बढ़ते जा रहे हैं अघोषित पागल
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बढ़ते जा रहे हैं अघोषित पागल

हर कोई अपने आप को बुद्धिमान और महान मानने और मनवाने के चक्कर में फँसा हुआ है। और इस फरेब को बरकरार रखने के लिए इतना कुछ मायावी और आडम्बरी होता जा रहा है कि जो कुछ वह था, वह भी नहीं रहा। न घर का रहा, न घाट का, न चौराहों का रहा, न और किसी बाड़ों, गलियारों और ठिकानों का।

असल में अब वह किसी का रहा ही नहीं। अपना भी नहीं रहा। आदमी जबसे अपनी भीतरी आदमियत को खो चुका है तभी से वह कुछ नहीं रहा। न उसे सम्पूर्ण इंसान कहा जा सकता है, न पूर्ण जानवर, न आधा-अधूरा सज्जन या दुर्जन।

वह कुछ रहा ही नहीं। जैसा मौका आता है वैसा रंग-भेष सब कुछ बदल-बदल कर वैसा ही हो जाता है जैसा सामने वाले चाहते हैं या देखना चाहते हैं। ढेरों मुखौटे वो अपने साथ लेकर चलता है और अवसर देखकर बदलता रहता है।

औरों की इच्छाओं और इशारों का गुलाम बना हुआ आदमी अब अपने आपसे यह पूछने की स्थिति में आ गया है कि आखिर वह है क्या। किन्तु वह इतना अधिक गड़बड़िया घनचक्कर हो गया है कि इस प्रश्न का जवाब उसे मरे नहीं मिलता। मिल भी नहीं सकता क्योंकि वह अधमरा भी नहीं रहा। जमीर तो तभी से मर ही चुका है जब से उसने लोभ-लालच और आसुरी भोगवृत्ति को जीवन का लक्ष्य बनाकर अपने आपको स्वच्छन्द और स्वेच्छाचारी होकर सांसारिक दुराचारों के लिए मुक्त छोड़ दिया है।

स्वेच्छाचारी और मुफतिया भोगी-विलासी, हरामखोर, आरामतलबी और संस्कारहीन लोगों की संख्या जिस कदर बढ़ती जा रही है उसी अनुपात में पागलों की संख्या भी बढ़ती जा रही है। और ये पागल आंशिक, आधे, पौन, पूरे से लेकर सवा और डेढ़ पागलों की तरह जी रहे हैं।

सारे के सारे पागल हैं, हुए जा रहे हैं या पागल बनाए जा रहे हैं। हर पागल दूसरे को पागल बनाए जा रहा है। कोई किसी के पीछे पागल हो रहा है, कोई किसी के पीछे। पागलों में मामले में यह जरूरी नहीं कि ये अनपढ़-गँवार ही हों। बिना पढ़े-लिखे पागलों में कुछ फीसदी समझदारी और मानवीय संवेदनाएं जरूर देखी जाती हैं लेकिन पढ़े-लिखे पागलों में पूरा का पूरा पागलपन ही सवार होता है। इनमेंं मानवीय संवेदनाओं, दया-करुणा और इंसानियत का पूरा और पक्का अभाव ही रहता है।

हम अपनी जड़ों, संस्कारों और धर्म-अध्यात्म तथा सदाचार की जड़ों से इतने अधिक कट गए हैं कि हम पर सामाजिकता और मानवीय मूल्यों का कोई नियंत्रण तक नहीं रहा और इस वजह से सारे के सारे फ्री-स्टाईल जिन्दगी जीने में ही मस्त हैं। हमें भगवान से भी डर नहीं रहा।

कई बार देखा यह जाता है कि जो जितना बड़ा आदमी हो जाता है वह उतना ही अधिक सनकी और पागल होता जाता है। बहुत सारे स्त्री-पुरुषों को हम जानते हैं जो हमेशा पगलाये हुए रहते हैं।

इन पागलों में खूब सारे आत्मदुखी, असफल, हताश और सनकी हुआ करते हैं। कई पागल अपने सहधर्मी से नाखुश और चिढ़े हुए रहते है। कइयों को लगता है कि माँ-बाप उनके रास्ते में बाधक हैं। कइयों को बीबियों ने दुत्कार कर भगा दिया है और कइयों को दाम्पत्य सुख प्राप्त नहीं हो पा रहा है। कोई संतान से परेशान है, कोई पड़ोसी या अपने चाहने वालों की बेवफाई से त्रस्त है। कई पागलों को उनकी संतानों और रिश्तेदारों ने छोड़ दिया है। बहुत से पागलों ने अपने उत्तमांगों को हीन समझकर अवैध संबंधों का ही संसार बसा लिया है। इन पागलों में खूब सारे हैं जिन्हेंं व्यभिचार, अनाचार और दुराचार ही इतने रास आ गए हैं कि लोग इन्हें पिशाच और राक्षस कहकर संबोधित करते रहते हैं।

