खुश हैं मदारी, मदमस्त हैं जमूरे

जीवन में न कोई अनुकूलताएं होती हैं, न प्रतिकूलताएं, न कुछ अच्छा, न बुरा। जो एक के लिए अच्छा हो वह दूसरे के लिए बुरा मान लिया जाता है, इसी प्रकार जो एक के लिए प्रतिकूल होता है वह दूसरे के लिए स्वाभाविक रूप से अनुकूल मान लिया जाता है।

असल में मनुष्य का पूरा जीवन परिवर्तनों की भेंट चढ़ा हुआ होता है जहाँ न तो सर्वथा अनुकूल, अच्छा और सुकूनदायी है, न ही सर्वथा दुःखद, प्रतिकूल और मायूसी देने वाला। यह अपने दिमाग और मन की खुराफात और वहम ही है कि यह अच्छा और यह बुरा।

जब हम अच्छे और बुरे के पीछे की कहानी और इन सम-विषम हालातों की पृष्ठभूमि का असली ज्ञान और रहस्य समझ लेते हैं तब हम इन दोनों ही लौकिक स्थितियों से ऊपर उठकर अलौकिक अवस्था को पा लेते हैं जहाँ सुख और दुःख दोनों से परे वह अवस्था है जिसे आत्म आनंद कहा जाता है।

जो भी एक बार इस भीतरी आनंद का अनुभव कर लेता है उसके लिए जगत में सब कुछ समत्व से भरा हो उठता है। लेकिन होनी चाहिए उस अनुपात की श्रद्धा, ईश्वरीय विधान और प्रारब्ध के प्रति आस्था तथा द्रष्टा भाव।

फिर सब कुछ बिना किसी सुख-दुःख का आभास कराता हुआ आनंद भाव की प्राप्ति कराता रहता है और यह पता भी नहीं चलता कि हँसते-हँसते कब हमारे तमाम प्रकार के प्रारब्ध क्षय को प्राप्त हो गए।

प्रारब्ध क्षय की यह स्थिति भगवान से साक्षात्कार तो कराती ही है, उस परम आनंद को भी प्राप्त कराती है जो भगवान के अनन्य भक्त या लोक मंगलकारी कर्मयोगी को प्राप्त होता है।

सामान्य सांसारिक व्यापार को ही सर्वस्व मानने वाले, राग-द्वेष में धँसे तथा मायावी संबंधों में फंसे हुए लोगों के लिए यह असंभव है किन्तु जो लोग मोक्षगामी मार्ग को अपना चुके हैं अथवा संसार से ऊपर उठने के लिए कृत संकल्पित हैं उनके लिए यह स्थिति प्राप्त करना कोई अधिक दुष्कर या श्रम साध्य नहीं है।

संसार एक तमाशा है, इस सत्य को दिल से स्वीकार कर लिया जाए तो फिर हमारे सामने आने वाली सभी प्रकार की समस्याएं मनोरंजन का स्वरूप प्राप्त कर लेती हैं जहाँ किसी भी सांसारिक का कोई सा पीड़ादायक, प्रतिष्ठाहानि करने वाला या प्रताड़ित करने वाला कम हो, वह अपने लिए मनोरंजन का सहज-सुलभ माध्यम हो जाता है और नीच, नालायक और नुगरे सांसारिक या तो मदारी और जमूरों की शक्ल में नज़र आते हैं या फिर किसी पशु के रूप में दिखाई देते हुए अपना मुफतिया मनोरंजन करते हुए प्रतीत होते हैं।

आजकल ऎसे बहुत सारे नौटंकीबाज, तमाशा दिखाने वाले, मदारी और जमूरे हर जगह दिखाई देते हैं। इनके साथ ही तमाशबीनों और उछलकूद करने वाले बंदर-भालू तथा किसी न किसी आका की बीन पर फन उठाकर नाचने वाले सर्पों की ढेर सारी प्रजातियाँ पूरी बेशर्मी के साथ बदमिजाज और बदतमीज होकर नंगा नाच दिखा रहे हैं।

न किस्मों की कोई कमी है, न डेरों की। सब एक दूसरे को तमाशा दिखाते हुए प्रसन्न हुए जा रहे हैं। एक-दूसरे को उल्लू बनाने और भरमाते हुए आगे बढ़ जाने का तिलस्म सब तरफ छाता जा रहा है।

कोई किसी को खुश करने के फेर मेें लगा हुआ है, कोई किसी को। खुदगर्जों और ऎय्यारों के साथ ऎय्याशों की पूरी की पूरी जमातें भिड़ी हुई हैं किसी न किसी को खुश करने में।

अपने आपको ऊँचा उठाने और अपने कद को सर्वोपरि स्थापित करने की फितरत में लोग इस कदर नीचे गिरते जा रहे हैं कि पातालवासी भी उन पर हँसने लगे हैं।

कोई खुद गिर रहा है, कोई दूसरों को गिरा रहा है। लगता है कि जैसे पाताल कूओं में धकेलने की प्रतिस्पर्धा ही चल रही हो।

स्वार्थ के महा अंधकार और अपने नम्बर बढ़ाने के तिलस्मी कोहरे के बीच सबसे ज्यादा हैरान-परेशान हैं तो वे सज्जन, सच्चे और अच्छे लोग, जिन्हें न जमाने की कूटनैतिक चालें आती हैं, न धूर्तता का कोई कतरा जानते हैं।

बेचारे सीधे-साधे लोग अपने काम से काम रखते हैं और जमाने भर की भलाई करते हुए आगे चलते रहते हैं। पर इन पर भी पहरा बिठाने और तंग करने वाले लोगों की स्पीड़ब्रेकरी जमातें बेकरी की दुकानों और लारियों की तरह सरे राह अड़ी हुई दिखती हैं।

प्रदूषण केवल जमीन, हवा, पानी और आसमान में ही नहीं है, आदमी की नस्ल भी लगता है जबर्दस्त प्रदूषित हो गई है। तभी तो आदमियों की बस्तियों में आदमी की बजाय कुत्ते, कमीने और जानवर दिखने लगे हैं जिनका काम ही लोगों को किसी न किसी बहाने त्रस्त और प्रताड़ित करना रह गया है।

धींगामस्ती और धौंस जमाते हुए खौफ पैदा करने वाले और लूटने वाले दस्युओं को भी पीछे छोड़ देने वाले ऎसे-ऎसे नरपिशाच और भूतनियाँ नज़र आती हैं जिन्हें देख कर लगता है कि कहीं जंगलराज तो नहीं आ गया।

और ये ही लोग हैं जो हर तरह के प्रवाह को रोकने की कोशिश करते हैं, मानवीय मूल्यों और परंपराओं का गला घोंट कर खुश होते हैं और सज्जनों पर कहर बरपाते हैं।

अपने माँ-बाप, परिवार और क्षेत्र से इन्हें न कभी प्यार मिला, न कोई संस्कार। इसका खामियाजा दुनिया भुगत रही है।

वसुधैव कुटुम्बकम्, सामाजिक समरसता, अहिंसा परमो धर्म, नर सेवा-नारायण सेवा से लेकर मातृभूमि की सेवा के नारे जब भी आसमान में गूंजते हैं, लगता है हम लोगों को चिढ़ाया जा रहा है। क्योंकि जब तक धरती पर असुरों का बोलबाला  रहेगा तब तक समाज, देश, सेवा और परोपकार की सारे बातें बेमानी हैं।