खोखले लोग, खोटे करम

खोखले लोग, खोटे करम

इस रहस्य से बहुत कम लोग वाकिफ होंगे कि जिन लोगों को हम बड़ा, महान, पूज्य और सर्वश्रेष्ठ मानते रहते हैं उनमें से कुछ फीसदी ही ढंग के होते हैं जिन्हें वास्तव में श्रेष्ठ स्वीकारा जा सकता है अन्यथा इन बड़े लोगों में अधिकांश खोखले ही हुआ करते हैं।

यदि ये अपने खोखलेपन और कमजोरियों को ढकने के ताम-झामों और अभिनय से दूर रहें तो साफ तौर पर देखा जा सकता है कि ये कितने खोखले और बुद्धि तथा शरीर से  जीर्ण-शीर्ण हो चुके हैं।

बहुत से लोगों को हम पूज्य, महान और सर्वोत्तम मानते हुए उन्हें अभिवादन करते हुए खुश रखने की कोशिश करते रहते हैं और उनकी कृपा दृष्टि पाने को लालायित बने रहते हैं। और खूब सारे लोगों को हम न चाहते हुए भी चरणस्पर्श कर लेते हैं।

और यह सब इसलिए कि या तो उनसे हमें भय लगता है और यह डर हमेशा सताए रहता है कि कहीं जाने-अनजाने में ये हमारा कुछ बुरा न कर दें। और दूसरा हमें यह भरोसा होता है कि भविष्य में कभी किसी काम आ सकते हैं। अन्यथा और कोई कारण नहीं कि इन्हें हम नमस्कार करें और इन्हें आदर-सम्मान दें।

कुछ फीसदी बड़े लोगों को छोड़ दिया जाए तो कोई भी किसी को श्रद्धा से या दिल से अभिवादन नहीं करता। इसका मूल कारण यह है कि बड़ा होना ही काफी नहीं है, बढ़िया होना जरूरी है। और जो इंसान कितना ही बड़ा हो लेकिन उसकी वृत्तियां अनुकरणीय नहीं हैं, उसके प्रति हमारे दिल में श्रद्धा नहीं है तो ऎसे इंसान के प्रति श्रद्धा व्यक्त करना नौटंकी और धूर्तता के सिवा और कुछ नहीं है।

बहुत से बड़े-बड़े लोगों के बारे में कहा और सुना जाता है कि इनमें आपस में चूहे-बिल्ली या बिल्ली-कुत्ते अथवा साँप-नेवले का बैर है और आपस में एक-दूसरे के जानी दुश्मन हैं। चाहे इनके तबेले, कबीले, बाड़े और गलियारे एक ही क्यों न हों किन्तु भीतर ही भीतर संघर्ष इतना कि बस चले तो एक-दूसरे को यमद्वार तक पहुँचाकर ही दम लें।

किन्तु जब सार्वजनिक तौर पर कहीं जमा होते हैं तब गले मिलकर ऎसे मुस्कुराते हैं जैसे कि यह जुगलबन्दी सदियों तक याद रखी जाने वाली हो। प्रगाढ़ संबंधों की दुहाई देते हुए शॉल, साफों, पगड़ियों और साड़ियों से अभिनंदन करते हुए परस्पर तारीफों के पुल भी ऎसे बांधते रहते हैं जैसे कि इनके जैसे दुनिया में और कोई न हों।

‘अहो रूप – अहो ध्वनि’ के महा अभिनय का पाखण्डी दिग्दर्शन कराते हुए ये बड़े और महान लोग ‘ऊष्ट्राणाम विवाहेषु गीत गायन्ति गर्दभा’ की पुरातन उक्ति को भी बौनी साबित कर गुजरते हैं।

इसे देख कर तो यही लगता है कि जो जितना अधिक महान और बड़ा दिखता है वह उतना होता नहीं है बल्कि सामान्य लोगों के स्तर से भी नीचे जीवन जीता रहता है। वह जो कुछ करता है किसी अभिनय से कम नहीं होता। बल्कि यह कहें कि यह विशुद्ध अभिनय ही होता है, तो कोई गलत नहीं होगा।

किसी भी इंसान को उसके पद, प्रतिष्ठा और पैसों से तौलना और मूल्यांकन करना संभव नही है बल्कि उसका आत्म तत्व कितना अधिक सबल और शक्तिशाली है, इस पर उसका मूल्यांकन निर्भर करता है। और यह आत्म तत्व तभी घनीभूत और प्रबल रह सकता है जब इंसान के भीतर धर्म, सत्य, नीति, न्याय और इंसानियत के मौलिक गुणधर्म पूरी की पूरी मात्रा में बने रहें।

