मुखिया हैं या दुःखदायी

मुखिया उसे ही कहा जा सकता है जो कि पूरे कुटुम्ब के लिए वफादार, जिम्मेदार और हर गतिविधि के लिए उत्तरदायी हो। उसके लिए परिवार का मंगल और सभी सदस्यों की सर्वतोमुखी अभिवृद्धि का निष्काम भाव सर्वोपरि हो।

हर सदस्य के प्रति निश्छल स्नेह बरसाने वाला मुखिया ही सभी छोटाें-बड़ों की श्रद्धा व आदर-सम्मान का पात्र होता है। मुखिया के सम्पूर्ण जीवन व प्रत्येक कर्म का मूलाधार कुटुम्ब के हितों की रक्षा व प्रत्येक सदस्य को संरक्षण के साथ वैयक्तिक विकास के अवसर मुहैया कराना तथा सामूहिक तरक्की को सुनहरा आकार देना हैै।

जो मुखिया यथोचित सम्मान और यथायोग्य कत्र्तव्य कर्म का निर्वाह करता है उसके प्रति सभी लोग श्रद्धा का भाव रखते हैं और उसकी हर बात को ब्रह्म वाक्य मानकर आत्मसात करते है। मुखिया चाहे घर का हो, संस्थान का हो अथवा अपने क्षेत्र का, यदि उसमें मुखिया होने का गुणधर्म और लक्षण हों तो कोई कारण नहीं कि उसकी बात कोई न सुने या उसकी आज्ञा का पालन करने से परहेज करें।

मुखिया के मौलिक गुणधर्म को जानने वाले लोग हमेशा असली मुखिया की तरह व्यवहार करते हैं और जिन्दगी भर मुखिया भाव में रहकर सभी के प्रति कृपालु और संवेदनशील रहा करते हैं। यही कारण है कि अपने कर्म व व्यक्तित्व की गंध बिखरने वाले गिनती के मुखिया जीते जी भी पूजे जाते हैं और मरने के बाद भी अर्से तक इनकी खूब याद बनी रहती है।

असली मुखिया ही वह है जो अमरत्व को प्राप्त करे व अपने सर्वस्पर्शी स्वभाव, जीवन-माधुर्य व ‘बहुजन हिताय – बहुजन सुखाय‘ की भावना के साथ कालजयी कर्म का आदर्श उपस्थित करे। कीट-पंतगों और झींगुरों की तरह शोर मचाने वाले मुखियाओं  की न तो जीते जी कोई इज्जत करता है न मरने के बाद इनकी कोई पूछ। इस मामले में मुखियों की कई किस्में हैं।

मुखिया जब अपने ही अपने बारे में सोचने लगता है, अपनी ही अपनी करनी पर उतर आता है, अंहकारों से भरा गुब्बारा होकर उड़ने लगता है, दूसरों को हीन, नाकाबिल और त्याज्य समझ बैठता है, तब मुखिया अपने परम्परागत एवं सर्व स्वीकार्य वजूद तथा सम्मान को खो देता है। फिर चाहे वह कितना ही बड़ा और महान मुखिया ही क्यों न हो, कोई उसके प्रतिश्रद्धा नहीं जताता बल्कि रोजाना जी भर कर बद् दुआएं देता है।

ऎसे मुखिया अन्याय व अत्याचार को हथियार बनाने लगते हैं व अपनी मनमानी पर उतर आते हैं। बस यहीं से मुखिया के पराभव व रसातल में जाने के सारे द्वार खुल जाया करते हैं। फिर न नीचे वाले उसकी बात मानते हैं, न ऊपर वाले।

संगी-साथी और साथ काम करने वाले लोग भी समझ जाते हैं कि यह मुखिया नाकारा बोझ बना हुआ है और जितनी जल्दी हो वह स्थानभ्रष्ट हो जाए अथवा राम नाम सत्य हो जाए ताकि माहौल बदले और लोग सुकूनभरी ताजगी हवाओं का सुख पा सकें। खूब सारे मुखियाओं के बारे में लोगों की यही राय होती है जो दबी जुबान में स्वीकारी जाती है। कोई इन्हें अच्छा नहीं कहता। जो मिलता है वह इन्हें दुर्भाग्यशाली, भक्षक और मनहूस ही बताता रहता है।

इस प्रकार के मुखिया अपने आस-पास वालों से लेकर पूरे कुटुम्ब, संस्थान, प्रतिष्ठानों व क्षेत्र भर में लोक निन्दा के पात्र बनते हैं और इनका यश, कीर्ति व पुण्य चाहे कितने ही अधिक हों, बद्दुआओं के दावानल से भस्म हो जाते हैं। इन लोगों को फिर मनुष्य योनि नहीं मिल पाती, ये जंगली खरपतवार या ‘‘ सरिसृपों ’’ के रूप में ही पैदा होते हैं।

हमारे दुर्भाग्य से बहुत लोग ऎसे हो गए हैं जो भले ही हमारे मुखिया या संरक्षक गिने या कहे जाते हों, इनमें मुखिया होने का एक भी लक्षण नज़र नहीं आता। खूब सारे मुखिया इतने अधिक़ संप्रभु हो गए हैं कि अपने आपको अधीश्वर मान बैठे हैं।

इनमें विचित्र किस्मों के मुखिया भी कम नहीं है जो कि आतंकी की तरह अपने कुनबे को ही कबीला मानकर निरंकुश सरदार के रूप में पेश आ रहे हैं। खुद के कुनबे का विध्वंस करने वाले मुखियाओं की भी कमी नही है। इनके रहते हुए बाड़े और परिसरों से लेकर मानवी संसाधन तक पलायन कर गए या खात्मा हो गया।

इन्हीं किस्म के तथाकथित संरक्षकों के लिए कहा जाता है कि कुछ समय और रह जाएं तो ये जिन बाड़ों में हैं उनका नामोनिशान न बचे।  अहंकार, मनोमालिन्य और पापकर्मों से भरे हुए लोगों के पगले जहाँ-जहाँ पड़ते हैं वहाँ-वहाँ सब कुछ बंटाढार होने लगता है, इसके लिए किसी एटम बम या डायनामाईट की कोई आवश्यकता नहीं पड़ती। इनकी मनहूसियत ही सारा का सारा ढहा देने में समर्थ होती है।

जब भी विध्वंस, अन्याय और पक्षपाती जुनून का काला इतिहास लिखा जाएगा, उन मैले मन, कुटिलताओं से भरे व्यवहार और खुराफाती दिमाग वालों, खुदगर्ज और शोषक मुखियाओं के कालिख पुते हुए चेहरे भी नज़र आएंगे ही। आने वाली पीढ़ियाँ भी इन्हें कोसते हुए अश्लील गालियों की बौछारें करती हुई हमें इस बात के लिए दोषी ठहराएंगी कि हम क्यों कुछ नहीं कर पाए।

नरभक्षी बाघ या पैंथर ही नहीं, कोई भी हो सकता है, इस बात को ध्यान में रखें। हमारे दुर्भाग्य से आजकल वे लोग पूजे जा रहे हैं जो अपने महिमामण्डन के लिए वर्तमान का खण्डन करने लगे हैं। तभी सबके मन में एक ही प्रश्न कौंधता रहता है – भगवान ने आखिर क्या समझ कर इन लोगों को इंसानी खेाल और पॉवर दिए होंगे।