गृह कलह से लेकर मोहल्ला कलह और दफ्तर कलह से लेकर संस्थानों व कंपनियों तक के कलहों के कारण लोग पागल होते जा रहे हैं। पागल चाहे अनपढ़ हो या पढ़ा-लिखा, सामान्य धंधेबाज हो या फिर उच्च पदस्थ, सभी के मामले में एक खासियत यह देखी जाती है कि ये लोग कभी खुश नहीं हो सकते, न खुश रह सकते हैं। इनके चेहरों पर कभी खुशी देखी तक नहीं गई। जो भी इन पागलों के सम्पर्क में आता है, किसी काम से पास आता है उस पर गुस्सै होकर झल्लाने लगते हैं, बुरा-बुरा कहने लगते हैं और अपने अहंकारों में इतने अधिक फूल जाते हैं कि अनाप-शनाप बकवास करते रहते हैं। कई मर्यादाहीन और नपुसंक पागलों में इतनी भी तमीज नहीं है कि स्ति्रयों से किस प्रकार बातचीत की जाती है

ये लोग न जिन्दादिल हो सकते हैं न औरों को खुशी देने लायक।  जो स्वयं में खुश नहीं है वह औरों को न खुशी दे सकता है और न ही औरों को खुश देखकर खुश रह सकता है। यही कारण है कि दुनिया के तमाम किस्मों के गैर ओहदेदार और ओहदेदार, ऊपर वाले, नीचे वाले और बीच वाले, प्रतिष्ठित और प्रतिष्ठाहीन, छोटे-बड़े सभी प्रकार के पागलों से कोई खुशी प्राप्त नहीं कर सकता।

इन पागलों के सर पर हमेशा सनक सवार रहती है। अपने जीवन के सारे दुःखों, सनक, तनावों, अभावों और मूर्खताओं को वे दूसरों में देखकर प्रसन्न होते हैं इसलिए ये सारे के सारे पागल दूसरों को दुःख दिया करते हैं।

जिस तरह सास के क्रूर व्यवहार से दुःखी हर बहू सास बन जाने पर अपनी बहू को प्रताड़ित कर उन सभी प्रकार के दुःखों के दर्शन बहू में करना चाहती है जो उसकी सास ने दिए होते हैं। खूब सारे अपात्र लोग फर्जी डिग्रियों और किसी न किसी की दया, अनुकंपा से कोई ओहदा पा जाते हैं तब उस ओहदे को लज्जित करते हुए अपनी ही कुर्सी को अभिशप्त कर दिया करते हैं।

बहुत सारे लोेग वंश-परंपरा और परिवार से काफी संस्कारित होते हैं किन्तु बिगड़ैल बाप की नाकारा औलादों के संग, हराम की कमाई और मुफत के खान-पान को अपना लेने के कारण उनका पूरा जिस्म ही परायों का होकर रह जाता है।

कुल मिलाकर बात यही है कि वह हर इंसान पागल है जो औरोें की खुशी और आनंद को छीनने का प्रयास करता है। आश्चर्य की बात यह है कि ऎसे संभ्रान्त पागल अपने आपको पागल समझने की बजाय प्रबुद्ध और प्रतिष्ठित मानने की जिद पर अड़े रहते हैं और ताजिन्दगी अपने पागलपन को स्वीकार करने से कतराते रहते हैं।

यदि इन लोगों की चिकित्सकीय जाँच कराई जाए तो इन सभी को पागल घोषित करने में देर न लगे।  लेकिन इन पागलों की जाँच कराए कौन, जब सारे इसी पागलपन के शिकार हैं।

लोग घोषित पागलों से जितने परेशान नहीं हैं उनसे कई गुना त्रस्त उन पागलों से हैं जो अघोषित हैं किन्तु पागलपन के सारे लक्षण विद्यमान हैं। इन्हीं पागलों की निरन्तर बढ़ती जा रही विस्फोटक संख्या के कारण ही देश का हैप्पीनेस इण्डेक्स हमेशा नीचे गिरा हुआ रहता है।

कोई इन लोगों को पागल कहने की हिम्मत भले न जुटा पाए, यह समझदारों को काम है कि इन सभी प्रकार के अघोषित पागलों को सार्वजनिक तौर पर पागल कहने की शुरूआत करें और हर मोर्चे पर इन्हें याद दिलाएं कि वे पागल हैं और वाकई पागल हैं जिनका काम ही औरों की खुशियाँ छीनना और तंग करते हुए तनाव देना रह गया है। इन अघोषित पागलों का इससे बढ़कर और कोई अचूक ईलाज हो ही नहीं सकता। तो फिर देर किस बात की, आज से ही करें शुरूआत। यही वर्तमान का युग धर्म है।