इनका ज्यों-ज्यों क्षरण होता रहेगा, त्यों-त्यों जमीर का खात्मा होता रहेगा। फिर ऎसे लोग मन, कर्म और वचन के पक्के या धनी नहीं रह पाते। इनके जमीर को टिकाये रखने वाले तत्व खिसकने लगते हैं और एक समय बाद इनका जमीर समाप्त हो जाता है।

यह जमीर ही है जो इंसान को ठोस माद्दा प्रदान करता हुआ जीवट व्यक्तित्व का धनी बनाता है और भीड़ से अलग होने का आभास कराता है। लेकिन जैसे ही जमीर समाप्त हो जाता है, इंसान अपना सब कुछ खोने लगता है।

ऊपर से स्वार्थ और पाप कर्मों में प्रवृत्त होने के कारण व्यभिचारी मनोवृत्ति हावी होने लगती है, भ्रष्टाचार, दलाली और रिश्वतखोरी को अपना लेता है, बिना मेहनत के धन प्राप्ति और संग्रहण के साथ ही परायों के पैसों, संसाधनों और हराम की माल-मलाई पर आश्रित होने लगता है।

इस अवस्था में उसका शरीर और सारा का सारा खर्च तक दूसरे के पैसों पर चलने लगता है। इस वजह से उसका अपना कुछ नहीं रहता। जो रक्त, हाड़-माँस और शरीर दिखता है वह भी पराये खान-पान और पैसों से भरा रहने लगता है।

यह वह स्थिति होती है कि जब कोई सा मनुष्य कितना ही सुन्दर, साण्डों की तरह हृष्ट-पुष्ट और पॉवरफुल दिखे, वह पूरी तरह खोखला ही होता है। और खोखला आदमी किसी काम का नहीं होता, वह केवल लफ्फाजी वाली बातें कर सकता हैं, औरों को भरमा सकता है, मुगालते में रख सकता है और अपना मिथ्या वर्चस्व दर्शाता हुआ टाईमपास कर सकता है।

उसे अपने आपके भी खोखले होने का पूरा और पक्का अहसास भी होता है किन्तु जमाने की नज़रों में खुद को बड़ा और प्रभावशाली दिखाने भर के लिए उसे तमाम प्रकार के अभिनय, नौटंकी और तमाशों का सहारा लेना पड़ता है।

यह उसकी वह विवशता है जिसे या तो वह जानता है अथवा उसकी आत्मा। अपने खोखलेपन और नाकारात्व के बारे में वह किसी से जिक्र भी नहीं कर सकता। सच कहे तो प्रभाव खत्म हो जाए और न कहे तो खुद।

जो जितना अधिक खोखला होता है उस पर बददुआओं और सात्ति्वक शक्तियों का मारक और घातक प्रभाव उतना अधिक तेजी से होता है और ये अपना इतना अधिक अचूक प्रभाव छोड़ती हैं कि खोखले लोगों के पास इनसे बचाव का कोई मार्ग नहीं होता।

आम तौर पर हम लोग बड़े-बड़े लोगों की दुष्टता, शोषण, अत्याचारों और प्रताड़नाओं के मामले में यह समझ कर चुप्पी साध जाते हैं कि बड़े लोगों से पंगा कौन ले। क्योंकि हम इनके बाहरी और झूठे बड़ेपन को देखते हैं, भीतर के खोखलेपन और हिल चुकी बुनियाद से परिचित नहीं होते।

जबकि शाश्वत सत्य यह है कि इन बड़े लोगों की अपार भीड़ में कुछ प्रतिशत सात्ति्वक और सदाचारी लोगों को छोड़ दिया जाए तो बाकी सारे खोखले ठूँठ की तरह होते हैं, जिनके लिए एक धक्का भर ही काफी हुआ करता है।

जो बढ़िया नहीं है वो कभी बड़ा नहीं हो सकता। अत्याचारी और शोषक की तरह धीेंगामस्ती कर रहे बड़े-बड़े खोखले लोगों से हर प्रकार का भय त्यागें और अधर्म से समाज और देश को बचाने के लिए आगे आएं। यतो धर्मस्ततो जय।

2 comments

  1. English m good,better,best k Baad ydi kuch h to aapki कृति है

    • बहुत-बहुत आभार।
      यह सारा सृजन मेरा नहीं, ईश्वरीय संकेतों का शब्द प्रताप रूपी प्रतिफल है।