आनंद और सुकून देता है  – गाय-बगुला संबंध

आनंद और सुकून देता है – गाय-बगुला संबंध

गाय-भैंसों के गुह्य स्थानों व थनों के आस-पास चिपके रहने वाले चींचड़ें खून चूसते रहते हैं।

खुद गाय-भैंस लाख कोशिश कर लें लेकिन चींचड़े हटा नहीं पाती।

चींचड़े जबर्दस्त और गहरी पकड़ के साथ चिपके रहते हैं।

इस स्थिति में गाय-भैंसों के लिए कौअे और बगुले सबसे अधिक प्रिय हो जाते हैं क्योंकि ये अपनी लम्बी और तीखी चोंच से चींचड़ों को गृह्य मर्मस्थलों और थनों के आस-पास से खींचकर बाहर निकाल देते हैं और जोर से दबाते हुए खा जाते हैं।

गाय-भैंस को कौओं और बगुलों के इस कारनामे से चींचड़ों से मुक्ति के साथ ही गुदगुदी का मजेदार सुख-सुकून मिलता है।

पट-पट की आवाज से हर्षायी गाय-भैंसें बगुलों और कौओं पर अपनी कृपा और आशीर्वाद बरसाती रहती हैं।

उधर कौओं व बगुलों को चींचड़ों का स्वाद मिल जाता है और वह भी गाय-भैंसों की बदौलत।

इसी तरह गायों-भैंसों को भी आनंद आता है और बगुलों व कौओं को भी।

कौओं और बगुलों का दुस्साहस कहें या प्रेम इतना अधिक बढ़ जाता है कि उन्हें अपने आराम और फुदकने का आनंद पाने के लिए गाय-भैंसों की पूरी की पूरी देह उपलब्ध रहती है।

और उधर गाय-भैंसों में भी इस बात का अहंकार बना रहता है कि आसमान के परिन्दों को वे जमीन के साथ ही मुफ्त में परिभ्रमण का मौका दे रही हैं।

परस्पर आनंद पाने वाले इसी रिश्ते को गाय-बगुला संबंध कहा जाता है।

दुनिया में खूब सारे स्त्री-पुरुष ऎसे देखने को मिल जाएंगे जो इसी तरह के रिश्तों में रमे हुए एक-दूसरे को उपकृत भी कर रहे हैं, अभयदान भी दे रहे हैं और पारस्परिक आनंद प्राप्ति का मजा भी लूट रहे हैं।

आजकल लोक जीवन में भी सब तरफ गाय-भैंसों के साथ ही बगुलों और कौओं को गाय-बगुला संबंध निभाते देखा जा सकता है।

गुदगुदाहट को उतावली गाय-भैंसें भी खूब हैं और मुफतिया फास्ट फूड़ के शौकीन बगुले और कौअे भी।

इसे ही कहा जा सकता है -परस्परोपग्रहोपजीवानाम् ।

और ये संबंध मरने के बाद भी बना रहता है। गाय-भैंसों की मौत हो जाने के बाद भी ये कौअे और बगुले इनका साथ नहीं छोड़ते। इनकी बोटी-बोटी ये जब तक खा नहीं लेते तब तक इन्हें संतोष नहीं होता। यानि कि उत्तर क्रिया तक की गारंटी है इस रिश्ते में। अब तो कहना ही पड़ेगा – गाय-बगुला जिन्दाबाद।