बढ़ता जा रहा है दुर्जनों का कुनबा

संसार भर का परम सत्य है कि सज्जनों में पारस्परिक मैत्री का अक्सर अभाव रहता है जबकि दुर्जनों में मैत्री जल्दी भी होती है और प्रगाढ़ भी रहती है।

इसके मूल में अपेक्षा और निरपेक्षता ही सबसे बड़ा कारक है। सज्जनों की समस्या यह है कि वे अपनी सज्जनता और ईमानदारी के मौलिक गुणों से गहरा नाता बनाए रखने के लिए सज्जनों की ही तलाश में लगे रहते हैं लेकिन दुर्जन उनकी जिन्दगी में किसी न किसी बहाने आते ही रहते हैं। यह उनके लिए परीक्षा और चुनौती दोनों है।

एक सज्जन दूसरे के लिए काम आने पर सौ बार सोचता है कि इसका समाज और जीवन पर क्या फर्क पड़ेगा। लोग उसके बारे में क्या कहेंगे-सोचेंगे। सज्जन हमेशा अच्छे लोगों को सहयोग करने में हिचकता है, फिसड्डी रहता है और हमेशा यही प्रयास करता रहता है कि वह तटस्थ बना रहे, किसी पचड़े में न पड़े, चाहे वह उसके फर्ज की श्रेणी में ही शामिल क्यों न हो।

दूसरी ओर जहाँ किसी एक को किसी दूसरे से कोई न कोई अपेक्षा या काम होगा अथवा भविष्य में काम होने की संभावना होंगी, वहाँ दोनों के बीच स्वार्थ का मजबूत सेतु बना ही रहता है। दोनों ही पक्ष इन संबंधों को निरन्तर बनाए रखने के लिए सायास गंभीर रहते हैं।

इसके पीछे दो कारण हैं। एक तो परस्पर स्वार्थ और दूसरा भय। भय का मूल कारण यह होता है कि स्वार्थी लोग स्वार्थ को पूरा करने, कामों को करने-कराने तथा आगे बढ़ने के लिए निरन्तर प्रयत्नशील रहते हैं। यहां तक कि ये लोग दिन-रात चार सौ बीसी या निन्यानवे के फेर में रहते हैं।

 और इस स्वार्थपूर्ति की पूरी यात्रा में जायज-नाजायज कर्मों, संबंधों एवं विचारों की भूमिका अहम होती है। इसी प्रकार इन लोगों के बुरे, क्रूर, अधार्मिक और अमर्यादित स्वभाव, इनकी नापाक हरकतों और इनके नंगे पन से सभी पक्ष वाकिफ होते हैं। जहाँ सारे भ्रष्ट, लम्पट और दुष्ट हों, वहाँ कौन किसे रोके-टोके और उपदेश दे। इसलिए इन सभी की मजबूरी है कि एक-दूसरे के अपराधों और कुकृत्यों में सहयोग देते हुए परस्पर संरक्षण और आश्रय दें तथा साहचर्य बनाए रखते हुए अपने स्वार्थों को पूरे करते रहें।

ये धूर्त, मक्कार और अपराधी लोग पोल खुल जाने और गड़बड़ियां सार्वजनिक हो जाने के भय से एक-दूसरे से मजबूती के साथ बंधे रहकर अंधे और लूले वाली कहावत को चरितार्थ करते रहते हैं। ये लोग मतभेद और मनभेद दोनों हो जाने के बावजूद एक-दूसरे को कुछ सुनाने या सार्वजनिक तौर पर कुछ बुराई करने से परहेज रखते हैं और चुप रहने के आदी हो जाते हैं।

इस तरह दुर्जनों के बीच घनिष्ठ संबंधों के पीछे स्वार्थ, अपेक्षा और बुरे कर्म ही जिम्मेदार होते हैं।  और जो लोग खोटे करम करते हैं उन्हें इसे छिपाने और हमेशा दबाए रखने के लिए अपनी ही तरह के दुर्जनों का संरक्षण, सान्निध्य और सहयोग जिंदगी भर बनाए रखना सर्वोच्च प्राथमिकता बना रहता है।

मरते दम तक उनके द्वारा ऎसा स्वभाव बनाए रखना इनके पूरे जीवन की वह सबसे बड़ी मजबूरी होता है जिसे यह न बता सकते हैं, न इससे पिण्ड छुड़ा सकते हैं क्योंकि बात पोल खुल जाने की और स्वार्थ पूर्ति में अवरोध आ जाने की है। इनकी स्थिति साँप-छछून्दर से भी कहीं अधिक खराब हो जाती है।

यही वजह है कि दुनिया के तमाम  दुर्जनों को सबसे बड़ी चिन्ता अपनी छवि बनाए रखने की होती है और इस पर वे सर्वाधिक समय, धन और परिश्रम का व्यय करते हैं। आमतौर पर साफ-सुथरे, बेदाग और सज्जन लोग बाहरी छवि निर्माण के प्रति बेफिक्र होते हैं क्योंकि वे अंदर-बाहर एक ही तरह के होते हैं इसलिए जैसे हैं वैसे दिखते हैं और उनके व्यक्तित्व की सुगंध मौलिकता से भरपूर एवं आकर्षण बिखेरने वाली होती है।

