ऊँचाइयाँ देता है संक्रान्ति काल

परिवर्तन कालचक्र का अपना स्वधर्म है जिसकी सहायता से व्यष्टि और समष्टि में नित-नूतन बदलाव की भूमिकाएं रचती रहती हैं।

यह परिवर्तन ठीक उसी तरह है जिस तरह परमाण्वीय विखण्डन से ऊर्जाओं का नवीन-नवीन प्राकट्य व विस्फुरण होता रहता है और द्रष्टा जगत को परिवर्तन का अहसास कराता रहता है।

परिवर्तन के क्रमिक दौर केवल वहीं पर पाषाण और चट्टानों की तरह लम्बे समय तक जड़ता ओढ़े रहते हैं जहाँ जड़त्व प्रभावित स्थिरता का आधिक्य होता है। अन्यथा जीवन्तता जहाँ भी जिस किसी के लिए विशिष्ट गुणधर्म की प्रतीक होती है वहाँ हर क्षण परिवर्तन का दौर बना रहता है।

इसे न कोई रोक सकता है, और न ही किसी के रुके यह परिवर्तन रुकने वाला हो सकता है। परिवर्तन का यह दौर कभी आभासी होता है, कभी अत्यन्त मन्द-मन्द और कभी-कभार तीव्रता लिए हुए होता है।

यह हवाओं की गति की तरह कभी मंथर और कभी आँधियों की तरह हिला कर रख देने वाला होता है। परिवर्तन का नगण्य वेग सामान्य जन महसूस नहीं कर पाते लेकिन जब इसमें तीव्रता आती है तब यह अनुभव में आने लगता है कि कुछ हो रहा है, कुछ हो सकता है और बहुत कुछ हो चुका है।

परिवर्तन का सामान्य वेग हर किसी को महसूस नहीं होता लेकिन जब कभी तीव्रता का अहसास कराने वाला कुछ होता है तब कालचक्र अपने बिन्दुओं को छोड़कर नवीन बिन्दुओं को केन्द्र बनाने लगता है और यही कालखण्ड हमारे लिए संक्रान्ति काल के रूप में अनुभव होता है।

संक्रान्ति का यह परिवर्तन हमेशा ऊध्र्वमुखी और प्रगतिकारी आभामण्डल की रचना करने वाला होता है। इस संक्रान्ति काल का आविर्भाव ही इसलिए होता है कि हमारी पांचभौतिक देह, ज्ञानेन्दि्रयां और कर्मेन्दि्रयां तनिक विश्राम व शान्ति के धरातल को पा लें और कुछ समय के लिए पूर्ण शून्य-आनंद की अवस्था को प्राप्त कर लें ताकि संक्रांन्ति से पूर्व और पश्चात के लिए होने वाले परिवर्तनों से मन, मस्तिष्क और देह पूर्णतः अनुकूलन बिठा सके और ऊर्जाओं का पुनर्विन्यास और पुनर्भरण सहज-स्वाभाविक रूप से हो जाए।

अक्सर हम सभी लोग जीवन में किसी न किसी एक धारा में चलते चले जाते हुए जड़ता भरा स्थान पा लिया करते हैं तब प्रकृति हमें कुछ समय के लिए सभी प्रकार के कर्मों से इसलिए मुक्त कर दिया करती है ताकि हम शून्यावस्था में पहुंच कर ब्रह्माण्ड के परिवर्तनों के अनुरूप पिण्ड को व्यवस्थित कर सकें।

अन्यथा ऊर्जाओं का असन्तुलन हो जाने पर पिण्ड यानि की हमारे शरीर के संचालन और ऊध्र्वगामी विकास में किसी न किसी प्रकार की बाधाएं अनुभवित हो सकती हैं।

जीवन का यह संक्रान्ति काल ज्योतिषीय संक्रान्तियों की तरह ही पवित्र, पुण्यदायी और आनन्द देने वाला होता है लेकिन बंधे-बंधाये ढर्रों के तानों-बानों में उलझे हुए हम लोग यथास्थितिवादी और सुरक्षित जीवन को बनाए रखने के फेर में वहीं जमे रहने के आदी रहते हैं जहाँ हुआ करते हैं।

