हे राम ! राम-राम

हे राम ! हम शर्मिन्दा हैं।

हम कुछ नहीं कर पा रहे हैं।

हम सारे विवश हैं। हमारे हाथ-पाँव बँधे हुए हैं। हमारे मुँह बँधे हुए हैं जब राम की बात आती है। और जहाँ राम नहीं हैं, वहाँ हमारे हाथ लम्बे हैं, पाँव बाहर हैं और खुद फूले हुए गुब्बारों की तरह हम चौड़े-बाजार संकरा वाली स्थिति में हैं।

राम का नाम केवल हमारी औपचारिकताओं वाला तकिया कलाम ही है। इसके सिवा हमेंं राम से कोई मतलब नहीं। बहुत सारे लोग हैं जिनके नाम के आगे, पीछे या बीच में राम  आता है किन्तु यह कोई जरूरी नहीं कि हमारा रामत्व से अंश मात्र का कोई सरोकार हो ही।

हो सकता है काफी सारे लोग अपने नाम में समाए हुए राम को सामने रखकर अच्छे और सच्चे हों लेकिन बहुत से ऎसे भी हैं जिनका राम से दूर-दूर का कोई रिश्ता नहीं। इनमें से काफी हैं जो राम को अपना पूर्वज होना भी स्वीकार नहीं करते।

राम या रामत्व से हमारा कोई रिश्ता भले न  हो लेकिन राम का नाम ही ऎसा है कि जिसके सहारे बड़े-बड़े पशु भी भवसागर को पार करते जा रहे हैं और नर पिशाचों का भी उद्धार हो रहा है। राम नाम से बड़ी-बड़ी चट्टानें तैर गई वैसे  ही साँप-बिच्छुओं से लेकर बड़े-बड़े घडियाल, मगरमच्छ, व्हेल तक तैरते और तरते रहे हैं।

कइयों की तो जिन्दगी ही राम के नाम से वरदान हो गई और कइयों ने राम के आसरे जिन्दगी की शुरूआत की और राम-राम करते हुए सांसारिक भोग-विलास, पद-प्रतिष्ठा और पैसा कमाते हुए राम को प्यारे हो गए।

राम का नाम ही बड़ा चमत्कारिक है। कभी यह समुद्र मंथन साबित हो कर किसी के लिए जहर और किसी के लिए अमृत उगलने लगता है और कभी उन सारी नैयाओं को पार करा देता है जो और किसी के भरोसे हिल-डुल तक नहीं सकती।

राम अब हमारे आचरण में नहीं रहे। जिह्वा तक सीमित होकर रह गए हैं। राम किसी के गले नहीं उतरते, होंठों तक सीमित होकर रह गए। हृदय तक राम के पहुंचने और प्रतिष्ठित होने की तो बातें ही बेमानी हैं।

हमारे आस-पास और साथ वाले खूब सारे ऎसे हैं जो राम-राम जपा करते हैं किन्तु उनकी पूरी जिन्दगी का कोई सा काम रामकाज से सरोकार रखने वाला नहीं। सारे के सारे काम रावणों की तरह ही नहीं बल्कि उनसे भी अधिक आसुरी हैं। और समाज तथा देश का दुर्भाग्य यह कि लोग इन हरामियों को राम का परम भक्त मानकर पूजते और आदर देते रहे हैं जबकि इन राक्षसों का निर्मम संहार होना चाहिए।

राम का नाम ही मर्यादाओं का अनुकरणीय प्रतीक है। मर्यादा पुरुषोत्तम के जीवन से प्रेरणा पाने की बात तो दूर है, हम पुरुषों में उत्तम तक नहीं हो पाए हैं। और हमारी नपुंसकता, कायरता और तटस्थता इतनी अधिक हावी हो गई है कि हमें खुद को ही आश्चर्य होता है कि हम पुरुष कहलाने लायक भी हैं क्या। जिन मर्यादाओं की प्रतिष्ठा प्रभु श्रीराम ने की थी उनमें से एक का पालन करना भी हम नहीं चाहते।

हमें पता है कि राम का नाम लेकर काम निकालने-निकलवाने में जितनी सहजता और सरलता है उतनी राम के जीवन को अंगीकार करने में नहीं। हमने रामत्व की प्रतिष्ठा करने वाली सारी की सारी मर्यादाओं का इस कदर चीर हरण कर डाला है कि ये चिन्दी-चिन्दी हो चुकी हैं।

राम ने कहा था – अभयं सर्वभूतेभ्यो। हम इसके ठीक विपरीत जाकर प्राणियों को भय दिखा रहे हैं। तरह-तरह का भय, हरसंभव भय। हर कोई अपनी धींगामस्ती और दादागिरी चलाने के लिए अपने-अपने अहंकारों के रथों पर सवार होकर दूसरों को डरा-धमका रहा है।

