ये गुरु हैं या ग्वाले !

जब-जब भी गुरुपूर्णिमा के दिन आते हैं हर तरफ गुरुओं और गुरु महिमा का शोर शुरू हो जाता है। कुछ साल पहले तक गुरुओं तक पहुंचने के लिए जिज्ञासुओं को बहुत मेहनत करनी होती थी, अपने आप को शुद्ध-बुद्ध और निरहंकारी साबित करने के लिए खूब पापड़ बेलने पड़ते थे, खूब सेवा करनी की आवश्यकता होती थी।

और उसके बाद ही गुरु अपना शिष्य बनाते थे। यह भी जरूरी नहीं कि सारे के सारे शिष्यता के पात्र मान ही लिये जाएं। बहुत से लोग शिष्य होने की कसौटी पर खरे नहीं उतर पाते थे। इन्हें शिष्यता पाने लायक बनने के लिए और अधिक समय की आवश्यकता होती थी या दूसरा रास्ता था पलायन का।

कई-कई बार तो जिज्ञासुओं की हरकतों और व्यवहार को देखकर गुरु खुद इन्हें अपने डेरों से भगा दिया करते थे चाहे कोई कितना ही प्रतिष्ठित और पैसे वाला क्यों न हो। तभी उस समय गुरु की महिमा थी और शिष्य भी खरे सोने की तरह तपकर समाज और राष्ट्र के लिए उपयोगी बनकर जिन्दगी भर ऎसे रचनात्मक और कल्याणकारी काम किया करते थे कि जिससे गुरु को भी गौरव प्राप्त होता था और शिष्यों को अपार यश।

अब तो गुरुओं के लिए शिष्यों की भीड़ बढ़ाने का संकट हो गया है। कुछ सच्चे, अच्छे और वास्तविक गुरुओं को छोड़ दिया जाए तो शेष गुरुओं का सारा ध्यान सांसारिकता में रमने लगा है और सभी यह चाहते हैं कि संख्या बल के हिसाब से वे दूसरे सारे गुरुओं से अव्वल रहें ताकि लोक मान्यता में पीछे नहीं रहें।

पहले गुरु के सामथ्र्य और दिव्यता को देखकर लोग आकर्षित होते थे। अब शिष्यों की भीड़ को देखकर गुरु महिमा का अनुमान लगाया जाता है। आजकल यों भी संख्या बल का जमाना है इसलिए गुरुओं ने भी ‘संघे शक्ति कलौयुगे’ की तर्ज पर भीड़ बढ़ाओ अभियान को जिन्दगी का सबसे बड़ा ध्येय बना रखा है।

अब गुरुओं का आभामण्डल इतना अधिक आकर्षक नहीं रहा कि लोगों की भीड़ उनकी ओर खिंची चली आए और वे अपनी कण्ठी पहनाकर उन्हें शिष्य के रूप में इस कदर रूपान्तरित कर दें कि जिन्दगी भर वे उनके शिष्य बने रहें।

इसलिए शिष्यों के आकर्षण और भीड़ बढ़ाने के लिए अब बड़े-बड़े प्रचार अभियानों का सहारा लिया जाने लगा है जिससे साफ संदेश यही जाता है कि गुरुओं को अब शिष्यों की तलाश बढ़ गई है।

गुरु पूर्णिमा शिष्यों भी भीड़ बढ़ाने का महापर्व ही होकर रह गया है। अब गुरुओं के सामने कई संकट हैं। पुराने शिष्यों को अपने बाड़े में बनाए रखना भी अब इन गुरुओं के लिए चुनौती भरा काम हो गया है। कारण यह कि बहुसंख्य लोगों का एक-दो गुरुओं पर भरोसा नहीं रहा। वे या तो अधिक से अधिक गुरु बनाने लगे हैं या बदलने।

गुरुओं द्वारा इसके लिए पुराने शिष्यों और अपने अन्तरंग सहयोगियों की सेवाओं पर जोर दिया जाने लगा है। इस मण्डली का यही काम है कि शिष्यों को गुरु महिमा के चमत्कारों भरी कहानियां और मनगढ़ंत उदारहण सुनाते रहें, गुरु को ईश्वर के बराबर ही नहीं बल्कि उनसे भी दो आसमान ऊपर दिखा कर इस प्रकार पेश करें कि आम जन में गुरु को महान सिद्ध, तांत्रिक-मांत्रिक और चमत्कारिक स्वरूप मेंं पेश किया जा सके।

गुरु के नाम पर पुराने उद्धरणों, प्राचीन गुरुकुलों, ऋषि-मुनियों और गुरुओं की कहानियां सुना-सुना कर गुरु-महिमा के मोह पाश में जकड़ने के लिए आजकल बहुत सारे माध्यम हैं जिनसे आम आस्थावान को चाहे जितना घुमा-फिरा कर अपने बाड़े में नज़रबंद किया जा सकता है।

