पापमुक्ति में सहायक हैं दुष्ट और नीच सहकर्मी
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पापमुक्ति में सहायक हैं दुष्ट और नीच सहकर्मी

भौतिकता और दिखावों से भरे मौजूदा युग में आदमी बाहरी संसाधनों, पद-प्रतिष्ठा और वैभव से परिपूर्ण होने लगा है लेकिन इसी अनुपात में भीतर से खोखला होता जा रहा है।

अब न किसी पर आसानी से भरोसा किया जा सकता है और न ही किसी भी काम को दूसरों को सौंपकर निश्चिन्त हुआ जा सकता है। इसी तरह हम सभी की विश्वसनीयता पर खतरा मण्डराने लगा है।

लगता है कि जैसे कोई भरोसेमन्द रहा ही नहीं अथवा भरोसा उठता जा रहा है।  जिस इंसान पर थोड़ा-बहुत भरोसा कर भी लिया जाता है तो कुछ दिनों बाद ही उसकी कलई खुलने लग जाती है और फिर पछतावा होने लगता है।

लेकिन हमारे भरोसे के होने या न होने का कोई अर्थ नहीं है क्योंकि आजकल इंसान अपने स्वार्थ, गलाकाट प्रतिस्पर्धा में दूसरों को नीचा दिखाकर खुद के कद को ऊँचा उठाए रखने, बिना मेहनत किए पैसों और संसाधनों की भूख को शान्त कर उन्मुक्त भोग-विलास की लालसा पूरी करने, बड़े-बड़े लोगों के साथ रहकर या नाम जोड़कर खुद को बड़ा दिखाने के फेर में वह सब कुछ करने लगा है जो न इंसानियत की परिभाषा मेंं आता है और न ही मर्यादाओं में।

आदमी टिकाऊ होने की बजाय बिकाऊ, खाऊ और दिखाऊ होता जा रहा है और यही कारण है कि हर तरफ संस्कृति, सभ्यता और संस्कारों का संकट पैदा हो गया है। धीर-गांभीर्य भरा जीवन, विनम्र और शालीन स्वभाव तथा परोपकार के सारे मूल्य ध्वस्त होने लगे हैं और इन सबकी बजाय एक सूत्री लक्ष्य यही रह गया है कि चाहे जिस तरह हो, अपना काम निकलना चाहिए, हमें हर दृष्टि से लाभ होना चाहिए चाहे इसके लिए किसी का गला ही क्यों न काटना पड़े, किसी के कान क्यों न भरने पड़ें और किसी को लांछित कर कितना ही नीचे क्यों न दिखाना पड़े। न छोटे-बड़े की कद्र है, न और कोई अन्तर।

फिर आजकल धर्म संगत और न्यायप्रिय व्यवहार करने वाले हाशिये पर हैं, गुणग्राही लोग खत्म होते जा रहे हैं और उन्हीं का बोलबाला है जो एक-दूसरे के प्रशस्तिगान, पारस्परिक समृद्धि में अभिवृद्धि करने वाले और एक-दूसरे की कमजोरियों को ढंकते हुए लाभान्वित होने वालों में शुमार हैं।

इन तमाम हालातों ने दुनियावी माधुर्य और सद् व्यवहार के गणित को बिगाड़ कर रख दिया है। हममें से बहुत सारे लोग अक्सर उन लोगों से परेशान रहा करते हैं जो हमारे सहकर्मी या संगी-साथी के रूप मेंं एक ही प्रकार के बाड़ों और गलियारों साथ-साथ काम करते हैं लेकिन इनमें मानवीय मूल्याेंं का इतना अधिक क्षरण हो चुका है कि या ये अपने स्वार्थ, लाभ के कामों और हर तरह की प्राप्ति में इतने अधिक माहिर हैं कि सज्जनों और कर्मयोगियों का जीना दूभर होने लगा है।

ये लोग हमसे ऊँचे भी हो सकते हैं और नीचे वाले भी। ये दुष्ट लोग भले ही हमेंं नाकारा, विघ्नसंतोषी और बुरे लगें, हमारे कामों में टाँग अड़ाते रहें, हमारी निन्दा करते रहें, अपने निकम्मेपन, प्रतिभाहीनता और मूर्खता को ढंके रखने के लिए लाख षड़यंत्र करते रहें, बावजूद इसके इनका हमारे जीवन के लिए बहुत बड़ा उपयोग है।

