अर्थहीन हैं संदेशों की ओलावृष्टि

अर्थहीन हैं संदेशों की ओलावृष्टि

कोई सा नया दिन, उत्सव, पर्व और त्योहार हो या फिर शुभाशुभ प्रसंगों के साल भर बने रहने वाले अवसरों की भरमार।  चाहे हम किसी को जानते हों या नहीं, या और कोई हमें पहचानता तक न हो, हमारा दूर-दूर तक किसी से कोई संबंध न हो, तब भी लाखों लोगों के लिए रोजाना का एक ही काम रह गया है –  तरह-तरह के संदेशों की ओलावृष्टि करते रहना।

हम सारे लोग समय नहीं होने का रोना रोते रहते हैं और इसी रुदाली परंपरा या आदत का सहारा लेकर कभी कामचोरी और कभी कामटालू मनोवृत्ति का नग्न और बेशर्म परिचय देते हैं लेकिन संदेशों के आयात-निर्यात और बारिश करने के मामले में हम कभी यह शिकायत नहीं करते कि समय नहीं मिलता।

अपने कार्यस्थलों पर देर से पहुंचने, गप्पे हाँकते रहने या चाय-नाश्ते के लिए मुर्गे तलाशने वाले और जल्दी भाग आने वाले लोगों के पास भी संदेशों के आदान-प्रदान के लिए भरपूर समय रहता है। बात चाहे व्हाट्सएप की हो या फेसबुक की, या फिर कोई से सोशल मीडिया माध्यम हों अथवा मुफ्त में होने वाले एसएमएस ही क्यों न हों। हर वार-त्योहार और तमाम प्रकार के प्रसंगों पर हमेशा मरी और अधमरी रहने वाली हमारी मानवीय संवेदनाएं और संबंधों का खो चुका माधुर्य फिर-फिर जीवित होने लगता है।

संदेशों के आदान-प्रदान के मामले में हम लोगों ने दुनिया को पछाड़ कर रख दिया है। लोगों का अधिकांश समय पराये संदेशों को लाईक, शेयर और फोरवर्ड करने में ही गुजरने लगा है। नकलची बन्दर – भालुओं से भी एक पायदान आगे बढ़ चुके हम लोग नकल या नकल में अक्कल लगाने की बजाय बिना कुछ किए-समझे फारवर्ड करने के इतने आदी हो गए हैं कि सामने वालों को यही भ्रम रहता है कि हम कितने संवेदनशील, विद्वान और अग्रिम पंक्ति पर बने रहने वाले हैं।

बिना अक्ल लगाए लाईक, शेयर और फोरवर्ड करने की महामारी से हम इतने अधिक ग्रस्त हो गए हैं कि हमारी अपनी बुद्धि नाकारा, अनुपयोगी औरा कुण्ठित होती जा रही है और हम लोग अपनी असलियत, मौलिकता और ईमानदारी खोते जा रहे हैं।

शर्मनाक दुर्भाग्य यह भी है कि हम जैसा आयात कर डालते हैं वैसा का वैसा ही निर्यात करते हुए बहुगुणित अवस्था में लोगों तक पहुंचाते रहते हैं।  मानवीय संवेदनाओं का इससे बड़ा मजाक और कुछ नहीं हो सकता क्योंकि हम लोग जो कुछ कर रहे हैं वह केवल औपचारिकता से भरा है और इसमें भी अपना कुछ नहीं।

जहाँ सब कुछ मुफ्त का उपलब्ध हो, वहाँ दिमाग और पैसा क्यों लगाएं। यही तो इंसानी चतुराई का कमाल है जिसे हम सभी अपना रहे हैं। जाने कहाँ-कहाँ से चुराए संदेशों, फोटो और उपदेशों को हम घटिया दर्जे के कबाड़ियों की तरह जमा करते जा रहे हैं और इसे बिना किसी हिचक के अपने से संबंधित तमाम ग्रुप्स और लोगों को ऎसे परोस रहे हैं जैसे कि किसी बड़े मन्दिर में हर आने वाले को मुफ्त का भरपूर प्रसाद बाँट रहे हों या फिर पराये भण्डारे अथवा अन्नक्षेत्र में दिखावे या फोटो खिंचवाने भर के लिए पूरी उदारता के साथ परोसगारी का धर्म निभा रहे हों।