जबकि प्रकृति हमारे लिए परिवर्तन चाहती है और वह परिवर्तन भी ऎसा सुखद कि इससे आने वाला समय और अधिक तरक्की और समृद्धि वाला होता है।

हम सभी को यह मानना ही होगा कि जीवन का प्रत्येक संक्रान्ति काल हमारे लिए पूर्वापेक्षा अधिक वैभवशाली और ऊँचाइयों के आने का संकेत देने वाला है। हमारे ऊध्र्वरेता होने के अवसर देने के लिए ही संक्रान्तियां आती हैं।

जीवन में जब कभी संक्रान्ति काल का अहसास हो, उसे पूर्ण विश्राम के साथ शून्यता पाने में लगाएं, अपने जो कर्म अधूरे रह गए होते हैं उन्हें पूर्णता देने में लगाएं और उन कामों में रुचि लें जिन कामों को हम कार्य आधिक्य और समय की कमी के कारण नहीं कर पाए होते हैं।

सच्चे और अच्छे कर्मयोगियों के लिए भगवान स्वयं जिन्दगी में कई-कई बार अनचाहे संक्रान्ति काल लाकर परिवर्तन के लिए तैयार करता रहता है और हमेशा संक्रान्ति काल के उपरान्त जीवन में सुनहरे सूरज उगने का अहसास होता है।

संक्रान्तिकालजन्य शून्यता भगवान उन कामों के लिए लाता है जिन कामों को जीवात्मा सामान्य दिनों में ठीक ढंग से नहीं कर पाता। यह सुअवसर होता है लेकिन हम लोग ईश्वरीय विधान और ब्रह्माण्ड से पिण्ड तक में सर्वांग परिवर्तन की सनातन वैज्ञानिक व्यवस्थाओं से अनभिज्ञ होने के कारण इस काल में दुःख एवं निराशा का अनुभव कर लिया करते हैं।

इससे भावी सुखद परिवर्तन की गति धीमी होने का अन्देशा भी बना रहता है क्योंकि ईश्वरीय विधान को प्रसन्नतापूर्वक स्वीकार कर लिए जाने पर भगवान जीवात्माओं पर प्रसन्न रहता है और उस अवस्था में परिवर्तन की प्रक्रिया के दौरान बीच-बीच में आ धमकने वाले अवरोधों का खात्मा सूक्ष्म स्तर पर ही होने लगता है और जिन-जिन नकारात्मकताओं का क्षरण करना होता है वे केवल समय सापेक्ष आभासी अनुभव करा कर पलायन कर जाती हैं।

जब हम दुःखी होकर ईश्वरीय परिवर्तन के विधान को अंगीकार करते हैं तब हमारे भीतर का आनंद भाव क्षरित होने लगता है। जहां आनंद का क्षरण होता है वहाँ आत्म और परमात्म भाव का भी ह्रास होने लगता है क्योंकि आनंद और ईश्वर परस्पर पूरक एवं पर्याय ही हैंं।

इस दृष्टि से जीवन के प्रत्येक परिवर्तन को भगवान की कृपा मानकर प्रसन्नतापूर्वक स्वीकारें। यह भी तथ्य है कि जब-जब भी अनिश्चय की स्थितियां बनती हैं उन्हीं अनिश्चितताओं के रास्तों से होकर ही निश्चितता और निश्चिन्तता प्राप्त होती है।

हर अनिश्चय की स्थिति भावी निश्चय का प्रतीक हुआ करती है। भगवान के इस विधान को हम स्वेच्छा से स्वीकार कर लें तो आनंद बहुगुणित और स्थायी भाव वाला हो सकता है अन्यथा परिवर्तन से प्रगति के रास्ते तो खुलेंगे ही, इन्हें कोई रोक नहीं सकता।

जीवन में जब-जब संक्रान्ति काल की शून्यता प्राप्त हो, तब-तब स्वयं को भी प्रकृति व स्थितियों के अनुकूल करते हुए आत्म शून्य अवस्था में ले जाने का प्रयास करें, इससे सब कुछ अपने आप सुव्यवस्थित होने लगता है और संक्रान्ति काल के बाद हमें उत्तरोत्तर बेहतर स्थिति प्राप्त होती है।

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