सबसे बड़ा सुकून – घर और घरवाले

इंसान की पूरी जिन्दगी में बाकी सब कुछ मिल जाए लेकिन घर और घर वाले न मिल पाएं, तो जिन्दगी बेकार ही अनुभव की जाती है।

पहले ठिकाने की तलाश फिर ठिकानेदारों की। घर होगा तो घरवाले भी होंगे ही। लेकिन घर ही नहीं होगा तो चाहे पूरी दुनिया हमारी क्यों न हो जाए, हम बेघर ही कहलाएंगे।

दुनिया के प्रत्येक जीव के लिए धरती का बिछौना और आसमाँ की छत प्रकृतिप्रदत्त आरंभिक उपहार है लेकिन उसके बाद जो रोटी, कपड़ा और मकान मुहैया कराता है वह सबसे बड़ा मददगार होता है जिसे इंसान जिन्दगी भर याद करता है। आने वाली पीढ़ियाँ भी खुले दिल से स्मरण रखती हुई समय-समय पर श्रद्धा अभिव्यक्त करती रहती हैं।

आदमी का प्रारंभिक संघर्ष रोटी, कपड़ा और मकान के लिए शुरू होता है, बाकी सारी बातें बाद में आती हैं। एक आम इंसान की जिन्दगी में इन्हीं का सर्वोपरि महत्व है और यही उसके पूरे जीवन की वह बुनियाद है जिसके सहारे पूरी जिन्दगी हँसी-खुशी गुजार देता है और आने वाली पीढ़ियों को ठिकाना दे जाता है।

जिसका अपना घर होता है वह अपने आप पर गर्व करता है और उसे इस बात का संतोष भी होता है कि छोटा-बड़ा जैसा भी है, उसका अपना घर है। इस संतोष के आगे सभी प्रकार के दूसरे संसाधन कहीं नहीं ठहरते।

घर अपने आप में हर किसी इंसान का एक वह केन्द्र होता है जिसे पृथ्वी पर वह अपना स्थायी ठिकाना मानकर चलता है। कोई आदमी कितना ही बड़ा क्यों न हो जाए, अपनी मातृभूमि पर अवस्थित या उपलब्ध घर उसका स्वाभाविक केन्द्र हो जाता है जिससे उसकी पहचान होती है।

यही पहचान आगे चलकर गृह गांव, गृह नगर और गृह जिले के रूप में प्रतिष्ठित होती चली जाती है। इस दृष्टि से मातृभूमि, गृह और इंसान का रिश्ता सदियों पुराना रहा है।

घर वालों और घर का भी गहरा संबंध है। घर हो और घरवाले न हों अथवा ढंग के न हों, तब भी आफत बनी रहती है। दूसरी ओर भरपूर माधुर्य बिखरने वाले घरवालों का पूरा कुनबा हो तथा घर न हो तब भी जीवन समस्याओं से घिरा रहता है।

जो धरती पर आया है उसके लिए बसेरा जरूरी है। खासकर इंसान के लिए तो इसकी आवश्यकता स्वयंसिद्ध है। दुनिया में जहाँ-जहाँ प्राणियों के लिए आवास की व्यवस्था की जाती है वह दैवीय कार्य है जिसमें सेवा, परोपकार और जगत का कल्याण सब कुछ छिपा हुआ है।

आसमाँ की नैसर्गिक छत के बाद प्राणियों को सर्दी, गर्मी और बरसात आदि हर मौसम में सुरक्षित जीवन देने और चहारदीवारियों के बीच आत्म मुग्ध एवं सुरक्षित जीवनयापन के लिए आवास हर किसी की पहली जरूरत है।

दुनिया में जहाँ कहीं जरूरतमन्दों और बेघरों को बसाने के लिए घर मुहैया कराने की जो-जो भी योजनाएं और कार्यक्रम चल रहे हैं उन सभी को पूरी ईमानदारी, पक्षपातहीनता और पारदर्शिता से पूर्ण किया जाए तो इससे बड़ा और स्थायी लोक कल्याण का कार्य और कुछ हो ही नहीं सकता।

छत अपने आप में बहुआयामी संरक्षण का प्रतीक है। उसके साये में जो रहता है वह अपने आप सुरक्षित और संरक्षित रहता है, साथ ही उसका जीवन निश्चिन्तता से भरा होता है। साया चाहे माता-पिता, बुजुर्गों, गुरुजनों का हो या फिर अपने आशियाने का, ये हर  प्रकार का सुकून देने वाले ही सिद्ध होते हैं।

अपने से बड़ों का साया होने पर ग्रह-नक्षत्रों का कुप्रभाव हम पर नहीं पड़ता। उसी तरह खुद का घर होने पर भी आत्मसंतुष्टि के साथ परिवेशीय कवच हमें सुरक्षा और जीवनीशक्ति प्रदान करता है।

इस दृष्टि से वे सारे कार्य स्तुत्य और अनुकरणीय हैं जो जरूरतमन्दों की बरसों और दशकों पुरानी, तथा कहीं-कहीं पीढ़ियों से संजोये हुए स्वप्न को पूर्ण करते हैं।

जीवों और जगत का कल्याण करना भगवदीय कार्य है और जो लोग इस कार्य में पूर्ण निष्काम भाव से मददगार सिद्ध होते है वे यश और पुण्य के भागी होते हैं।

वास्तव में देखा जाए तो यही लोग असली वैष्णवजन हैं जो जितना कुछ कर रहे हैं वह जननी और जन्मभूमि से लेकर जगदीश्वर तक की प्रसन्नता पा लेते हैं।

इस तरह के कार्यों में भागीदारी निभाना और हरसंभव सहयोग करते हुए श्रेय लुटाना ही सज्जनों का गुणधर्म है।  जो अच्छा कर रहे हैं उन्हें अच्छे से अच्छा करने दीजियें, उन्हें सराहें और जब कभी मौका आए उन्हें पूरा आशीर्वाद तथा स्नेह दें, उनके प्रति श्रद्धा रखें। यही आज का युगधर्म है।