समस्या तो उन लोगों की है जो मुखौटों और दोहरे-तिहरे व्यक्तित्व को ढोए रहते हुए अपने आपको बहुरुपियों की तरह पेश करते हैं। इनकी वाणी, व्यवहार और चरित्र के सारे पहलुओं में विरोधाभासी स्थितियां देखने को मिलती हैं।

खुले रूप में कहा जाए तो ऎसे लोग रंगमंचीय खलनायकों, विदूषकों और मसखरों की तरह अभिनय करते हैं और पूरी जिन्दगी कोई न कोई स्वाँग रचते-रचाते हुए  गुजार देते हैं। इनके मरने के बाद ही लोगों को इनकी जिन्दगी के सारे सच का पता चलता है और जमाना भी हैरत में आ जाता है।

एक बार कोई भी इंसान किसी दुर्जन से किसी अपेक्षा या स्वार्थ से जुड़ जाता है तब वह एक के बाद एक गलत-सलत कामों और धंधों में लिप्त होता चला जाता है। जीवन में बिना पुरुषार्थ के आयी लक्ष्मी, संसाधन और लोेकप्रियता तात्कालिक सुखों और आनंद का अहसास तो करा सकती हैं पर जीवनानंद और जीवन के लक्ष्य से इतना भटका दिया करती है कि वह इंसान वर्तमान जीवन में दुबारा कभी पटरी पर नहीं लौट पाता।

कुछ लोग अपवाद हो सकते हैं पर अधिकांश मामलों में ऎसा ही होता है कि दुर्जनता पा जाने या दुर्जनों का संग मिल जाने के बाद किसी आदमी को सज्जन बनाना टेढ़ी खीर है जब तक कि कोई तगड़ा झटका लग कर उसे आत्मबोध न हो जाए अथवा मानसिक-शारीरिक और आर्थिक नुकसान का कोई बड़ा संवेदनशील मामला न बन जाए।

ईश्वर की कृपा होने पर सब कुछ संभव है लेकिन ऎसा होना बहुत कम संभव है। क्योंकि एक बार जब कोई आदमी सज्जनता और मानवता को छोड़ देता है, नंगा होकर नदी उतर जाता है, फिर उसे कुछ भी लाज-शरम नहीं आती। वह कुछ भी करने को तैयार रहता है। उसे समाज का कोई भय नहीं रहता। उसके लिए जीवन भर हराम की कमाई, पराये संसाधन और हर चीज  के संग्रहण का मोह बना रहता है।

 इस प्रकार के इंसानों को हमेशा मुफत का खान-पान और भोग-विलास ही पसंद आता है। यहाँ तक कि चाय-नाश्ता, आवागमन, कपड़े-लत्ते, बूट-मौजे, जूते-चप्पल, पेन-पेन्सिल से लेकर हर चीज के लिए ये अपनी जेब से धेला भर भी खर्च करना पसंद नहीं करते।

ये चाहते हैं कि अपनी तनख्वाह, भत्ते, पारिश्रमिक और ऊपरी कमाई सब कुछ संग्रहित रहे, इसमें से पाई पर भी खर्च न हो तथा रोजमर्रा के सारे खर्च दूसरे लोग उठाएं। पद, प्रभाव और प्रतिष्ठा से सम्पन्न अभिजात्य और बड़े कहे जाने वाले लोगों में यह महामारी अधिक विद्यमान है।

ये लोग अपना हर खर्च दूसरों पर लादने की बीमारी से ग्रसित रहते हैं और इस कारण से जो कुछ करवाते हैं व दूसरों से। चाहे भय से करवाएं या प्रलोभन अथवा चाशनी वाली जलेबी दिखाकर। दुर्जनों की पूरी जिन्दगी का यही सबसे बड़ा और घिनौना सच है।

ये लोग ज्यों-ज्यों वृद्ध होते जाते हैं त्यों-त्यों इनके रक्त, हाड़-माँस, चर्म, मन, मस्तिष्क, धमनियों-शिराओं से लेकर प्रत्येक अंग-उपांग अपनी मौलिकता खोता चला जाता है और अंत में इनका शरीर भी अपना नहीं रहता।

आज समाज और देश को दीमक की तरह खाने वाले इस किस्म के दुर्जनों की भरमार है, जो चाहते हैं उनकी जिन्दगी का हरेक खर्च दूसरों से पूरा होता रहे।

 उधर सज्जन लोग भी परेशान हैं इनसे, पर कहें किससे, दुर्जनों की भीड़ रोजाना ऎसी दिखती है कि लगता है आशाओं के सारे द्वार बंद होते चले जा रहे हैं, उजालों पर अंधेरों के पहरे पहले से अधिक कड़े होने लगे हैं। अब तो कोई सा क्षेत्र ही ऎसा बचा होगा जहाँ कि ऎसे खल-कामी दुर्जनों की मौजूदगी न हो।

इस सम्पूर्ण स्थिति का एक ही निदान है। और वह है सज्जन और ईमानदार लोग एक-दूसरे के प्रति सदाशयता, सद्भावना और मैत्री भाव रखें तथा एक-दूसरे के काम आएं। अन्यथा दुर्जनों की फौज पूरी की पूरी मानवता को निगलने के लिए हर पल तैयार बैठी है। और अब तो दुर्जनों ने धर्म के नाम पर साम्राज्यवाद का नारा लगाते हुए घातक हथियार उठा लिए हैं।  सावधान रहें वरना हमेशा के लिए विश्राम काल आ जाने वाला है।

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