स्वाभिमान और आत्मीयता के पूरक साहित्यकार श्री हरीश आचार्य

स्वाभिमान और आत्मीयता के पूरक साहित्यकार श्री हरीश आचार्य

श्रद्धेय अग्रज भाईश्री हरीश आचार्य जी का हर अन्दाज निराला है।

उनके शब्दों में परमाण्वीय ऊर्जा है, व्यवहार में आत्मीयता का ज्वार उमड़ता है। उनके जीने का अन्दाज ही ऎसा है कि जो कोई उनके सम्पर्क में आता है, सर्वस्पर्शी व्यक्तित्व के ताजगी भरे माधुर्य से अभिभूत हो उठता है।

सबसे बड़ी और अव्वल बात यह है कि वे दूसरे रचनाकारों, मंच संचालकों और कवियों की तरह मुद्रालोभी नहीं हैं बल्कि वे जो कुछ करते हैं वह आत्मीयजनों, समाज और अंचल की रचनात्मकता को बनाए और उत्तरोत्तर बढ़ाये रखने के लिए करते हैं। उनका विश्वास समूहवाद और गिरोहवाद में नहीं है।

मेरा मानना है कि इस तरह के वे अकेले व्यक्तित्व हैं जो कि एकला चालो रे की नीति पर विश्वास करते हुए भी सभी के साथ हैं और सभी लोग उनके साथ रहा करते हैं।  वे जितने कठोर अनुशासनप्रिय हैं उतने ही अधिक माधुर्य से भरे-पूरे और मुक्तमना हैं।

स्वाभिमान उनमें कूट-कूट कर भरा हुआ है इसलिए निम्नतर सोच वाले लोगों के साथ न वे कोई समझौता करते हैं, न ही कारोबारी गणित बिठाते हैं।

सचमुच में आचार्य कहलाना और मनवाना अलग बात है और आचार्य की तरह स्वाभिमानी, मेधावी और नेतृत्वकर्ता होना, अपनी धारदार अभिव्यक्ति से लोहा मनवा लेना और अन्यतम व्यक्तित्व की छाप छोड़ते हुए अपने शाही अन्दाज का दिग्दर्शन कराना अलग बात।

तभी तो उनके प्रयोगधर्मा व्यक्तित्व के आगे कायल होने वाले लोग सदैव नतमस्तक रहा करते हैं और शेष सारे गंभीर घायलावस्था को भोगने को विवश रहा करते हैं।