बेचारे लोभी और लालची इंसान के सामने भयग्रस्त होकर जीने के सिवा कोई दूसरा चारा है ही नहीं। सृष्टि में जिस अत्याचार, हिंसा और पापाचार का समूल उन्मूलन करने भगवान श्रीराम का अवतरण हुआ था, आज वे ही स्थितियाँ हमारे सामने हैं। कोई यह बताने की स्थिति में नहीं है कि आखिर कौन सा ऎसा इंसान है जिसे रामभक्त मानकर अनुकरण किया जा सके।

कर्मयेाग और मातृभूमि की रक्षा के लिए हो रहे यज्ञों का विध्वंस करने के लिए जगह-जगह राक्षसों और राक्षसियों का कुनबा  हुड़दंग मचा रहा है। चोर-उचक्के और नाकारा लोग बेईमानी, कमीशनखोरी और भ्रष्टाचार के साथ फल-फूल रहे हैं और ईमानदार तथा कर्मनिष्ठ लोग हाशिये पर बिठाये जा रहे हैं या फिर प्रताड़ित किए जा रहे हैं।

उस जमाने में लंकिनी, शूर्पणखा, मारीच, रावण, कुंभकर्ण,मेघनाद, अहिरावण, कालनेमि आदि सारे एक-एक ही हुआ करते थे। पता नहीं उनकी अस्थियों का विसर्जन जाने-किन-किन नदियों और समुद्रों में हुआ है कि आज सभी जगह इन्हीं की तरह के हजारों-लाखों लोग हैं जो जमाने भर में आसुरी शक्तियों के साथ पैशाचिक माहौल बनाए हुए हैं। कालनेमियों के डेरों ने कोई ऎसा स्थान नहीं छोड़ा है जहाँ उनके अंधविश्वासों और उद्दण्डताओं का जाल न फैला हो। फिर जितने कालनेमि उतने उनके चेले-चेलियों की फौज।

इसी तरह शूर्पणखाएं अब उन सभी से बदला ले रही हैं जो कि उन्मुक्त व्यभिचार और धींगामस्ती में बाधक रहे हैं। इन शूर्पणखाओं का दुस्साहस देखियें कि अब ये अपने हाथों में धारदार छूरे लेकर सज्जनों की नाक और कान काटने के लिए पीछे पड़ी हैं।

जिन राक्षसों के संहार के लिए राम ने अवतार लिया था, आज हम उन्हीं के जैसे ही नहीं, बल्कि उनसे भी अधिक मायावी, हिंसक और खतरनाक राक्षसों और राक्षसियों को पूज रहे हैं, उनके साथ खान-पान, रोटी-बेटी, उठक-बैठक से लेकर शयन-समागम तक के कामों में सहर्ष और श्रद्धापूर्वक जुटे हुए हैं।

हमारी बुनियाद में ही भ्रष्टाचार और अपवित्रता है, हमारे मन-वचन और कर्म तक सभी अशुद्ध हैं। हमारे विचारों में पाखण्ड और व्यवहार में धूर्तता है। ऎसे में हम लोग राम-राम का उच्चारण भी करें तो इससे बड़ा शर्मनाक दुर्भाग्य और कुछ नहीं हो सकता।

तभी तो राम नाम जपना पराया माल अपना, राम तेरी गंगा मैली हो गई … जैसे वाक्यों से भरे गीतों का जनमानस पर आज गहरा प्रभाव पड़ने लगा है। राम के नाम पर राम धरम गायब होता जा रहा है और अधर्म का बोलबाला होता जा रहा है।

हमारे होंठ तो राम-राम करते हैं और बाकी सब कुछ में हराम-हराम की बदबू आती है।  राम का हर क्षण नैष्ठिक और समर्पित कर्मयोग का सशक्त उदाहरण होना चाहिए किन्तु अब आराम और हराम का जमाना आ गया है।

राम नाम लेने का अधिकारी वही है जो प्रभु श्री राम के आदर्श को अपनाएं, उन पर चले और जीवन को धन्य बनाए। उन लम्पटों को राम नाम लेने का कोई हक नहीं जो कि राम की सत्ता या इतिहास को ही स्वीकार न करें, जिनके माँ-बाप का कोई पता नहीं, जो वर्णसंकर प्रजाति के हैं, लूटेरे-डकैत, भ्रष्ट और रिश्वतखोर हैं, झूठे-मक्कार और भ्रमित करने वाले हैं, अधर्माचरण मेंं रत हैं तथा राम की मर्यादाओं के परिपालन में विफल हैं।

ऎसे लोगों के साथ रहने और इनका साथ देने वाले भी रामद्रोही हैं। और जो राम को नहीं मानता, राम की मर्यादाओं को जीवन में उतार नहीं पाता, ऎसा इंसान किसी भी तरह से स्वीकार्य नहीं है चाहे वह कितना ही बड़ा, ज्ञानी-विज्ञानी और विद्वान ही क्यों न हो। जो राम का नहीं, वह हमारे किसी काम का नहीं।

रामनवमी की हार्दिक शुभकामनाएँ ……।

जयश्रीराम।

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