स्रेहत रक्षा सर्वोपरि

व्यक्ति के सम्पूर्ण जीवन के कई पहलुओं पर संतुलन का निरन्तर बने रहना जरूरी है। यह संतुलन व्यक्तित्व और अपने जीवन भर की कई विषमताओं, असंतुलन और समस्याओं से हमें मुक्त रख सकने में समर्थ है।

संतुलन का अर्थ यही है कि जिस अंग को जितने कर्म या जितने आराम की आवश्यकता हो, वह उसे भरपूर प्राप्त होता रहे तो उसके संचालन की निरन्तरता और कार्यक्षमता, गति आदि को बरकरार रखा जा सकता है।

जिस प्रकार किसी भी मशीन को चलाने और दीर्घकाल तक उपयोगी बनाए रखने के लिए समय-समय पर विश्राम और परिमार्जन, स्नेहन, संवेदन और नवीनीकरण की आवश्यकता होती है उसी प्रकार आदमी को भी निरन्तर अपडेट और ऊर्जित रहने के लिए यह जरूरी है कि उसके काम और आराम में संतुलन बने रहना चाहिए।

दूसरे अर्थों में यह भी जरूरी है कि आदमी के प्रत्येक अंग से काम लेने तथा प्रत्येक अंग को आराम दिए जाने की भी उतनी ही जरूरत पड़ती है। आदमी के पूरे शरीर की संरचना ही इसी प्रकार की है कि उसके सभी अंगों को जरूरी खुराक की आवश्यकता पड़ती है और जब वह पर्याप्त मात्रा में मिलने लगती है तो आदमी हमेशा ऊर्जित और स्वस्थ दिखता तथा रहता है।

इनमें जरा सी भी कहीं कोई कमी आ जाने पर सेहत और मन-मस्तिष्क पर बुरा असर पड़ने लगता है और ऎसे में आदमी की कार्यक्षमता बुरी तरह प्रभावित होती है। आदमी की जिन्दगी का कोई सा पहलू हो, उसके लिए यह जरूरी है कि संतुलन को बनाए रखा जाए।

जब तक यह संतुलन बना रहता है, तब तक आदमी का तन-मन और सेहत संतुलित रहकर पूरे जीवन को मस्ती तथा आनंद प्रदान करने में समर्थ रहता है। जरा सा भी संतुलन गड़बड़ा जाने पर हालात खराब होने लगते हैं।

मन-मस्तिष्क और शरीर के अंग-प्रत्यंगों में उनकी कार्यक्षमता और आवश्यकता के अनुरूप संतुलन का होना नितान्त जरूरी है और इसके लिए यह भी जरूरी है कि हम जीवन में हर क्षण मानसिक एवं शारीरिक संतुलन साम्यता को बनाए रखने के लिए गंभीर रहें और हर परिस्थिति में संतुलन बनाए रखने के लिए प्रयत्नशील रहें।

खा़सकर दिमाग, दिल और शरीर के कामों में संतुलन का होना जरूरी है। आज हम जो बीमारियां, तनाव और मानसिक उद्वेग,उन्माद, बात-बात पर क्रोध आदि देख रहे हैं उनके लिए कोई और जिम्मेदार नहीं है बल्कि हम ही हैं जो इनके लिए उत्तरदायी हैं।

इस असन्तुलन के जो दुष्परिणाम हम भोग रहे हैं उन सभी के लिए भी हम ही जिम्मेदार हैं। इस मामले में दूसरों को दोष देना ठीक नहीं है चाहे वे क्षेत्रीय आबोहवा हो या और कैसी भी परिस्थितियाँ।

जो समय सोने के लिए निर्धारित है और जिस अवधि में प्रत्येक को सोना जरूरी है, उस समय में दूसरे कामों में रुचि लेने से मानसिक और शारीरिक हालत खराब हो जाना स्वाभाविक ही है।

दूसरी ओर आजकल बहुसंख्य लोग परिश्रम ही परिश्रम करते रहते हैं, मानसिक खुराक नहीं लेते, ऎसे लोगों को भी उद्विग्नता होना स्वाभाविक है लेकिन ऎसे मेहनती लोगों का शारीरिक सौष्ठव अपेक्षाकृत बेहतर होता है और ऎसे में इनका परिवेश भी अच्छी आबोहवा वाला हो तो इनके जीवन में रोगों की संभावना कम होती है।

यही कारण है कि ग्रामीण और वनीय परिवेश में रहने वाले, प्रकृति के बीच रहने वाले लोग ज्यादा सेहतमंद होते हैं। इनके लिए शारीरिक और मानसिक समस्याएं बहुधा बहुत न्यून होती हैं और इन समस्याओं को उपेक्षित भी कर दिया जाए तो जिन्दगी में मस्ती बनी रहती है।