आयात-निर्यात की दलाली मेे हमें जितना मजा आता है उतना और किसी में नहीं। घर-गृहस्थी और कर्तव्य कर्म निभाने से भी कहीं अधिक आनंद हमें संदेशों के आयात-निर्यात में आता है। बात चाहे नव वर्ष की हो या बीते वर्ष को विदाई वाले दिन की, होली-दीवाली हो या राखी-दशहरा या और कोई से पर्व-अवसर या तीज-त्योहार की।

अब भले ही मुलाकात न हो, आना-जाना बंद रहे, फोन कर हालचाल जानने में जी कतराता रहे। मगर जिन्दों को शुभकामनाएं और मुर्दों के लिए शोक-संवेदना और श्रद्धान्जलियों की बारिश का अनथक और नॉन स्टॉप सिलसिला लगता है अब कभी रुकने वाला नहीं।

कभी लगता है संदेशों की बारिश हो रही है, कभी ओलावृष्टि, और कभी-कभी तो ऎसा प्रतीत होता है कि जैसे कितने सारे बादल एक साथ ही फट गए हों। एक तरफ संदेशों में इतनी आत्मीयता, प्रेम-माधुर्य, श्रद्धा, औदार्य और मानवीय संवेदनाओं का उमड़ता, हिलोरें लेता ज्वार और दूसरी ओर धरातल की ओर देखें तब…। धर्म और उपदेशों की भी धूंध इतनी सारी कि लगता है जैसे सतयुग हो ही गया है।

संदेशों के आयात-निर्यात का यह सारा खेल यदि मुफत का न होकर इसके लिए भी पैसे लगते तो शायद हालात ही कुछ दूसरे होते। जो जहाँ मुफत का उपलब्ध है उसका भरपूर फायदा उठाते हुए हम सभी लोग यही कर रहे हैं।

भला हो जियो का जिसकी खातिर हमारा यह धंधा परवान पर है और अधिकांश लोग इसी एकसूत्री एजेण्डे में भिड़े हुए हैं। मुँह नीचे किए घुसे हुए हैं संदेशों, फोटो, वीडियो क्लिप्स और अपडेट्स में। संदेशों में इतना सारा अपार माधुर्य रस बरस रहा है फिर भी परिवेश में कलह, संघर्ष और अपराधों का माहौल क्यों?  मृतकों के नाम पर शोक-संवेदना और श्रद्धान्जलियों की बारिश हो रही है, बावजूद इसके भूत-पर््रेतों और अतृप्त आत्माओं का मोक्ष क्यों नहीं हो पा रहा है, पितरों की ओर से कालसर्प दोष का कहर क्यों?

आभासी दुनिया और धरातल में जमीन-आसमान का अन्तर है। और हम हैं कि आभासी दुनिया को ही आदर्श और वास्तविक मान बैठे हैं। ऎसे हालातों में हमारे उन संदेशों का कोई अर्थ नहीं है जिनमें अपने स्वयं के शब्द, भाव और अर्थ न हों।

जो पराया है, जिसकी नकल की गई है उसमें आत्मा नहीं होती, केवल दिखावा ही दिखावा होता है।  और हम सब आजकल यही कर रहे हैं। वास्तविकता से दूर भाग रहे हैं क्योंकि धरातलीय कर्म और व्यवहार में त्याग और सेवा की जरूरत होती है। और संदेशों की बारिश में न धेला खर्च होता है और न ही अपना दिमाग लगाना पड़ता है।

कितना अच्छा हो कि हम यथार्थ के धरातल पर उतरें और मौलिकता एवं दिली भावनाओं का ख्याल रखें। ऎसा होने पर ही हमारे संदेशों का कोई प्रभाव पड़ सकता है, अन्यथा हमारे सारे के सारे संदेश अर्थहीन, भावशून्य औरा औचारिकता भरे ही रहने वाले हैं। संदेश भेजने और पाने वाले सब इसे अच्छी तरह समझ रहे हैं।

हम सारे लोग एक-दूसरे को प्रेमपूर्वक सहर्ष उल्लू बनाते हुए टाईमपास कर रहे हैं और यही हमारे साल भर के तमाम तीज-त्योहारों, पर्व-अवसरों का वह संदेश है जो हमेशा कालजयी रहने वाला है। सभी को आंग्ल नव वर्ष की हार्दिक शुभकामनाएँ ….।

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