि अतिथियों के नाम पर कोई पैसा खर्च हो ही नहीं। पैसा बचाने के लिए अतिथियों के अनादर और उनसे बचने का हमारा प्रयास हमारे ही लिए दुःखदायी होता है।

अतिथियों को सेवा को भुलाने के साथ ही हमारे मन से अतिथियों के प्रति आदर-सत्कार की सामान्य भावनाएं भी नहीं रही। हम चाहते हैं कि ऎसा कोई इंसान हमारे दर पर आए ही नहीं जिसके कारण से हमारा कोई खर्च हो, समय, श्रम और पैसा बरबाद हो।

और कोई सा अतिथि भूले-भटके आ भी जाए, तो हम सभी हमेशा इसी में लगे रहते हैं कि वह जाए कब। और न जाए तो हममें से कई सारे लोग उन्हें घर से भगाने के उपायों को आजमाने लगते हैं।

अतिथियों को लेकर हम सभी खुदगर्ज और धन संग्रही लोगों के मन में मलीनता आती जा रही है।  हमारी मनःस्थिति ही ऎसी हो गई है कि अतिथि आने का मतलब फालतू का खर्च और समय जाया करना।

अतिथियों और उनकी सेवा को लेकर सभी लोगों के अलग-अलग मंतव्य और व्यवहार हैं। बहुत से लोग हैं जिन्हें अतिथियों और उनकी सेवा से कोई सरोकार नहीं है। ये लोग केवल उन्हीं लोगों को आतिथ्य सत्कार देते हैं जिनसे अपने किसी न किसी स्वार्थ की पूर्ति होती रहती है अथवा इनसे किसी भी प्रकार के वैध-अवैध रिश्ते बने हुए हों या निकट भविष्य में कोई सा बड़ा स्वार्थ टकराने वाला हो।

इसके अलावा ये लोग दूसरों को किसी काम का समझते ही नहीं। इस किस्म के लोगों के लिए अतिथियों की आवभगत अपने स्वार्थ, कामों और ऎषणाओं से भरी रहती है। इनका किसी से कोई काम न पड़े तो पानी का न पूछें।

लोगों की एक किस्म ऎसी है जिनके लिए अतिथि सत्कार जरूरी तो है लेकिन इसमें भी वे अपना-पराया करते हैं। कई लोग पीहर या अपने घर-परिवार और नाते-रिश्तेदारों के लिए बड़े ही प्रेम भाव से डूब कर समर्पित आतिथ्य सत्कार करेंगे लेकिन ससुराल वालों और ससुराल के रिश्तेदारों के प्रति उनके मन में भाव दूसरे होते हैं इस कारण ससुरालिया अतिथियों को दूसरे दर्जे के अतिथि के रूप में देखा जाता है।

कई लोग अपनी ससुराल के अतिथियों और उनसे जुड़े हुए लोगों को भरपूर आतिथ्य देते हैं लेकिन इनके अलावा के लोगों को आतिथ्य देना इनके मन में होता ही नहीं।

अधिकांश मामलों में लोग अतिथियों को अपने और पराये में बाँट कर देखते हैं और उसी के हिसाब से आतिथ्य सत्कार देते हैं। जिन्हें वे अपना अतिथि मानते हैं उनके लिए सारा का सारा आतिथ्य और समर्पण उण्डेल दिया करते हैं और जिन्हें वे पराया मानते हैं उन अतिथियों को कोई तवज्जो नहीं दी जाती।

अतिथि सत्कार के मामले में जो लोग भेद दृष्टि अपनाते हैं, अतिथियों की सेवा से कतराते हैं और अतिथियों को भार मानते हैं उन लोगों को अतिथि यज्ञ का कोई फल प्राप्त नहीं होता बल्कि अतिथियों की अप्रसन्नता के कारण इन्हें अनिष्ट का सामना करना पड़ता है।

अतिथियों का अनादर करने वाले लोगों का कभी कल्याण नहीं हो सकता, क्योंकि उन लोगों से कुलदेवता, पितर, उनके देवी-देवता आदि सभी नाराज रहा करते हैं और अतिथि अनादर से वे हमेशा रुष्ट रहा करते हैं। अतिथि अपने आप में अतिथि है और इसलिए वह आदर-सम्मान और सेवा का हकदार है और रहेगा।

अतिथियों की सेवा में लगने वाला धन यदि अतिथियों के लिए खर्च नहीं होगा तो वह धन गंभीर बीमारियों के ईलाज, डॉक्टरों और जाँच में चला जाएगा, नष्ट हो जाएगा, चोरी चला जाएगा या फिर रिश्वत देने, कोर्ट-कचहरी  के मुकदमों आदि में खर्च हो जाएगा।

अपने धन की इस प्रकार दुर्गति से तो यही अच्छा है कि हम अतिथि यज्ञ का पालन करते हुए अतिथियों की प्रसन्नता से सेवा करें और पुण्य का लाभ प्राप्त करें। अतिथियों पर उदारतापूर्वक खर्च करते रहें।

जो लोग अतिथि यज्ञ से बचते रहते हैं, उन्हें भी बाहर कहीं आतिथ्य प्राप्त करने में अड़चनों का सामना करना पड़ता है और आतिथ्य पाने के लाले पड़ जाते हैं।

क्यों न हम सारी समस्याओं और विपदाओं से बचने के लिए अतिथि यज्ञ की परंपरा को अपने जीवन में अपनाएं और मौज-मस्ती की जिन्दगी पाएं। इस यज्ञ का महत्व दूसरे यज्ञों से कम नहीं है।