पर आजकल सर्वाधिक चिन्ता उन लोगों की सेहत को लेकर है जो घण्टों तक कुर्सियों में धँसे रहकर मानसिक काम या कम्प्यूटर की स्क्रीन पर दिमागी काम करते रहते हैं लेकिन इनके जीवन में हिलने-डुलने, भ्रमण, पैदल चलने या वॉकिंग जैसी किसी गतिविधि का कोई स्थान नहीं हुआ करता। यहाँ तक कि सूरज की धूप भी इनके शरीर का स्पर्श करने को तरसती रहती है।

ऎसे लोगों का दिमाग तो खूब चलने लगता है मगर दिमाग चलाते और दौड़ाते हुए इनका पूरा शरीर थक जाता है। ऎसे लोगोें के दिमाग और शरीर का संतुलन पूरी तरह गड़बड़ा जाता है जो उनकी कद-काठी और बेड़ौल शरीर, मोटे काँच वाले चश्मों आदि से अच्छी तरह जाना जा सकता है।

शरीर के सभी अंग-उपांगों और अवयवों का समन्वय और संतुलन तभी तक बरकरार रहता है जब तक कि इन सभी का समुचित और सुरक्षित उपयोग होता रहे। जरा सा भी व्यतिक्रम अथवा असंतुलन सामने आने पर सीधा असर पडना शुरू होता है मानसिकता पर, और बाद में यही स्थूल रूप ग्रहण करता हुआ अंग विशेषों पर असर डालना आरंभ कर देता है।

और यही कारण है कि आज लोगों का पूरा जिस्म बेड़ौल होता जा रहा है। कहीं पिचकने लगा है और कहीं हद से ज्यादा उभार और उठाव आ रहे हैं। कइयों की तो हालत ऎसी होती जा रही है कि जानवर भी शरमाने लग जाएं। और ईश्वर तो एक बार भी इधर देख ले तो उसे भी आत्मग्लानि का अनुभव हो।

अपनी शारीरिक संरचनाओं का सीधा संबंध मानसिकता और सोच से भी है। मन में विकारों और पापों के रहते हुए इन सभी को शरीर में ही अपने ठिकानों की जरूरत होती है और ऎसे में ये शरीर का विस्तार करते हुए अपनी जगह बना लेते हैं। दिमाग में तो इनके सिर्फ शोर्ट कट ही हुआ करते हैं।

इसलिए बेकार के विचारों और नापाक लक्ष्यों को सूक्ष्म स्तर पर ही समाप्त कर दें ताकि इन्हें स्थूल रूप धारण कर शरीर में जगह तलाशनी नहीं पड़े। जो लोग किसी भी कर्मक्षेत्र में लगे हुए हैं उन्हें चाहिए कि दिमाग और शरीर के कामों में संतुलन निरन्तर बनाए रखेंं।

जो लोग दिमागी काम ज्यादा करते हैं उन्हें चाहिए कि वे शरीर को उतना जरूर हिलाएं-डुलाएं जितना जरूरी है। जितनी देर दिमागी काम करें या कम्प्यूटर पर काम करें, उसका चौथाई समय नहीं तो कम से कम दस-बीस फीसदी समय उन कामों में लगाएं जिनसे शरीर के हर अंग की कसरत हो जाए।

या तो भ्रमण करें अथवा व्यायाम, अथवा कुछ ऎसे काम करें जिससे कि शरीर की समस्त माँसपेशियां और अंगों का संचालन हो सके। इससे शरीरस्थ प्रदूषित गैसों और जकड़न को बाहर निकलने का मौका तो मिलेगा ही, शरीर के लचीलेपन को भी आधार मिलेगा।

इसके लिए रोजाना के काम के घण्टों के हिसाब से शरीर का संचालन निर्धारित करना जरूरी है। अन्यथा एक ही जगह बैठे-बैठे जो लोग दिमाग चलाते रहते हैं या कंप्यूटर चलाते रहते हैं उनके लिए एक समय ऎसा आ ही जाता है जब वे चाहते हुए भी शरीर को हिला नहीं पाते।

इस स्थिति में व्यक्ति के लिए जब जगे तब सवेरा है। दिमाग और शारीरिक परिश्रम का संतुलन बरकरार रखे बिना दवाइयों और जड़ी-बूटियों या किन्ही और उपायों के भरोसे सेहत को बनाए रखने और जीवन को चलाने की सारी बातें बेमानी हैं।

यह संतुलन दिल के लिए भी जरूरी है जिसे संवेदनशीलता के साथ उपयोग में लाएं और दिल को इतना खुला व पारदर्शी रखें कि इसमें कोई ऎसा विचार या रहस्य न हो, जो औरों से छिपाया हुआ हो। हमेशा जो लोग खाली रहते हैं, खुले रहते हैं, वे ही मौज-मस्ती के साथ जीवनयापन का मजा ले पाते हैं। शेष सारे लोग तो हमारी तरह ही जीने के आदी होते जा रहे हैं।

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