इस तथ्य को समझ कर स्वीकार करने की आवश्यकता है। जो उपयोग गंदगी हटाने में गिद्धों और सूअरों का है वही उपयोग इन दुष्ट, नीच, खल और कामी सहकर्मियों से लिया जा सकता है। जो लोग मोक्ष, जीवन्मुक्ति या गति-मुक्ति में विश्वास रखते हैं उनके लिए ये सहकर्मी श्रेष्ठ साबित होते हैं क्योंकि जो लोग मुक्तिपथ के अनुगामी हैं उनके लिए यह जरूरी है कि ऎसे खूब सारे लोग हमारे आस-पास हों जो हमारे बारे में चर्चाएं करें, अनर्गल अलाप-प्रलाप करते रहें, हमारी निन्दा करते रहें ताकि हमारे पूर्वजन्मों से चले आ रहे संचित पापों और वर्तमान जन्मों के पापों का खात्मा हो सके।

रोजाना अधिकांश समय साथ बिताने वाले ये सहकर्मी या दूसरे लोग हमारे बारे में अनचाही और अनमनी बातें करते हुए हमारे सारे पापों को अपने खाते में जोड़ लिया करते हैं और उधर हम इन पापों से मुक्त होने लगते हैं। यों भी भगवान जब हम पर कृपा करने लगता है तब किसी न किसी को हमारे पाप स्थानान्तरित करने के लिए निमित्त बनाता है और ऎसे दुष्ट सहकर्मी और अपने से संबंधित उच्च-निम्न लोग हमसे ईष्र्या रखने के कारण शीघ्र निमित्त बन जाया करते हैं।

ईश्वर स्वयं कभी अपने ऊपर नहीं लेता, वह पापियों को निमित्त बनाता है ताकि वे सच्चे और अच्छे लोगों के बारे में बकवास करते रहें, हीन हथकण्डे अपनाते रहें, बेवजह परेशान करने के सारे षड़यंत्र रचते रहें। ऎसे अधम और पैशाचिक स्वभाव वाले सहकर्मी तब तक हमारा पीछा नहीं छोड़ते जब तक कि हमारे सारे पापों को अपने ऊपर नहीं ले लेते।

इसके बाद औरों के पापों के भार से ये लोग अपने आप ऎसे बेदम और जड़ हो जाया करते हैं कि कोई नामलेवा नहीं बचता। लेकिन यह स्थिति तभी आ सकती है कि जब हम न इन पर कोई क्रिया करें, न प्रतिक्रिया। इन्हें दुष्टता और नीचता करने दें चाहे कितनी ही हदें पार करते रहें। खुद निश्चिन्त और प्रतिक्रियाहीन रहें, यह पापों को उनके खातों में पहुंचाने और खुद को पापमुक्त करने का सबसे बड़ा और कारगर प्रयोग है।

किसी भी जीवात्मा के पापों का खात्मा करने के लिए यों तो कई जन्म लेने पड़ते हैं, खूब प्रयास करने पड़ते हैं लेकिन पापी और दुष्ट सहकर्मियों के कारण कई जन्मों के पाप एक ही जन्म में समाप्त हो जाते हैं और हम जीते जी हर प्रकार से मुक्ति का आनंद पाने लगते हैं।

जो हमारे आस-पास जैसे भी हैं, चाहे कितने ही नाकारा, नालायक, भ्रष्ट, धूर्त, कुटिल और मक्कार हों, इन दुष्टों का उपयोग करने की इस कला को जो सीख जाता है वह निहाल हो जाता है।

अपने पूरे जीवन में इतने अच्छे और मुफतिया कचरा संग्राहक और कहीं नहीं मिल सकते। ईश्वर इन सभी दुष्टात्माओं को लम्बी उमर दे ताकि ये सज्जनों और सद्भावी लोगों के लिए काम आ सकें।

One comment

  1. Nice सर वास्तव में कार्य क्षेत्र में सफलता का राजमार्ग भी यही है ।