धर्म और गुरु के नाम पर अपनी आस्थाओं का सागर न्यौछावर करने वाले इन भोले-भाले धार्मिक लोगों को कौन समझाए कि प्राचीनकालीन गुरुओं ने कभी ऎसा-वैसा कुछ नहीं किया जैसा आजकल के गुरु कर रहे हैं।

प्राचीन गुरुओं ने कभी अपने को इतना अधिक पूजवाया या प्रचारित नहीं किया जैसा आजकल हो रहा है। और तो और प्राचीनकाल के हर गुरु ने धर्म, सत्य, न्याय, अहिंसा, निष्काम सेवा, परोपकार, सदाचार, अपरिग्रह, औदार्य आदि की ही शिक्षा दी और उसी इंसान को शिष्य रूप में स्वीकार किया जिनमें ये गुण विद्यमान थे, जिनमें इनका अभाव था उन्हें डाँट-फटकार कर भगा भी दिया और तिरस्कृत भी किया।

पहले शिष्य बनना अत्यन्त कठिन था। आजकल सब कुछ आसान हो गया है। कोई किसी का भी शिष्य बन सकता है चाहे शिष्य और गुरु दोनों में से कोई कैसा भी हो।  अब किसी गुरु में इतना सामथ्र्य रहा ही नहीं कि वह शिष्य को किसी पात्रता के दायरे में बांध कर दिखा सके, शिष्यों में सुधार ला सके और शिष्यों को अपने अनुरूप बना सके।  जिस दिन आज के गुरु ऎसा करने लग जाएंगे उस दिन शिष्य-गुरु का गठजोड़ खत्म हो जाएगा क्योंकि दोनों को अच्छी तरह पता होता है कि कितने पानी में हैं।

बहुत से गुरु आज भी संसार में हैं जो सिद्ध योगी, परमहंस और त्रिकालज्ञ होने के साथ ही तमाम प्रकार की ईश्वरीय शक्तियों से युक्त हैं लेकिन उनके लिए ईश्वर सर्वोपरि है न कि वे लोग जो शिष्य होने की पात्रता ही नहीं रखते। इनके दर्शन की पात्रता भी हम सामान्य लोगों में नहीं है।

आजकल के गुरुओं के पास सब तरह के शिष्यों की मण्डली देखने को मिल जाएगी। इनमें राजनेताओं, अफसरों, अपराधियों, भ्रष्टाचारियों, रिश्वतखोरों, और काले धन से पूंजीपति बने लोगों तक के समूह शामिल हैं। कई गुरु ऎसे हैं जिनके लिए भगवान से अधिक पूज्य, सम्माननीय और आदरणीय वे लोग हैं जो सांसारिक भोग-विलास और उन्मुक्त आनंद में रमे हुए हैं, किसी न किसी बड़े ओहदे को धन्य कर रहे हैं या वैभवशाली।

एक समय था जब राजा-महाराजा ऋषि-मुनियों के आश्रम में पहुंच कर धन्य होते थे। एक जमाना यह आ गया है कि हमारे बहुत से गुरु बड़े कहे जाने वाले लोगों का पावन सान्निध्य पाकर खुश होते हैं और उन्हें लगता है कि साक्षात ईश्वर ही उनका अपना हो गया है। कई गुरुओं पर बड़े लोगों का खासमखास होने का ठप्पा भी लगता रहता है।

सच्चा गुरु वो है जो अपने पास आने वाले को काईनहाउसी चौपायों की तरह बांध कर न रखे बल्कि भगवान और सदाचार का रास्ता दिखाये। पर ऎसा हो नहीं रहा। आजकल गुरु अपने आपको भगवान से भी ऊपर मानकर देख रहे हैं।

‘गुरु गोविन्द दोऊ खड़े काके लागूं पाय’ की उक्ति को भुनाने में माहिर गुरुओं ने अपने आप को ईश्वर से भी ऊँचा मान लिया है। यह बात आजकल के गुरु नहीं कह सकते क्योंकि उनमें वो योग्यता या पात्रता नहीं है जो पुराने जमाने के गुरुओं के पास हुआ करती थी।

आज का गुरु सांसारिक से भी कहीं आगे निकल गया है, उसे न सादगी, सदाचार और शुचिता से सरोकार है, न भगवान से। उसे अपनी ही अपनी प्रतिष्ठा, विलासितापूर्ण जिन्दगी और अनाप-शनाप चलाचल सम्पत्ति से मतलब है।

सच्चा गुरु हो उसे मानें, आदर दें लेकिन जो ग्वालों के रूप में अपने पास बांध रखकर भगवान से दूर करते हैं, वे हमारे भी शत्रु हैं और धर्म के भी। लगता है कि भगवान को कल्कि अवतार इन्हीं के लिए लेना पड़ेगा। बोलो अपने-अपने भूतकालीन, वर्तमान और भविष्य में होने वाले गुरुओं की जय।

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